श्रीलंका के लिए नए साल की शुरुआत किसी दुःस्वप्न की तरह हुई है. हालांकि, तारीख बदलने से तवारीख (इतिहास) नहीं बदल जाता. मतलब 31 दिसंबर से एक जनवरी में आना बदलाव का कारण नहीं हो सकता.
अतीत की दुश्वारियों का रिश्ता वर्तमान से सीधा होता है. पिछले कुछ सालों से श्रीलंका जिस आर्थिक संकट में घिरता दिख रहा था, वो अब भयावह रूप ले चुका है और दिवालिया होने की कगार पर है.
श्रीलंका क्षेत्रफल के मामले में तमिलनाडु का लगभग आधा है. आबादी करीब सवा दो करोड़ है. श्रीलंका की जीडीपी में पर्यटन क्षेत्र का योगदान 10 फीसदी से ज्यादा है.
कोविड महामारी ने पहले पर्यटन को चौपट किया और रही सही कसर चीन के कर्जों से पूरी हो रही है. चीन के बारे में यह धारणा सच के करीब है कि वो कर्ज डिप्लोमैसी से कमजोर देशों को फंसाता है और फिर अपने हिसाब से उस देश में नीतियां बनवाता है.
श्रीलंका को हंबनटोटा पोर्ट चीन को कर्ज नहीं चुका पाने के बदले में ही 100 साल की लीज पर देना पड़ा था. लेकिन चीनी कर्ज का यह अंत नहीं था.
बढ़ती महंगाई
श्रीलंका का आर्थिक संकट गंभीर मानवीय संकट के रूप में बदलता दिख रहा है. महंगाई रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ रही है. खाने-पीने की चीजें भी लोगों की पहुंच से हर दिन बाहर होती जा रही हैं. खजाने लगभग खाली हो चुके हैं. 2022 में श्रीलंका दिवालिया घोषित हो जाए तो इसमें कोई हैरानी नहीं होगी.
श्रीलंका की सरकार की कमान राजपक्षे परिवार के पास है. एक भाई गोटाभाया राजपक्षे राष्ट्रपति हैं तो दूसरे भाई महिंदा राजपक्षे प्रधानमंत्री हैं. राजपक्षे परिवार के पास ही सारी अहम शक्तियां सीमित हैं.
कोविड महामारी, पर्यटन उद्योग की तबाही, बढ़ते सरकारी खर्च और टैक्स में जारी कटौती के कारण सरकारी खजाना खाली हो चुका है. इसके साथ ही कर्जों के भुगतान का दबाव भी बढ़ता जा रहा है लेकिन विदेशी मुद्रा भंडार ऐतिहासिक रूप से सबसे निचले स्तर पर है.
विश्व बैंक के अनुमान के मुताबिक, महामारी की शुरुआत से अब तक पांच लाख लोग गरीबी रेखा से नीचे चले गए हैं. नवंबर में महंगाई दर रिकॉर्ड 11.1% पर पहुंच गई थी. दिसंबर में खाने-पीने के सामान 22.1 फीसदी महंगे हो गए.
श्रीलंका अब खाने-पीने के सामान की कमी से जूझ रहा है. इतने पैसे नहीं हैं कि खाद्य सामग्री की आपूर्ति आयात के जरिए की जाए. श्रीलंका में लोगों के लिए तीन वक्त का खाना भी मुश्किल हो गया है.
श्रीलंका की राजपक्षे सरकार आर्थिक आपातकालीन स्थिति की घोषणा पिछले साल ही कर चुकी थी. सेना को जरूरी सामान की आपूर्ति सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी गई थी. यहां तक कि चीनी और चावल के लिए सरकारी कीमत तय की गई लेकिन इससे भी लोगों की मुश्किलें खत्म नहीं हुईं.
ब्रिटिश अखबार द गार्डियन से श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में अनुरुद्दा परांगमा नाम के एक टैक्सी ड्राइवर ने कहा कि वो गाड़ी का लोन चुकाने के लिए दूसरा काम भी करते हैं लेकिन फिर भी नाकाफी साबित हो रहा है. उन्होंने कहा, ''मेरे लिए गाड़ी का लोन चुकाना बहुत मुश्किल है. बिजली, पानी और खाने-पीने के खर्चों के बाद कुछ बचता नहीं है कि गाड़ी का लोन अदा कर सकूं. मेरा परिवार तीन टाइम के बदले दो वक्त ही खाना खा रहा है.''
खाद्य संकट
अनुरुद्दा ने बदहाली की सच्चाई बयां करने के लिए एक मिसाल दी. उन्होंने कहा, ''मेरे गांव की दुकान में एक किलो दूध पाउडर के पैकेट को खोल 100-100 ग्राम के पैक तैयार किए जाते हैं क्योंकि लोग एक किलो का पैकेट नहीं खरीद सकते. अब हम 100 ग्राम बीन्स से ज्यादा नहीं खरीद पाते हैं.''
पर्यटन से श्रीलंका में विदेशी मुद्रा आती थी और लोगों को रोजगार भी मिलता था लेकिन कोविड महामारी ने उसे भी तबाह कर दिया. वर्ल्ड ट्रैवेल एंड टूरिजम काउंसिल के अनुसार, श्रीलंका में दो लाख से ज्यादा लोगों की पर्यटन क्षेत्र से नौकरियां गई हैं.
श्रीलंका के स्थानीय अखबारों की रिपोर्ट के अनुसार, श्रीलंका के पासपोर्ट ऑफिस में लंबी लाइनें लग रही हैं. श्रीलंका में पढ़े लिखे नौजवानों में हर चार में से एक देश छोड़ना चाहता है. अभी की हालत श्रीलंका के बुजुर्गों को 1970 के दशक की याद दिला रही है, जब आयात नियंत्रण और देश के भीतर कम उत्पादन के कारण बुनियादी सामानों के लिए लंबी लाइनों में खड़ा होना पड़ता था.
