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बुर्के से किसको डर? बैन से कितना असर?...स्विट्जरलैंड के फैसले पर क्या कह रहे इस्लामिक स्कॉलर

स्विटजरलैंड में बुर्का बैन कानून लागू हो गया है जिसके बाद वहां की मुस्लिम महिलाओं के बुर्का या हिजाब पहनने पर रोक लग गई है. इसे लेकर इस्लामिक विद्वानों का कहना है कि महिला क्या पहनेगी, इसके चुनाव का अधिकार महिला के पास ही होना चाहिए.

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स्विटजरलैंड में बुर्का बैन कानून लागू हो गया है (Photo- AFP)
स्विटजरलैंड में बुर्का बैन कानून लागू हो गया है (Photo- AFP)

बुर्का, नकाब, हिजाब, चादर, अबाया... मुस्लिम महिलाओं के शरीर को ढकने वाले ये कपड़े अकसर विवादों के केंद्र में रहे हैं. कहीं इस तरह के इस्लामिक ड्रेस कोड को सख्ती से लागू करने की बात सामने आती है तो कहीं इन पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है. हाल ही में यूरोपीय देश स्विटजरलैंड ने मुस्लिम महिलाओं के बुर्का और नकाब पहनने पर रोक लगा दी. अब वहां की मुस्लिम महिलाएं सार्वजनिक जगहों और आम जनता के पहुंच वाली निजी इमारतों में बुर्का नहीं पहन सकतीं. अगर वो 'बुर्का बैन' कानून का उल्लंघन करती हैं तो उन्हें जुर्माने के रूप में 1,000 स्विस फ्रैंक (94,651.06 रुपये) जुर्माना भरना होगा.

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स्विटजरलैंड में नकाब पहनने पर रोक को लेकर साल 2009 में तत्कालीन न्याय मंत्री एवलीन विडमर ने खूब वकालत की थी. उन्होंने कहा था कि अगर महिलाएं बड़ी संख्या में नकाब पहनने लगे तो इसपर प्रतिबंध लगाने को लेकर विचार किया जाना चाहिए. सितंबर 2013 में स्विटजरलैंड के 26 प्रांतों में से एक तिसिनो के लोगों ने सार्वजनिक जगहों पर चेहरा ढकने पर प्रतिबंध का समर्थन किया था. एक दशक से भी अधिक समय बाद अब पूरे स्विटजरलैंड में सार्वजनिक स्थानों पर नकाब पहनने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. 

स्विटजरलैंड में कितने मुसलमान?

स्विट्जरलैंड की 86 लाख की आबादी में मुसलमानों की संख्या लगभग 5 प्रतिशत है, जिनमें से अधिकांश मुस्लिम निवासी तुर्की, बोस्निया और कोसोवो जैसे देशों से आए हैं. स्विटजरलैंड के University of Lucerne में एक स्टडी की गई थी जिसमें बताया गया कि देश में नकाब पहनने वाली महिलाओं की संख्या बेहद कम है. वहां की गिनी-चुनी महिलाएं ही नकाब पहनती हैं.

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स्विटजरलैंड में बुर्का बैन कानून का प्रस्ताव दक्षिणपंथी पार्टी स्विस पीपुल्स पार्टी ने दिया था. पार्टी ने 'चरमपंथ रोको' (Stop Extremism) के नारे साथ बुर्का के खिलाफ अपनी कैंपेन चलाई थी. पार्टी का तर्क था कि 'आजाद लोग अपने चेहरे नहीं ढकते, बुर्का और नकाब सामान्य कपड़े नहीं है बल्कि ये महिलाओं के शोषण का प्रतीक हैं.'

पार्टी के प्रस्ताव में भले ही इस्लाम को टार्गेट नहीं किया गया था लेकिन आलोचकों का कहना है कि कानून मुसलमानों को निशाना बनाने के लिए लाया गया है.

स्विटजरलैंड के मुस्लिम अधिकार संगठन ने जताया था विरोध

बुर्का पर प्रतिबंध 2021 के एक जनमत संग्रह के आधार पर किया गया है जिसमें स्विटजरलैंड के नागरिकों ने चेहरा ढकने के विरोध में वोट किया था. जनमत संग्रह में कानून के पक्ष में 51.2 प्रतिशत और कानून के विरोध में 48.8% वोट पड़े थे. 

जनमत संग्रह से ठीक पहले स्विटजरलैंड के सबसे बड़े मुस्लिम अधिकार समूह इस्लामिक सेंट्रल काउंसिल ऑफ स्विटजरलैंड की प्रवक्ता जेनिना रशीदी ने कहा था कि कपड़ों को लेकर महिलाओं को टार्गेट करना उन्हें दोयम दर्जे का स्विस नागरिक मानना है.

