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खनिजों का दोहन, जबरन मजदूरी, कैसे तिब्बत का दमन जारी रखे हुए है चीन

बीजिंग की ओर से तिब्बत के प्राकृतिक संसाधनों के बड़े पैमाने पर दोहन के साथ वहां जबरन श्रम कैम्प बनाए गए हैं. इसके अलावा सांस्कृतिक तौर पर तिब्बतियों को अधीन करने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं. 

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चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (फाइल फोटो)
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • चीन को संभवतः द्रिरू काउंटी में खनिजों के विशाल संसाधन मिले हैं
  • चीनी सरकार खनिज संसाधनों का दोहन लंबे समय से कर रही
  • स्थानीय आबादी को मजदूरों के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू किया

चीन का तिब्बत के साथ स्वायत्त क्षेत्र की जगह उपनिवेश के तौर पर बर्ताव करना जारी है. बीजिंग की ओर से तिब्बत के प्राकृतिक संसाधनों के बड़े पैमाने पर दोहन के साथ वहां जबरन श्रम कैम्प बनाए गए हैं. इसके अलावा सांस्कृतिक तौर पर तिब्बतियों को अधीन करने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं. 

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तिब्बत और पूर्वी तुर्केस्तान (अब शिनजियांग) के खनिजों का शोषण, चीन की बढ़ती अर्थव्यवस्था में खासा योगदान देता है. Tsaidam बेसिन में छोटी परियोजनाओं के साथ इन कब्जे वाले क्षेत्रों से खनिजों को निकालना और खनन शुरू हुआ. इससे होने वाली कमाई 100 अरब डॉलर या 600 अरब युआन समझी जाती है. 

तिब्बत में पाए जाने वाले खनिजों में क्रोमियम, तांबा, बोरोन, लिथियम और कई रेअर अर्थ्स हैं. यूरेनियम और सोना जैसी कई कीमती धातुओं समेत 120 से ज्यादा खनिजों के यहां अलग अलग आकार के बड़ी संख्या में डिपोजिट्स (संग्रह) हैं.  

खनिजों का दोहन 

तिब्बत के पूर्व-उत्तरी प्रांत नागचू की द्रिरू काउंटी की ताजा सैटेलाइट तस्वीरों से साफ संकेत मिलते हैं कि चीन इस क्षेत्र में न केवल खनिज बल्कि मानव संसाधनों का भी कैसे जम कर दोहन कर रहा है.  

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सैटेलाइट तस्वीरों से पता चलता है कि चीन को संभवतः द्रिरू काउंटी में खनिजों के विशाल संसाधन मिले हैं. खनन प्रोजेक्ट साइट्स से खनिजों की ढुलाई में आसानी के लिए यहां नई सड़कों का निर्माण किया गया है. 

चीनी सरकार इन क्षेत्रों में खनिज संसाधनों का दोहन लंबे समय से कर रही है, लेकिन संचार साधनों की पहुंच न होने की वजह से दुनिया के सामने ये नहीं आ पा रहा था. लेकिन कॉमर्शियल सैटेलाइट तस्वीरों के उपलब्ध होने से अब सारी स्थिति साफ है. 

बंधुआ मजदूरी 

तिब्बत में चीनी सरकार पूर्व सचिव चेन कुआनगुओ के नेतृत्व में रही हो या मौजूदा सचिव वू यिंगजी के नेतृत्व में, तिब्बतियों के दमन या उनके खिलाफ कठोर फैसले लेने में कहीं कोई कमी नहीं आई. इनमें गुलग जैसे यातना शिविर बनाना भी शामिल है. वू यिंगजी ने पूर्व तुर्केस्तान भेजे जाने से पहले 2011 से डिप्टी के तौर पर कुआनगुओ के तहत काम किया. 

कच्चे माल की उत्पादन लागत को कम करने के लिए, चीनी सरकार ने बड़े पैमाने पर स्थानीय आबादी को मजदूरों के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है.  

गांवों और बस्तियों की पिछले 50 वर्षों से उपेक्षा होती चली आ रही है और वहां की आबादी बेहतर जीवन के लिए तरस रही है. ऐसे वंचित लोगों का चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) की ओर से जमकर शोषण किया जा रहा है. उन्हें सरकारी उपक्रमों की ओर से नाम मात्र का मेहनताना देकर ही सख्त मजदूरी कराई जाती है.   

