रूस पर गृहयुद्ध और पुतिन पर आया तख्तापलट का संकट अब खत्म हो चुका है. एक बार फिर पुतिन ने अपने खिलाफ हुए विद्रोह को दबा दिया है और सत्ता पर पकड़ मजबूत बना रखी है. राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की सख्ती के आगे प्राइवेट आर्मी वैगनर के चीफ येवगेनी प्रिगोझिन झुक गए हैं. बगावत के 12 घंटे के अंदर उन्होंने सरकार के साथ समझौता कर लिया है. बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर लुकाशेंको के बीच-बचाव और दिए गए प्रस्ताव के बाद ये मसला हल हुआ है. लिहाजा अब यह प्राइवेट आर्मी अपने कैंपों की ओर लौट रही है. टैंकों का रास्ता मोड़ लिया है. रिपोर्ट के मुताबिक, ये प्राइवेट आर्मी मॉस्को पर कब्जा के लिए आगे बढ़ी थी.
पहली बार नहीं है पुतिन के खिलाफ विद्रोह
यह पहली बार नहीं है कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने विरोध झेला है, लेकिन हर बार वह विद्रोह को दबाकर और कुचलकर आगे बढ़ते रहे हैं. इसका सिलसिला बीते 23 सालों से तो लगातार ही चल रहा है. घटनाओं के संदर्भ में इतिहास और तारीखें कड़ी से कड़ी जोड़ने का बड़ा जरिया होती हैं. तारीखों के साए में देखिए, रूसी राष्ट्रपति पुतिन, येवगेनी प्रिगोझिन से पहले भी विद्रोहों का सामना कर चुके हैं.
1999 से हो गई थी शुरुआत
इस सिलसिले की शुरुआत 1999 से ही हो गई थी. पुतिन रूस के कार्यवाहक राष्ट्रपति बने थे. इसके बाद अगले एक साल में हुई बड़ी सैन्य दुर्घटना ने उन्हें सवालों के घेरे में ला दिया था. 12 अगस्त 2000 की सुबह रूस की न्यूक्लियर सबमरीन क्रुस्क समुद्र के भीतर बड़े हादसे का शिकार हो गई. पनडुब्बी में हादसे से चालक दल के सभी 118 लोग मारे गए और पुतिन की चुप्पी पर उनकी काफी आलोचना हुई.
2002: जब चेचेन विद्रोहियों ने खेला थिएटर में खूनी खेल
23 अक्टूबर 2002 को पुतिन एक बार विद्रोही संकट से घिरे. उस दिन मॉस्को के दुब्रोवका थियेटर में दर्शक नाटक देख रहे थे और रात 9 बजे के करीब अचानक हवाई फायरिंग हुई और 50 हथियारबंद हमलावरों, जिनमें महिलाएं भी शामिल थीं, उन्होंने 850 लोगों को बंदी बना लिया. ये चेचेन विद्रोही थे. इनकी मांग थी कि रूसी सैनिक तुरंत और बिना शर्त चेचेन्या से हट जाएं, वरना वो बंधकों को मारना शुरू कर देंगे. इस हमले में 130 लोग मारे गए. इसके बाद पुतिन ने अपने सभी कार्यक्रम रद्द कर दिए. रूसी कमांडो ने थियेटर के वेंटिलेशन सिस्टम से हमलवारों को शिथिल करने के लिए स्लीपिंग गैस छोड़ी. हमलावरों ने मास्क पहन रखे थे, लेकिन अफरातफरी के माहौल में कुछ महिला विद्रोही सुस्त होकर गिर गईं. सुबह 6 बजकर 33 मिनट में 200 रूसी सैनिक थियेटर में घुसे और कई हमलावरों को ढेर कर दिया गया. पुतिन ने इस तरह इस विद्रोह को कुचल दिया.
2004: दोबारा राष्ट्रपति चुने गए पुतिन
साल 2004 में पुतिन एक बार फिर राष्ट्रपति चुने गए. अबकी बार उनके पास बीते पांच सालों का अनुभव था. लिहाज वह सत्ता के हर दांव-पेच को समझ चुके थे. सीधे तौर पर कहें तो उन्हें विरोध और विद्रोह को दबाने का हुनर आ गया था. इसलिए दूसरा कार्यकाल मिलते ही पुतिन ने दो काम किए पहला सिक्योरिटी सर्विस को काफी मजबूत किया और दूसरा मीडिया पर नियंत्रण साधना शुरू किया. लिहाजा, पुतिन ने कई विरोधियों को जन्म दिया, लेकिन विद्रोहों का भी वह लगातार दमन करते रहे.
