मोहम्मद मुइज्जू के सत्ता में आने के बाद से ही भारत और मालदीव के बीच रिश्ते मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं. मुइज्जू सरकार द्वारा मालदीव में मौजूद भारतीय सैनिकों को वापस जाने का आदेश और उसके बाद उनके मंत्री की ओर से प्रधानमंत्री मोदी को लेकर की गई आपत्तिजनक टिप्पणी ने इसे और मुश्किल कर दिया है.
राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू और उनकी पार्टी पीपुल्स नेशनल कांग्रेस को चीन समर्थक के रूप में देखा जाता है. उनकी पार्टी ने चुनाव कैंपेन में 'इंडिया आउट कैंपेन' का नारा दिया था. चीन के साथ मालदीव की बढ़ती नजदीकियों पर भारत के पूर्व डिप्लोमैट विवेक काटजू का कहना है कि भारत को इस मुद्दे को लेकर स्पष्ट संदेश देना चाहिए.
अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस में अपने ओपिनियन लेख में विवेक काटजू लिखते हैं, "2019 में जिस तरह मोदी सरकार ने बालाकोट स्ट्राइक कर आतंक से मुकाबला करने के भारत के संकल्प को दिखाया था. उसी तरह पड़ोसियों को हस्तक्षेप करने से रोकने के लिए एक रेखा खींची जानी चाहिए."
सुरक्षा क्षेत्र सहित पड़ोस की स्थिति भारत के अनुकूल नहींः काटजू
काटजू लिखते हैं, "पड़ोसी देशों के साथ ये समस्याएं नई नहीं हैं लेकिन क्षेत्र में जिस तरह से चीन लगातार आक्रामक हो रहा है, उससे ये समस्याएं और बढ़ गई हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने 'सबका साथ, सबका विकास' के थीम पर कई पड़ोसी देशों को साथ लाने और चीन की हरकतों का मजबूती से मुकाबला करने की कोशिश की है.
हालांकि, पड़ोसी देश भारत के साथ संबंधों पर जोर देते हुए भी चीनी प्रस्तावों को नजरअंदाज नहीं कर पा रहे हैं. सुरक्षा क्षेत्र सहित पड़ोस की स्थिति भारत के लिए सही तस्वीर पेश नहीं करती है. ऐसे में भारत को अपने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को एक मजबूत और स्थायी फ्रेमवर्क पेश करने की जरूरत है."
हाल ही में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने NAM समिट के दौरान मालदीव के विदेश मंत्री मूसा जमीर से मुलाकात की थी. मुलाकात के बाद जयशंकर ने ट्वीट करते हुए लिखा था कि मुलाकात के दौरान भारत-मालदीव संबंधों को लेकर खुलकर बातचीत हुई.
अफगानिस्तान और म्यांमार में भारत के डिप्लोमैट रहे काटजू लिखते हैं कि यह अच्छा है कि जयशंकर ने मालदीव के विदेश मंत्री के साथ खुलकर बातचीत की. जयशंकर ने जमीर को क्या संदेश दिया होगा, इसका अंदाजा लगाना भी ज्यादा मुश्किल नहीं है. उन्होंने इस बात पर जोर दिया होगा कि भारत मालदीव की संप्रभुता और उसकी पसंद का सम्मान करता है. लेकिन भारत यह स्वीकार नहीं करेगा कि मालदीव जैसा पड़ोसी देश एक ऐसा कदम उठाए जिससे उसकी (भारत) की सुरक्षा खतरे में पड़ जाए. भारत को केवल मालदीव ही नहीं बल्कि अन्य पड़ोसियों के संदर्भ में एक लाल रेखा खींचनी होगी. क्योंकि चीन भारत की चिंताओं का कोई सम्मान करता नहीं दिखता है.
भारत को लाल रेखा खींचनी होगीः काटजू
विवेक काटजू आगे लिखते हैं, "पिछले छह दशकों से भी अधिक समय से चीन ने पाकिस्तान को भारत के खिलाफ एक हथियार (cat’s paw) के रूप में इस्तेमाल किया है. चीन पाकिस्तान के रणनीतिक हथियारों और उसके वितरण में भी सहयोग करता है. दोनों देशों के सहयोग से बन रहे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे इसके लेटेस्ट उदाहरण हैं."
उन्होंने आर्टिकल में लिखा है, "इसी तरह हिंदूकुश में मौजूद खनिज संपदा का उपयोग करने के लिए चीन, तालिबान के साथ संबंधों को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है. नेपाल में भी चीन पूरी तरह से एक्टिव है. भूटान पर भी दबाव बना रहा है और श्रीलंका में भी अपनी पकड़ मजबूत बनाने की कोशिश में है. वहीं, बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार मानती है कि भारत से साथ संबंधों को मजबूत बनाने में ही उसका हित है लेकिन वहां के लोग और कई राजनेता इस विचार से सहमत नहीं हैं."
"तीन दशकों से अधिक समय से ये देश पाकिस्तानी आतंकवाद से सफलतापूर्वक निपटने में असमर्थ रहे हैं. लेकिन मोदी सरकार ने 2019 में बालाकोट स्ट्राइक कर आतंक से मुकाबला करने के भारत के संकल्प को दिखाया. पाकिस्तानी आतंकवाद से मुकाबला करने को लेकर एक रेखा खींची गई.
इसी तरह आज जरूरत है कि बिना हल्ला मचाए 'सबका साथ, सबका विकास' और 'पड़ोसियों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेरप न करने की मोदी सिद्धांत' पर जोर देते हुए एक रेखा खींची जाए. और यदि इन रेखाओं का उल्लंघन किया जाता है तो जरूरत पड़ने पर बलपूर्वक कार्रवाई भी करनी होगी."