इजरायल और हमास युद्ध के बीच बुधवार को नॉर्वे, स्पेन और आयरलैंड ने एक बड़ा कदम उठाते हुए फिलिस्तीन को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता देने का ऐलान किया. इन देशों का कहना है कि वे 28 मई से फिलिस्तीन को औपचारिक तौर पर एक राष्ट्र के तौर पर मान्यता देंगे.
इन देशों ने ये घोषणा ऐसे समय पर की है, जब अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) में इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू की गिरफ्तारी वॉरेन्ट की मांग की जा रही है. बता दें कि राष्ट्र के तौर पर फिलिस्तीन को मान्यता देने के साथ ये तीनों देश उन 140 से अधिक मुल्कों की सूची में शामिल हो जाएंगे, जिन्होंने वर्षों से फिलिस्तीन को राष्ट्र के तौर पर मान्यता दे रखी है. संयुक्त राष्ट्र के 193 देशों में से लगभग दो तिहाई सदस्य फिलिस्तीन को मान्यता दे चुके हैं.
कोई नया राष्ट्र कैसे बनता है?
दुनिया के नक्शे पर एक राष्ट्र के तौर पर मान्यता देने का किसी तरह का परिभाषित फॉर्मूला (Defined Formula) नहीं है. लेकिन दिसंबर 1933 में उरुग्वे की राजधानी मोंटेवीडियो में एक सम्मेलन हुआ था. इस सम्मेलन में किसी भी राष्ट्र के बनने को लेकर चार मानक तय किए गए थे. ये चार मानक तय क्षेत्रफल, स्थाई जनसंख्या, स्थाई सरकार और दूसरे राष्ट्रों से संबंध हैं. अभी तक इसी आधार पर किसी भी नए राष्ट्र को मान्यता दी जाती है.
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UN की मंजूरी है अनिवार्य
किसी भी राष्ट्र को संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी के बिना मान्यता नहीं मिल सकती. राष्ट्र के रूप में मान्यता मिलने के लिए तय शर्तों और मानकों के पूरा होने के बाद भी संयुक्त राष्ट्र की ओर से स्वीकृति अनिवार्य है. संयुक्त राष्ट्र से मान्यता मिलने के बाद ही अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक जैसे तमाम अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं भी उसे स्वीकार करती हैं. इन संस्थाओं से किसी भी राष्ट्र को जरूरत के समय फंड, संरक्षण और अन्य जरूरी मदद मिलती है.
लेकिन यह प्रक्रिया उतनी भी आसान नहीं है. सोमालिया का हिस्सा रह चुके सोमालियालैंड ने 1991 में खुद को अलग देश घोषित कर दिया था. लेकिन इतने साल बीतने के बाद भी अभी तक संयुक्त राष्ट्र ने उसे राष्ट्र के तौर पर मान्यता नहीं दी है.
इन तीनों देशों के फैसले का क्या होगा असर?
नॉर्वे, स्पेन और आयरलैंड की ओर से फिलिस्तीन को मान्यता देने के फैसले का तत्काल कोई असर नहीं होगा. हालांकि, इस फैसले से भविष्य में फिलिस्तीनी नेताओं को राजनयिक स्वीकृति मिल सकती है.
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नॉर्वे के विदेश मंत्री एस्पेन बार्थ आइड का कहना है कि फिलिस्तीनी प्राधिकरण के लिए देश का प्रतिनिधि कार्यालय, जो 1999 में वेस्ट बैंक में खोला गया था, वह दूतावास बन जाएगा.
कहां हैं दिक्कतें?
फिलिस्तीन को नए राष्ट्र के तौर पर मान्यता देने से एक तरफ इजरायल बौखलाया हुआ है. वहीं, अमेरिका ने साफ कहा है कि इस तरह के फैसले एकतरफा तरीके से नहीं लिए जा सकते. इसके लिए व्यापक चर्चा जरूरी है. ऐसे में इतना तो तय है कि इन तीनों देशों के फिलिस्तीन को नए राष्ट्र के तौर पर मान्यता देने के फैसले से वैश्विक स्तर पर काफी उथल-पुथल देखने को मिल सकती है.
इसके अलावा नए राष्ट्र के तौर पर फिलिस्तीन की सरहदें क्या होंगी? उसकी राजधानी कौन से होगी? ऐसे बहुत से सवाल हैं, जिन पर गतिरोध बना हुआ है और शायद आगे भी बना रहेगा.
अभी फिलिस्तीन की क्या स्थिति है?
संयुक्त राष्ट्र ने फिलहाल फिलिस्तीन को सिर्फ पर्यवेक्षक (Observer) का दर्जा दिया है. इससे फिलिस्तीन को संयुक्त राष्ट्र में सीट तो मिलती है लेकिन वोट देने का अधिकार नहीं मिला है.