उन्होंने कहा था, 'आप महिलाओं को कुछ पहनने के लिए अपराधी बना रहे हैं. मैं समझ सकती हूं कि कुछ लोगों के लिए चेहरा ढकना अजीब लग सकता है, लेकिन हमारे समाज में ऐसी कई चीजें हैं जो किसी न किसी को अजीब लगती हैं जैसे लोगों का चेहरे पर टैटू कराना.'

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रशीदी ने कहा कि ऐसे कानून मुसलमानों में इस भावना को मजबूत करते हैं कि उन्हें देश का पूर्ण नागरिक नहीं माना जाता, भले ही उन्होंने अपना अधिकांश जीवन इस देश में बिता दिया हो.

'बुर्का बैन' कानून की आलोचना

मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने बुर्का बैन कानून का विरोध किया है और इसे 'खतरनाक' बताया है. संगठन ने कहा है कि कानून महिला अधिकारों, उनकी अभिव्यक्ति की आजादी और उनके धर्म के अधिकार का हनन करता है.

भारत की इस्लामिक संस्था जमात-ए-इस्लामी हिंद के राष्ट्रीय सचिव डॉ. मोहिउद्दीन गाजी ने भी स्विटजरलैंड के बुर्का बैन कानून की आलोचना की है. वो कहते हैं, 'एक औरत क्या पहनेगी, क्या नहीं पहनेगी, ये चुनने का हक केवल उसे है. दिक्कत ये है कि यूरोप में उसका ये हक छीन लिया गया. ये गलत है... उसके पास ये च्वॉइस होनी चाहिए कि वो क्या पहने. अगर किसी महिला को लगता है कि उसे अपना चेहरा ढकना चाहिए तो वो ढके और अगर उसे लगता है कि चेहरा न ढकने से कोई दिक्कत नहीं तो वो चेहरा न ढके.'

वहीं, जामिया मिलिया इस्लामिया में डिपार्टमेंट ऑफ इस्लामिक स्टडीज के अध्यक्ष, प्रोफेसर इक्तिदार मोहम्मद खान का कहना है स्विटजरलैंड ने सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा ढकने से रोकने के लिए कानून बनाया है जिससे दिक्कत नहीं होनी चाहिए.

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वो कहते हैं, 'पर्दा करना या चेहरा ढकना मजहबी आस्था का मामला है जिसमें किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए लेकिन वहां के मुसलमानों को भी चाहिए कि पर्दे की आड़ में कुछ ऐसा काम नहीं हो जिससे वहां की हुकूमत में ये शक पैदा हो कि बुर्का ओढ़कर गलत काम किए जा रहे हैं. ये दोनों तरफ की जिम्मेदारी है.'

स्विटजरलैंड के बुर्का बैन कानून के आलोचकों का एक तर्क ये भी है कि बहुत सी मुस्लिम महिलाएं इस्लाम में अपनी आस्था दिखाने के रूप में नकाब या बुर्का पहनती हैं. प्रतिबंध से उनकी इस आस्था को ठेस पहुंचेगा. 

बुर्का और नकाब को लेकर क्या कहता है इस्लाम धर्म?

सबसे पहले जान लेते हैं कि आखिर बुर्का और नकाब होता क्या है. बुर्का सामान्यतः काले रंग की एक ढीली-ढाली ड्रेस होती हैं जिसमें शरीर, चेहरा और यहां तक कि आंखें भी जालीदार पैटर्न से ढकी हुई होती हैं. आंखों के ऊपर जालीदारी पैटर्न इसलिए बनाया जाता है ताकि महिला को दिखाई दे सके.

वहीं, नकाब केवल सिर और गले, कंधों को ढकता है. नकाब भी आमतौर पर काले रंग का होता है जो सिर के ऊपर से चेहरे पर डाला जाता है. इसमें चेहरा तो ढका रहता है लेकिन आंखों का हिस्सा खुला रहता है. इस्लाम धर्म में चेहरा ढकने के लिए इन दोनों ही पांरपरिक परिधानों का खूब इस्तेमाल किया जाता है.

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प्रो. इक्तिदार खान कहते हैं कि इस्लाम की सबसे पवित्र किताब कुरान में दो जगह परदे का जिक्र किया गया है. वो समझाते हैं, 'परदे का मतलब ये हुआ कि औरतों के वो तमाम जिस्मानी हिस्से, जिससे यौन इच्छा पैदा होती हो, उसे मर्दों की नजर से बचाना है. हालांकि, इस्लाम में मर्दों के लिए भी कहा गया है कि उन्हें अपनी नजर पर नियंत्रण रखना है, उनके लिए भी परदा है.'

वो बताते हैं कि आम मुस्लिम महिलाओं के लिए कुरान में कहा गया है कि वो चादर से अपने उन सभी अंगों को ढक लें जिन्हें देखने से किसी पुरुष के मन में गलत ख्याल आते हों.