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गांवों में सीसीपी के बड़े भवनों का निर्माण किया गया है. ये सब देख कर वहां के लोगों पर असर पड़ता है जिन्होंने कभी नागचू शहर भी नहीं देखा. स्थानीय लोग रोजगार की संभावना में दयनीय परिस्थितियों में रहने को भी तैयार हो जाते हैं. उन्हें कंपनियों की ओर से बैरक टाइप रिहाइशी स्थल पर रखा जाता है. 

नए बने सरकारी भवनों का लेआउट इंगित करता है कि चीनी सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के तहत पीपुल्स आर्म्ड पुलिस (पीएपी) की ओर से इनकी निगरानी की जाती है. 

द्राथांग गांव इसका एक अच्छा उदाहरण है. इस गांव में नए कारखाने में मजदूरों को रखने के लिए बैरक है. इस रिजोल्यूशन पर ये नहीं देखा जा सकता कि इन कारखानों में कौन से उत्पाद बनाए जाते हैं.  

सांस्कृतिक वर्चस्व 

नागचू शहर के पूर्व का इलाका पूरी तरह से पहाड़ियों से घिरा है. यहां 4,000-4,500 मीटर ऊंची घाटियों और 5,000 से 6,000 मीटर ऊंचाई वाले पहाड़ों पर गांव हैं. इस क्षेत्र की आबादी में मुख्य रूप से किसान और चरवाहे शामिल हैं जो बहुत ही सीधे सादे हैं. उनकी शिक्षा मुख्य रूप से धार्मिक होती थी जो गोम्पा (बौद्ध मठ के भवन) की ओर से दी जाती थी. इन पर चीनी सरकार ने 50 साल पहले तिब्बत पर कब्जा करने के बाद रोक लगा दी थी. अब, चीनियों ने तिब्बतियों को केवल चीनी माध्यम में सीखने के लिए मजबूर करना शुरू कर दिया है. दूसरी भाषा के रूप में भी तिब्बती का अध्ययन नहीं कराया जाता. 

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हालांकि, इन दुर्गम क्षेत्रों में चीन की ओर से तिब्बती भाषा को मिटाने के लिए तरह तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं. पहाड़ों पर लिखे गए ‘ओम माने पद्म हम’ जैसे मंत्रों को मंदारिन में चीनी कहावतों से बदला जा रहा है.   

धार्मिक पराधीनता 

चीनी सरकार इस क्षेत्र में सभी नवनिर्मित गोम्पाओं का प्रशासन अपने हाथों में ले रही है. ये गोम्पा 1950 में चीनी कब्जे के दौरान और बाद में तथाकथित सांस्कृतिक क्रांति के दौरान नष्ट कर दिए गए थे.  

इस क्षेत्र के लोगों की ओर से मृतकों को स्काई बेरीअल (पहाड़ पर शव को छोड़ देना) के बाद कपाल (खोपड़ी) को संरक्षित करने की परंपरा थी. इस पर चीन ने 60 साल तक रोक लगाए रखी. इस स्काई बेरीअल के सांस्कृतिक रिवाज को दोबारा चलन में लाया जा रहा है. 

डोडोका गोम्पा को संभवत: अब सरकार के नियंत्रण में लाए गए राबटेन गोम्पा से जोड़ा जा चुका है. सरकार के नियंत्रण में ही स्काई बेरीअल सिस्टम को लाया जाएगा.  

गोम्पा के आसपास की पुरानी इमारतों को नष्ट कर दिया गया है. इनकी जगह अब भिक्षुओं पर अधिक प्रभावी ढंग से नियंत्रण के लिए आधुनिक भवनों का निर्माण किया गया है. इनके चारों तरफ सुरक्षा के लिए बड़ी दीवारों का निर्माण किया गया है.  

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सांस्कृतिक वर्चस्व और धार्मिक पराधीनता का रास्ता चीनी सरकार की ओर से संचालित एजेंसियों और कंपनियों की मदद करने के लिए अपनाया गया है. जिससे स्थानीय लोगों को खनन और अन्य परियोजनाओं में बहुत कम मेहनताना देकर मजदूरी के लिए मजबूर किया जा सके और सस्ते उत्पादों का निर्माण किया जा सके. 

(कर्नल विनायक भट (रिटायर्ड) इंडिया टुडे के लिए एक सलाहकार हैं. वे सैटेलाइट तस्वीरों के विश्लेषक हैं, उन्होंने 33 वर्षों तक भारतीय सेना में सर्विस की) 


 


 

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