शनिवार को दिल्ली में रोड रेज का दिल दहला देने वाला मामला आया, जिसमें गाड़ी किनारे करने पर हुए विवाद में दो युवकों ने एक डिलीवरी मैन की हत्या कर दी. शादीपुर गांव में हुई घटना के बाद से रोड रेज एक बार फिर चर्चा में है, यानी सड़क पर होने वाली मामूली घटनाओं के कारण आने वाला गुस्सा. गुस्से में लोग एक-दूसरे पर हमला कर तक बैठते हैं. इसमें वे हादसे भी शामिल हैं, जिसकी वजह कहीं न कहीं गुस्सा होता है, जैसे हाई स्पीडिंग या ओवरटेक करना. गर्मी में ये हादसे और बढ़ सकते हैं.
देशों की ड्राइविंग पर जारी हुआ डेटा
लगभग दो महीने पहले एक ग्लोबल इंश्योरेंस कंपनी कंपेयर द मार्केट (Comparethemarket) ने डेटा जारी किया, जिसके मुताबिक, भारतीय सबसे खराब ड्राइविंग करने वालों में से हैं. फरवरी में जारी सर्वे में ये देखने की कोशिश थी कि ड्राइविंग के मामले में कौन से देश कहां खड़े हैं. इसके लिए 50 से ज्यादा देशों को लिया गया.
कौन सा देश, कहां खड़ा?
थाइलैंड सबसे खराब ड्राइविंग वाले देशों में टॉप पर है, जिसके बाद पेरू, लेबनान और फिर भारत का नंबर आता है. मतलब इस सर्वे की मानें तो गाड़ी चलाने के मामले में हम भारतीय चौथे नंबर पर हैं. जापान में ड्राइविंग सबसे सेफ मानी जाती है. यहां लोग नियम भी मानते हैं, और सड़कें भी सुरक्षित हैं. इसके बाद नीदरलैंड, नॉर्वे और फिर एस्टॉनिया का नंबर है. एक और स्कैंडिनेवियाई देश स्वीडन 5वीं पोजिशन पर है. ये सभी देश आमतौर पर कम तापमान वाले देश हैं.
क्या मौसम का भी होता है असर?
सेफ ड्राइविंग कंट्री का आंकड़ा निकालते हुए कई मानक लिए गए. इसमें गाड़ी चलाते हुए अल्कोहल लेना, सड़क खराब होना या नियमों की जानकारी न होना जैसे फैक्टर शामिल हैं. हालांकि एक बड़ी वजह इससे छूट गई, वो है किसी देश का मौसम. माना जाता है कि मौसम का भी गाड़ी चलाने वाले के मूड पर असर होता है. वैसे इसपर ताजा डेटा नहीं, लेकिन साल 2019 में यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया ने एक स्टडी में बताया कि मौसम का भी ट्रैफिक अपराधों यानी रोड रेज पर असर दिखता है.
क्या कहती है स्टडी?
अध्ययन ऑस्ट्रेलियाई शहर पर्थ में हुआ, जिसमें जनवरी-फरवरी के दौरान का ट्रेंड नोटिस किया गया. ये दक्षिणी हेमिस्फेयर के सबसे गर्म महीने हैं, जिसमें तापमान 31 से 35 डिग्री सेल्सियस तक चला जाता है. इसी दौरान वहां साल की सबसे ज्यादा सड़क दुर्घटनाएं हुईं. इसमें गुस्से में आकर मारपीट भी थी, और हाई-स्पीडिंग भी.
सोचने की बात है कि जब 35 डिग्री सेल्सियस पर ड्राइवर आपा खो सकते हैं तो हमारे यहां तो पारा 45 पार चला जाता है. ऐसे में छोटी-मोटी बात भी ड्राइवर को गुस्सा दिला सकती है. इसपर कोई सीधा-सपाट सर्वे नहीं मिलता, जो बता सके कि गर्मियों में रोड रेज के केस कितने बढ़ जाते हैं, लेकिन टेंपरेचर से आक्रामकता का संबंध जरूर पता लगता है.
क्लाइमेट का पड़ता है एग्रेशन पर असर
कई अध्ययन जोर देते हैं कि गर्म देशों के मौसम का अपराध से डायरेक्ट नाता है. एम्सटर्डम की व्रिजे यूनिवर्सिटी ने इसपर एक स्टडी की, जिसके नतीजे बिहेवियरल एंड ब्रेन साइंसेज में छपे. इसमें वैज्ञानिकों ने देखा कि आम लोग, जो क्रिमिनल दिमाग के नहीं होते, वो एकदम से अपराध कैसे कर बैठते हैं. इसके लिए क्लैश (CLASH) यानी क्लाइमेट, एग्रेशन और सेल्फ कंट्रोल इन ह्यूमन्स को वजह माना गया. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, लोग जिस क्लाइमेट में रहते हैं, वो गुस्से को उकसाता या उसपर कंट्रोल करता है.