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मीडिया पर किया कंट्रोल
एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, पुतिन ने सत्ता में आने के कुछ दिन बाद ही मीडिया को कंट्रोल करना शुरू कर दिया था. सरकार ने लोगों तक जा रही जानकारी को नियंत्रित किया. इसके जरिए तीन काम किए गए. पहला, पॉपुलरिटी रेटिंग को अपने हक में दिखाना, दूसरा, नई सरकार में रूस और उसके नेता की प्रभावी छवि दिखाना, और तीसरा, 'देश के दुश्मनों' को चिह्नित कर सामने लाना. रूस में जितने भी टीवी स्टेशन हैं, उनमें से अधिकतर या तो राजनीतिक खबरें कवर ही नहीं करते हैं और जब करते हैं तो वे सरकारी नियंत्रण में होती हैं. रूस के सरकारी पैसे पर चलने वाला आरटी मीडिया ही पूरे रूस की खबरें पूरे विश्व को तक पहुंचाता है.
2005: कुलीन वर्ग के खिलाफ कार्रवाई
साल 2005 से पुतिन ने उन कुलीन वर्ग के खिलाफ भी कार्रवाई शुरू की, जो रूस की सरकार पर नियंत्रण कर सकते थे. पुतिन ने हाई प्रोफाइल लोग जैसे लॉबिस्ट बोरिस बेरेजोव्सकी और तेल के बड़े व्यापारी मिखाइल खोदोरकोव्सकी को बदनाम किया. मिखाइल खोदोरकोव्सकी को तेल कंपनी यूकोस के सीईओ पद से हटा दिया गया, और जेल में डाल दिया. उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल काटी या देश छोड़ने पर मजबूर हो गए. खोदोरकोव्सकी को 2013 में स्विटजरलैंड में शरण लेनी पड़ी और उसी साल बोरिस बेरेजोव्सकी ब्रिटेन के अपने घर में मृत पाए गए थे.
2008: पुतिन बने प्रधानमंत्री
लेकिन, इसके बाद आया साल 2008 जो पुतिन के लिए भी बहुत अच्छा साबित नहीं हुआ. उनके राष्ट्रपति बनने की राह में संविधान आड़े आ गया, इसलिए वह 2008 में तीसरी बार राष्ट्रपति नहीं बन पाए और रूस के प्रधानमंत्री रहे, लेकिन इस दौरान पुतिन ने ये तैयारी कर रखी थी कि उन्हें भविष्य के लिए क्या करना है. प्रधानमंत्री बनने के दौर में उन्होंने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के कार्यकाल को 4 से 6 साल करने के लिए संविधान में संशोधन किया. उसके बाद 2012 में फिर से राष्ट्रपति बने. 6 साल तक इस पद पर रहने के बाद, साल 2018 में वह फिर से राष्ट्रपति चुने गए.
2014: क्रीमिया पर कब्जा, पुतिन की हुई घोर आलोचना
इससे पहले 2014 में राष्ट्रपति पद पर रहने के दौरान उनकी एक बार फिर घोर आलोचना हुई थी. वजह थी क्रीमिया पर कब्जा. सोवियत संघ के टूटने के बाद से ही रूस की नजर क्रीमिया पर टिकी थी. इसकी बड़ी वजह ब्लैक सागर में अपने वर्चस्व को कायम करना था. क्रीमिया रणनीति दृष्टि से बेहद उपयोगी क्षेत्र है. पुतिन यह जानते थे कि क्रीमिया के जरिए ही रूस ब्लैक सागर पर अपना वर्चस्व कायम कर सकता है. इसके लिए भी बाकायदा जनमत संग्रह कराया गया था. इस जनमत संग्रह में 97 फीसद लोगों ने रूस के साथ जाने पर अपनी सहमति जताई थी. इसके साथ रूस और क्रीमिया के अधिकारियों ने विलय संधि पर हस्ताक्षर किए थे. पुतिन को इसके लिए आलोचनाओं का सामना करना पड़ा. कानूनी तौर पर दुनिया में इस कब्जे को मान्यता नहीं दी है. क्रीमिया पर कब्जे के बाद ही अमेरिका व पश्चिमी देश रूस के खिलाफ हो गए और रूस पर कई तरह के प्रतिबंध लगे, तभी से अमेरिका और रूस के संबंध काफी बिगड़ गए हैं. हालांकि रूस या यूं कह लें, पुतिन पर कभी इसका असर पड़ता नहीं दिखा.
