27 दिसंबर 2007 को पाकिस्तान की तत्कालीन प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या कर दी गई थी. लेकिन 16 साल बाद आज भी भुट्टो की हत्या की पहेली सुलझी नहीं है.
पाकिस्तान की पहली महिला प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की 2007 में उस समय हत्या कर दी गई थी, जब वह एक चुनावी रैली को संबोधित कर लौट रही थीं. लियाकत बाग के बाहर आत्मघाती हमले में उनकी हत्या की गई. हत्या के समय उनकी उम्र 54 साल थी और उस समय पाकिस्तान में सैन्य तानाशाह जनरल परवेज मुशर्रफ का शासन था.
जियो न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक, बेनजीर की पार्टी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) 2008 से 2013 तक देश में सत्ता में रही. लेकिन फिर भी बेनजीर की हत्या में शामिल लोगों या संगठन का पता नहीं लगा पाई.
कई सवाल अब भी अनसुलझे
रिपोर्ट में कहा गया कि साल दर साल गुजरने के बाद बेनजीर की हत्या की गुत्थी सुलझी नहीं है. उनकी हत्या की साजिश को लेकर कई सवाल हैं, जिनका जवाब आज तक नहीं मिल पाया है. सबसे बड़ी पहेली यही है कि चुनावी रैली को संबोधित करने के बाद बेनजीर भुट्टो के काफिले को जिस रूट से लौटना था, ऐन वक्त पर उस रूट में बदलाव क्यों किया गया? एक बड़ा सवाल ये भी कि आनन-फानन में घटनास्थल को क्यों धुलवा दिया? या फिर सबूतों को क्यों नष्ट किया गया.
पाकिस्तान सरकार ने उस समय इस घटना को आतंकी हमला करार दिया था. तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) से जुड़े दो लोगों के स्केच जारी किए गए थे. साथ में आतंकियों की कथित टेलीफोन बातचीत भी जारी की गई थी.
स्कॉटलैंड यार्ड की टीम पहुंची थी पाकिस्तान
मुशर्रफ ने बेनजीर भुट्टो की हत्या की जांच के लिए ब्रिटेन से स्कॉटलैंड यार्ड की एक टीम तक बुलाई थी. इस टीम ने आठ जनवरी 2008 को अपनी रिपोर्ट पेश की. हालांकि, पीपीपी और बेनजीर भुट्टो के पति आसिफ अली जरदारी दोनों ने स्कॉटलैंड यार्ड की इस रिपोर्ट को सिरे से खारिज करते हुए कहा था कि यह संदेहों से भरी हुई है. साथ ही मुशर्रफ पर बेनजीर की हत्या में शामिल होने के आरोप लगाए थे.
पीपीपी सरकार ने कई बार बेनजीर की हत्या की स्वतंत्र जांच संयुक्त राष्ट्र से कारने की मांग की. आखिरकार, बाद में यूएन के तत्कालीन महासचिव बान की मून ने फरवरी 2009 में इस मामले की जांच के लिए एक संयुक्त राष्ट्र का उच्चस्तरीय फैक्ट फाइंडिंग मिशन भेजा. यह दल जुलाई 2009 में पाकिस्तान पहुंचा और अपनी रिपोर्ट जारी की लेकिन यह रिपोर्ट स्पष्ट नहीं थी और इसमें दोषियों के बारे में ज्यादा कुछ नहीं था. यूएन की इस फैक्ट फाइंडिंग मिशन रिपोर्ट को जरदारी और पीपीपी ने खारिज कर दिया था.
जियो न्यूज की रिपोर्ट में कहा गया है कि बीते 16 सालों में बेनजीर की हत्या को लेकर कई थ्योरी सामने आई लेकिन इन थ्योरी की पुष्टि के लिए आज तक कोई कंक्रीट साक्ष्य नहीं मिले. ऐसी कई घटनाएं सामने आईं, जिससे स्पष्ट संकेत मिले कि तथ्यों को छिपाने और जांचकर्ताओं को भ्रमित करने की बहुत कोशिशें की गई थीं.
क्या हुआ था भुट्टो के साथ?
27 दिसंबर 2007 को बेनजीर भुट्टो रावलपिंडी के लियाकत बाग में एक चुनावी रैली में भाषण खत्म कर लौट रही थीं. तभी 15 साल का बिलाल उनकी कार के पास आया. पहले बिलाल ने भुट्टो को गोली मारी और फिर खुद को उड़ा दिया.
उस दिन बेनजीर भुट्टो का काफिला रावलपिंडी से निकलकर इस्लामाबाद की ओर रवाना हो रहा था. काफिला निकल ही रहा था कि बड़ी संख्या में समर्थक लियाकत बाग के गेट पर पहुंच गए और नारे लगाने लगे.
समर्थकों को जवाब देने के लिए बेनजीर भुट्टो जैसे ही कार से बाहर निकलीं, वैसे ही तीन गोलियां चलीं और फिर जोर का धमाका हुआ. जब धमाके का धुंआ छटा तो चारों ओर खून बिखरा हुआ था और शवों के चिथड़े पड़े हुए थे. बेनजीर भुट्टो की मौत हो चुकी थी. उनके अलावा और भी 25 लोग इस हमले में मारे गए थे.
बयान से मुकर गए थे आरोपी
बेनजीर भुट्टो की हत्या के कुछ हफ्तों बाद पांच संदिग्धों ने कबूल किया था कि उन्होंने पाकिस्तानी तालिबान और अल-कायदा के इशारे पर 15 साल के बिलाल की मदद की थी.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस हत्याकांड में सबसे पहले जिसे गिरफ्तार किया गया था, उसका नाम एतजाज था. अगर बिलाल की कोशिश नाकाम हो जाती तो फिर वो काम एतजाज करता.
इसके अलावा रशीद अहमद और शेर जमान नाम के दो संदिग्धों ने भी माना था कि वो साजिश में शामिल थे. रावलपिंडी के दो भाइयों हसनैन गुल और रफाकत हुसैन ने भी कबूल किया था कि उन्होंने भुट्टो की हत्या से एक रात पहले बिलाल को पनाह दी थी. हालांकि, बाद में सारे आरोपी अपने बयानों से मुकर गए थे.
2017 में पाकिस्तान की अदालत ने इन पांचों आरोपियों को बरी कर दिया था. जबकि, दो पूर्व पुलिस अधिकारी सऊद अजीज और खुर्रम शहजाद को 17 साल की कैद और 5 लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई. इन पुलिस अधिकारियों पर लापरवाही बरतने का आरोप था.