सर्द मुल्कों में कम अपराध
ठंडी जगहों पर रहने वालों में सेल्फ कंट्रोल ज्यादा दिखता है, बजाए गर्म जगहों के रहनेवालों से. क्लाइमेट और इंसानी व्यवहार पर लगभग 60 अलग-अलग स्टडीज को देखने के बाद ये माना गया कि गर्म या ठंडे मौसम से सेल्फ-कंट्रोल सीधे प्रभावित होता है. इसके लिए एक्सपर्ट्स ने यूएन के डेटा का भी सहारा लिया, जो बताता है कि दुनिया के किन हिस्सों में कितनी हत्याएं होती हैं. स्कैंडिनेवियाई और नॉर्डिक देश इसमें सबसे नीचे हैं. यहां सबसे कम अपराध होते हैं और ये बेहद ठंडे देश हैं.
ग्लोबल वार्मिंग के साथ ही बढ़ेगा क्राइम
साल 1995 में आया जनरल एग्रेशन मॉडल (GAM) भी इस बात पर जोर देता है कि कैसे मौसम का ठंडा या गर्म होना गुस्से पर असर डालता है. इसमें ड्राइविंग के दौरान आने वाले गुस्से पर अलग से बात नहीं हुई, बल्कि गर्मी से गुस्से को जोड़ा गया. क्लाइमेट चेंज एक्सपर्ट इसके बाद से डर जता रहे हैं कि आने वाले समय में जब ग्लोबल वार्मिंग बढ़ेगी तो अपराध की दर भी अपने-आप ही बढ़ जाएगी.
अमेरिका में कई गुना बढ़ जाएगा क्राइम रेट
नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में छपे एक अध्ययन के अनुसार सिर्फ अमेरिका में ही अपराध 25 से 80 गुना तक बढ़ सकते हैं. हॉट इयर्स एंड सीरियल एंड डेडली असॉल्ट नाम से छपी स्टडी कई दूसरे डरावने ट्रेंड्स की बात करती है.
अब लौटते हैं खराब ड्राइविंग पर, तो कंपेयर द मार्केट का ताजा डेटा इसी तरफ इशारा करता है. सबसे खराब गाड़ी चलाने वालों में उन सारे देशों का नाम है, जहां का मौसम गर्म रहता है. जबकि बेहतर ड्राइविंग में लगभग वही देश हैं, जहां का मौसम ठंडा रहता है. हालांकि इस बात में भी जरा पेंचिदगी है. कई दूसरी रिपोर्ट्स ऐसी हैं, जिसमें ड्राइविंग के लिए खतरनाक देशों का क्रम बदल जाता है. जैसे साल 2019 में रूस को रोड रेज और रैश ड्राइविंग दोनों के ही मामले में सबसे खराब मुल्क माना गया था.
क्यों रूसी ड्राइवरों को आता है गुस्सा!
यूरोप में कार पार्ट्स सेलिंग कंपनी मिस्टर ऑटो ने 2019 में ड्राइविंग सिटीज इंडेक्ट जारी किया था, जिसका डेटा चौंकाता है. इसकी मानें तो दुनिया में सबसे ज्यादा रोड रेज के मामले मंगोलिया की राजधानी उलानबतार में होते हैं, जिसके बाद रूस के मॉस्को का नंबर है. सर्वे में कुल 100 बड़े शहरों को लिया गया. उन्हें 15 अलग-अलग मानकों पर देखा गया, जिसमें सड़कें भी थीं और ड्राइवर का व्यवहार भी. इसी दौरान दिखा कि रूस के लगभग सभी बड़े शहरों में रोड रेज की घटनाएं होती हैं.
ये हो सकती है वजह
रोड रेज रैंकिंग में उलानबतार को 100 में से 99.1 अंक मिले, जबकि मॉस्को को 98.5. ये ठंडा देश है, लेकिन तब भी यहां ड्राइवरों को गुस्सा कैसे आ जाता है, इसकी कोई पक्की वजह नहीं मिल सकी. हालांकि इसका एक कारण ये भी हो सकता है कि मॉस्को में पेट्रोल-डीजल काफी सस्ता है और पार्किंग चार्ज भी दूसरे देशों की तुलना में काफी कम है. ऐसे में सड़क पर गाड़ियां लेकर निकले लोग फर्राटे से भगाते हुए आपस में ही कंपीटिशन करने लगते होंगे और रैश ड्राइविंग में ही रोड रेज का प्रतिशत भी बढ़ता होगा.
यूके में भी ज्यादा हैं रोड रेज की घटनाएं
अपेक्षाकृत ठंडे देश यूनाइटेड किंगडम में भी रोड रेज का प्रतिशत काफी ज्यादा है. कंपेयर द मार्केट के यूके बेस्ट सर्वे में दिखा कि वहां 62 प्रतिशत ड्राइवर गुस्से में रहते हैं. यहां तक कि उनमें से लगभग 30 प्रतिशत ने किसी न किसी ड्राइवर के साथ लड़ाई-झगड़ा किया या झेला होता है. समय के साथ रोड रेज बढ़ता जा रहा है, और वहां लगभग 20 प्रतिशत ड्राइवर हफ्ते में एक बार सड़क पर गुस्से का शिकार होते हैं.