2015: पुतिन विरोधी नेता बोरिस नेम्त्सोव की हत्या
2015 की एक और घटना को पुतिन के खिलाफ विद्रोह और उसके दमन के तौर पर जाना जाता है. ये घटना थी, पुतिन विरोधी नेता बोरिस नेम्त्सोव की हत्या. उन्हें क्रेमलिन के बाहर ही गोली मारी गई थी. इस घटना को लेकर आज तक पुतिन पर आरोप लगते हैं कि ये हत्याकांड पुतिन के कहने पर हुआ था. बोरिस उनके विरोधी थे और इसे विरोध के दमन के तौर पर देखा जाता है. असल में साल 1990 के दशक में जब व्लादिमीर पुतिन का राजनीतिक कद बढ़ रहा था तो बोरिस नेम्त्सोव को रूसी राजनीति के हाशिये पर धकेल दिया गया था.
पुतिन ने ऐसे दबाए विरोध के सुर
जिसके बाद से बोरिस नेम्त्सोव रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के कड़े आलोचक बन गए थे. 2014 में यूक्रेन के क्रीमिया पर रूस ने कब्जा किया तो उन्होंने खुले तौर पर पुतिन की आलोचना की थी. उन्होंने भ्रष्टाचार को उजागर करने और पूर्वी यूक्रेन पर रूस के हमले की खुलकर निंदा की थी. 27 फरवरी 2015 को नेम्त्सोव की क्रेमलिन से कुछ ही गज की दूरी पर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. हत्या के कुछ दिन बाद ही बोरिस युद्ध के खिलाफ विरोध का नेतृत्व करने वाले थे.
इसके हत्या के बाद दूसरी चाल चली गई. नेम्त्सोव की हत्या के मामले में रूस ने तुरंत ही चेचेन मूल के पांच लोगों को गिरफ्तार किया था और इस हत्या के आरोप में उन्हें जेल भेज दिया था. चेचेन मूल के लोग पहले ही पुतिन के विरोधी के तौर पर शुमार थे. इस तरह एक तीर से दो निशाने साधने की कोशिश की गई. हालांकि पुतिन इसके बावजूद भी आज तक सवालों से बच नहीं पाए हैं. फिर भी उन्होंने विद्रोह और विरोध को दबा जरूर दिया है.
2018: डबल एजेंट सर्गेई स्क्रीपल को दिया गया जहर
साल 2018 में एक और खबर आई, जिसे पुतिन के द्वारा विद्रोह को कुचलने के उदाहरण के तौर पर ही देखा जाता है. इंग्लैंड में रूस के पूर्व जासूस सर्गेइ स्क्रीपल (66) और बेटी यूलिया(33) को जहर दिया गया था. सर्गेई स्क्रिपल रूसी मिलिट्री के रिटायर्ड अफसर थे, तब 2006 में उनको जासूसी करने के लिए जेल भेजा गया. सर्गेई स्क्रिपल को ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी एमआई-16 को रूस के यूरोप में मौजूद खुफिया एजेंट्स की जानकारी मुहैया कराने का दोषी माना गया था.
रूस ने दावा किया था कि एमआई-16 ने सर्गेई स्क्रिपल को इस जासूसी के बदले एक लाख डॉलर रुपये चुकाए थे. ये जानकारी सर्गेई साल 1990 से एमआई-16 को पहुंचा रहे थे. साल 2010 में रूस और अमरीका के बीच चार जासूसों की अदला-बदली हुई थी. सर्गेई इन चार जासूसों में शामिल थे. उन पर हुए जहर अटैक को रूस की बदले की नीति के तौर पर देखा गया था. इसी तरह साल 2020 में पुतिन विरोधी एलेक्सी नवलनी को भी जहर दिया गया था. बाद में उन्हें भी जेल भेज दिया गया.
2020 में किया राष्ट्रपति कार्यकाल में संशोधन, 2023 में येवगेनी का विद्रोह दबाया
साल 2020 में पुतिन ने संवैधानिक सुधार एक बार फिर करा लिए और इसके जरिए वह साल 2036 तक पद पर बने रह सकते हैं. ये पूरी टाइम लाइन ये बताती है कि विद्रोहों को लगातार कुचलते हुए पुतिन कैसे आगे बढ़ते आए हैं. एक बार फिर उन्होंने अपने खिलाफ हुए येवगेनी प्रेगोझिन के विद्रोह को दबाने में कामयाबी हासिल कर ली है. वैगनर सेना अब उल्टे पांव जा रही है.