नेपाल में राजशाही की बहाली को लेकर चल रहे आंदोलनों के बीच वहां की सिविल सोसायटी ने इसका ठीकरा भारत पर फोड़ दिया है. नेपाल की कई कथित नागरिक अधिकारों पर काम करने वाली एजेंसियों ने कहा है कि नेपाल के पूर्व राजा ज्ञानेंद्र को भारत के रुढ़िवादी और कट्टर तत्वों का सपोर्ट हासिल है.
वहीं वहां की प्रमुख पार्टी नेपाली कांग्रेस ने भी कहा है कि ज्ञानेंद्र शाह संवैधानिक सम्राट बनने के लिए उपयुक्त नहीं हैं.
नेपाल में पिछले कुछ समय से राजशाही वापसी और हिन्दू राष्ट्र के दर्जे की बहाली के आंदोलन चल रहा है. इस मुहिम को जनता का समर्थन मिल रहा है.
नेपाल में सिविल सोसायटी के एक्टिविस्ट के एक समूह ने सोमवार को पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह की आलोचना करते हुए कहा कि वे "राजशाही को फिर से स्थापित करने के उद्देश्य से राजनीतिक रूप से सक्रिय हो रहे हैं" और दावा किया कि उन्हें भारत में धार्मिक कट्टरपंथियों का समर्थन प्राप्त है.
सिविल सोसायटी के आठ नेताओं ने एक संयुक्त बयान में कहा, "ज्ञानेंद्र शाह का राजनीतिक सक्रियता में उतरना उनके पूर्वजों के राष्ट्र निर्माण के प्रयासों को विफल करता है और इससे देश के पड़ोसियों और दुनिया के सामने कमजोर होने का खतरा है."
गौरतलब है कि कुछ ही दिन पहले जब नेपाल के पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र शाह पोखरा प्रवास से काठमांडू लौटे थे तो उनके स्वागत में एयरपोर्ट पर हजारों लोगों की भीड़ जमा हुई थी. इन लोगों ने नारायणहिटी खाली गर, हाम्रो राजा आउंदै छन,' यानी कि नारायणहिती (राजा का महल) खाली करो, हमारे राजा आ रहे हैं' का नारा लगा रहे थे.
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बता दें कि फरवरी में पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र ने कहा था, "समय आ गया है कि हम देश की रक्षा करने और राष्ट्रीय एकता लाने की जिम्मेदारी लें." इसके बाद देश में उनकी राजनीतिक सक्रियता बढ़ी थी.
सिविल सोसायटी ने अपने बयान में कहा कि राजशाही गुट देश को राजनीतिक और भूराजनीतिक रूप से ऐसे समय में खतरे में डालने को तैयार है, जब नेपाल के विदेशी मामले और पड़ोसी संबंध सबसे कमजोर स्थिति में हैं.
भारत पर नाहक परेशान नेपाल की सिविल सोसायटी
बयान में भारत की ओर बिना सबूतों के इशारा करते हुए कहा गया है कि ज्ञानेंद्र "नेपाल में राजशाही को फिर से स्थापित करने के उद्देश्य से राजनीतिक रूप से सक्रिय हो गए हैं, जिसे हम सभी संविधान के विरुद्ध मानते हैं, जिसका उद्देश्य अवसरवादियों के लाभ के लिए अराजकता फैलाना है और जिसे भारत में धार्मिक कट्टरपंथियों के समर्थन से अंजाम दिया जा रहा है."
सिविल सोसायटी के इस बयान में उन्होंने दावा किया है कि ज्ञानेंद्र "नेपाल में गद्दी पर वापस आने के लिए भारत के राजनीतिक तत्वों की पैरवी ले रहे हैं.
इस बयान को मानवाधिकार कार्यकर्ता चरण प्रसाई, सुशील पयाकुरेल, पत्रकार कनक मणि दीक्षित, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की पूर्व सदस्य मोहना अंसारी, वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश त्रिपाठी, नागरिक समाज कार्यकर्ता हीरा बिश्वकर्मा, राजन कुइकेल और रीता परियार का समर्थन हासिल है.
सिविल सोसायटी ने चेतावनी दी है कि भारत के हिंदुत्व कट्टरपंथियों के समर्थन से राजशाही में वापसी का कोई भी कदम नेपाल की संप्रभुता और स्वतंत्रता को कमजोर करता है".
इसमें यह भी कहा गया है कि उत्तर प्रदेश के भाजपा मुख्यमंत्री आदित्यनाथ, जिन्होंने ज्ञानेंद्र की लखनऊ में कई यात्राओं की मेजबानी की है, ने "सार्वजनिक रूप से नेपाल में राजशाही की वापसी की इच्छा व्यक्त की है".
सिविल सोसायटी का कहना है कि यदि पूर्व राजा ने राजनीति में आने के अपने लोभ पर लगाम लगाई होती और अपनी प्रतिष्ठा समझी होती तो नेपाली जनता देश के संस्थापक राजा के वंश को संविधान के बाहर राष्ट्रीय जीवन में सम्मानजनक स्थान देने के लिए सहमत हो सकती थी. लेकिन ज्ञानेंद्र की राजनीतिक सक्रियता के इस दौर ने उस संभावना को समाप्त कर दिया है.
राजशाही की वापसी की कोई संभावना नहीं
वहीं नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने कहा कि नेपाल में राजशाही की वापसी की कोई संभावना नहीं है. उन्होंने कहा कि ज्ञानेंद्र संवैधानिक सम्राट बनने के लिए उपयुक्त नहीं हैं.
बागमती प्रांत प्रशिक्षण विभाग द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में देउबा ने सुझाव दिया कि राजशाही समर्थक राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (आरपीपी) को पूर्व राजा को अपना अध्यक्ष बनाना चाहिए.
देउबा ने कहा, "भले ही आरपीपी ज्ञानेंद्र को अपना अध्यक्ष बना ले, लेकिन अंततः उसे इसका पछतावा होगा." उन्होंने कहा, "यदि पूर्व राजा राजनीति में शामिल होना चाहते थे, तो वे अपनी पार्टी बना सकते थे."
सत्तारूढ़ नेपाली कांग्रेस पार्टी ने कहा है कि वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था को बदलने की कोई आवश्यकता नहीं है.