श्रीलंका के हंबनटोटा पोर्ट पर हाल में चीन का एक जहाज डॉकिंग के लिए पहुंचा और इस पर भारत ने अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी. अब इस घटना के कुछ दिन बाद श्रीलंका के राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे ने इशारों-इशारों में अपने देश की नीति साफ कर दी है. आर्थिक संकट से जूझ रहे श्रीलंका के बारे में उन्होंने कहा कि वह नहीं चाहते कि प्रशांत महासागर क्षेत्र जैसी समस्याएं अब हिन्द महासागर क्षेत्र में भी आएं. साथ ही हिन्द महासागर की भू-राजनीतिक व्यवस्था की वजह से दुर्भाग्यवश हंबनटोटा के लिए श्रीलंका को 'पंचिंग बैग' बना दिया गया है. ऐसे में श्रीलंका इस क्षेत्र में 'बड़ी शक्तियों की वर्चस्व की लड़ाई' में भागीदार नहीं होगा.
नहीं चाहते हिन्द महासागर बने रण क्षेत्र
विक्रमसिंघे बुधवार को नेशनल डिफेंस कॉलेज के दीक्षांत समारोह में ग्रेजुएट बच्चों को संबोधित कर रहे थे. उन्होंने कहा- हम किसी सैन्य गठबंधन में भाग नहीं लेते हैं. वहीं हम नहीं चाहते कि प्रशांत महासागर क्षेत्र की परेशानियां हिन्द महासागर क्षेत्र मे आएं. हम इस जगह को संघर्ष या रण क्षेत्र नहीं बनाना चाहते. अगर बड़ी शक्तियां कोई लड़ाई लड़ती हैं, तो श्रीलंका उसका भागीदार नहीं होगा.
रानिल विक्रमसिंघे का ये बयान इसलिए भी अहम है क्योंकि कुछ दिन पहले चीन का एक जहाज 'युआन वांग 5' दोबारा ईंधन भरवाने श्रीलंका के हंबनटोटा पोर्ट पहुंचा था. चीन के जहाज की इस डॉकिंग को लेकर चीनी राजूदतावास और भारतीय उच्चायोग के बीच वाकयुद्ध की स्थिति देखी गई थी.
हंबनटोटा के लिए बनाया 'पंचिंग बैग'
हंबनटोटा पोर्ट को लेकर रानिल विक्रमसिंघे ने कहा कि हिन्द महासागर की जियोपॉलिटिक्स के चलते श्रीलंका को इस पोर्ट की वजह से पंचिंग बैग बना दिया गया है. लेकिन ये कोई सैन्य बंदरगाह नहीं, बल्कि हमारा एक कमर्शियल बंदरगाह है. ये बंदरगाह हमारे रणनीतिक महत्व को दर्शाता है.''
संकट के बीच बनी मिली-जुली सरकार
श्रीलंका के राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे पहले देश के प्रधानमंत्री का पद भी संभाल चुके हैं. देश में आर्थिक संकट के बीच एक मिली-जुली सरकार बनी है. 30 अगस्त को खुद राष्ट्रपति विक्रमसिंघे ने सभी राजनीतिक दलों से आग्रह किया था कि वो सभी पार्टियों की इस सरकार में शामिल हों और देश को इस भयानक आर्थिक संकट से उबारने में मदद करें.