श्रीलंका के केंद्रीय बैंक के पूर्व उप-गवर्नर वा विजेवार्देना ने चेतावनी दी है कि आम लोगों के टकराव से आर्थिक संकट और गहराएगा. उन्होंने कहा है कि लोगों की जिंदगी और मुश्किल होने वाली है.
उन्होंने कहा है, ''जब आर्थिक संकट काबू से बाहर हो जाएगा तो स्थिति और बदतर होगी. खाद्य संकट भी बढ़ने की आशंका है क्योंकि उत्पादन कम हो रहा है और आयात के लिए पैसे नहीं हैं. इस स्थिति में मानवीय संकट से बचना मुश्किल होगा.''
श्रीलंका की अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या है, बढ़ता विदेशी कर्ज. खास करके चीन का कर्ज. श्रीलंका पर चीन का पांच अरब डॉलर से ज्यादा का कर्ज है. पिछले साल श्रीलंका ने आर्थिक संकट से बचने के लिए एक अरब डॉलर का कर्ज और लिया था.
अब इन कर्जों का भुगतान करने की बारी है. अगले 12 महीनों में श्रीलंका की सरकार और वहां के निजी सेक्टर को एक अनुमान के मुताबिक घरेलू और विदेशी कर्जों के रूप में 7.3 अरब डॉलर का भुगतान करना है. इसमें 50 करोड़ डॉलर का अंतरराष्ट्रीय सॉवरेन बॉन्ड भी शामिल है. इसका भुगतान तो जनवरी में ही करना है. दूसरी तरफ नवंबर तक श्रीलंका के विदेशी मुद्रा भंडार 1.6 अरब डॉलर ही बचा था.
राजपक्षे सरकार के मंत्री रमेश पाथिरना ने कहा है कि तेल आयात के बिल का भुगतान चाय के जरिए करने की कोशिश की जा रही है. उन्होंने कहा है कि ईरान को श्रीलंका तेल के पैसे के बदले 50 लाख डॉलर की हर महीने चाय भेज रहा है. उन्होंने कहा कि इससे विदेशी मुद्रा की कमी पूरी करने में मदद मिलेगी.
कर्ज चुकाने के लिए पैसे नहीं
श्रीलंका के विपक्षी सांसद और अर्थशास्त्री हर्ष डीसिल्वा ने हाल ही में संसद में कहा था, ''इस साल जनवरी में श्रीलंका के पास कुल विदेशी मुद्रा माइनस 43.7 करोड़ डॉलर होगी जबकि फरवरी में कर्ज चुकाने के लिए 4.8 अरब डॉलर की जरूरत पड़ेगी. ऐसे में श्रीलंका पूरी तरह से दिवालिया ही होगा.''
श्रीलंका के केंद्रीय बैंक के गवर्नर अजिथ निर्वाद कैबराल ने आश्वस्त किया है कि श्रीलंका धीरे-धीरे विदेशी कर्ज चुका देगा लेकिन श्रीलंका के केंद्रीय बैंक के पूर्व उप-गवर्नर वा विजेवार्देना के अनुसार, श्रीलंका के डिफॉल्टर होने का पूरा खतरा है और ऐसा हुआ तो इसके बहुत बुरे अंजाम होंगे.
पिछले साल राजपक्षे सरकार ने अचानक से सभी तरह के उर्वरक और कीटनाशकों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी थी. किसानों को सरकार ने ऑर्गेनिक खेती करने पर मजबूर किया था. सरकार के इस फैसले ने किसानों को घुटने के बल ला दिया था.
किसानों के लिए उर्वरक और कीटनाशक के बिना खेती करना मुश्किल था. इसका नतीजा यह हुआ कि घाटे के डर से किसानों ने खेती करना बंद कर दिया. श्रीलंका में खाने-पीने की चीजों की आपूर्ति में आई कमी के लिए सरकार का यह फैसला भी जिम्मेदार है. पिछले साल अक्टूबर महीने में सरकार ने नाटकीय रूप से यूटर्न लिया लेकिन अब किसान ऊंची कीमत पर आयातित उर्वरक लेने के लिए मजबूर हैं.
अनाज की कीमत अचानक से बढ़ गई क्योंकि उर्वरक महंगे मिल रहे हैं. वहां के किसानों का कहना है कि सरकार के पास पैसे नहीं है कि उर्वरक पर सब्सिडी दे. किसान खेती में पैसा निवेश करने से बच रहे हैं क्योंकि वे लाभ को लेकर आश्वस्त नहीं हैं.
राजपक्षे सरकार स्थिति को तात्कालिक रूप से संभालने के लिए भारत से मदद ले रही है. राजपक्षे सरकार भारत, बांग्लादेश और चीन से करेंसी की अदला-बदली कर रही है. लेकिन इन कदमों से बहुत कम अवधि के लिए मदद मिल सकती है.
कर्ज नहीं चुकाने के कारण ही चीन से महीनों बातचीत के बाद श्रीलंका को हंबनटोटा पोर्ट के साथ 15000 एकड़ जमीन भी सौंपनी पड़ी थी. श्रीलंका ने चीन को जो इलाका सौंपा है, वो भारत से महज 100 मील की दूरी पर है. भारत के लिए इसे सामरिक रूप से खतरा बताया जा रहा है. ऐसे में, श्रीलंका का नया आर्थिक संकट भारत के लिए भी चिंता का विषय है.