वहीं, डॉ. गाजी कहते हैं, 'कुरान में कहा गया कि मर्दों की नजरें पड़ती हैं और औरतें उस वजह से परेशान होती है, असुरक्षित महसूस करती हैं इसलिए वो खुद को जितना ज्यादा ढकेंगी, उतनी ज्यादा सुरक्षित रहेंगी. ये मामला महिला की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है. लेकिन इसमें महिला की पसंद नापसंद का ख्याल रखना चाहिए.'

'दुनिया में बढ़ रहा इस्लामोफोबिया'

यूरोप और दुनिया के देशों में इस्लामिक कपड़ों पर लग रहे प्रतिबंध, कुरान के अपमान की बढ़ती घटनाओं के संदर्भ में प्रोफेसर इक्तिदार खान का कहना है कि दुनियाभर में इस्लामोफोबिया बढ़ता जा रहा है. वो कहते हैं कि मुसलमानों से जुड़ी हर चीज पर पाबंदी लगाने की कोशिश की जा रही है.

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उन्होंने कहा, 'आजकल इस्लामोफोबिया हो गया है दुनियाभर में... मुसमलानों की हर चीज से नफरत की प्रवृति बढ़ रही है, उनकी हर चीज को शक की निगाह के देखा जा रहा है. भारत की ही बात कर लीजिए... यहां राजस्थान की महिलाएं घूंघट से अपना पूरा चेहरा ढकती हैं. भारत में अगर कोई ऐसा कानून आए तो क्या ये महिलाएं अपना घूंघट उतार देंगी? वो लड़ने खड़ी हो जाएंगी क्योंकि उनका घूंघट का रिवाज तो बुर्के से भी पुराना है.'

यूरोप के और किन देशों में इस्लामिक कपड़ों पर लगा है प्रतिबंध

यूरोपीय देशों में बुर्का, हिजाब, नकाब जैसे इस्लामिक कपड़ों पर प्रतिबंध लगाने में तेजी तब आई जब अमेरिका पर 11 सितंबर 2001 को कट्टरपंथी इस्लामिक आतंकी संगठन अल-कायदा का हमला हुआ. इस हमले के बाद फ्रांस यूरोपीय संघ का पहला देश बना जिसने 2010 में सार्वजनिक स्थानों पर बुर्का और नकाब पहनने पर प्रतिबंध लगा दिया. फ्रांस का तर्क था कि ये इस्लामिक कपड़े शोषण का प्रतीक हैं.

फ्रांस ने वैसे मार्च 2004 में ही एक नियम बना दिया था जिसके तहत स्कूलों में धर्म से जुड़े प्रतीकों को पहनने पर मनाही हो गई थी. 

फ्रांस में पहले हिजाब पर बैन लगा था और साल 2023 में मुस्लिम बच्चियों के अबाया पहनकर स्कूल जाने पर भी रोक लग गई थी. अबाया बैगी की तरह ढीली-ढाली पोशाक होती है जिसे महिलाएं बाहर जाते वक्त अपने सामान्य कपड़ों पर पहन लेती हैं. इससे उनके शरीर का आकार छिप जाता है.

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Credit- Reuters

अबाया इराक और सीरिया की मुस्लिम महिलाएं पहनती थीं जो 80 साल पहले खाड़ी के अरब देशों से होते हुए उत्तरी अफ्रीका फिर यूरोप के कुछ देशों तक पहुंचा. फ्रांस के स्कूलों में अबाया पर प्रतिबंध का मुसलमानों ने भारी विरोध किया था. उनका कहना था कि अगर बच्चियों को शॉर्ट्स, लैगिंग्स पहनकर बाहर निकलने की आजादी है तो मुस्लिम लड़कियों को अबाया पहनने से क्यों रोका जा रहा है.

फ्रांस में मुस्लिम महिलाओं के स्विमसूट बुर्किनी पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया था. मुस्लिम महिलाएं सार्वजनिक स्विमिंग पुलों में नहाते वक्त इसे पहनती थी जिस पर 2016 में बैन लगा दिया गया. हालांकि, जब विवाद हुआ तो फ्रांस की शीर्ष अदालत ने बुर्किनी पहनने पर लगा प्रतिबंध हटा लिया था.

फ्रांस में लगभग 50 लाख मुस्लिम महिलाएं हैं लेकिन इनमें से महज 2 हजार महिलाएं ही चेहरा ढकने के लिए बुर्के का इस्तेमाल करती हैं.

फ्रांस के बाद ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, बुल्गारिया, डेनमार्क जैसे देशों ने भी बुर्का और नकाब को प्रतिबंधित कर दिया. इटली के कुछ इलाकों, नीदरलैंड्स के सार्वजनिक स्थानो और स्पेन के कुछ हिस्सों में भी इस्लामिक कपड़ों पर प्रतिबंध लगाए गए.

जुलाई 2021 में यूरोपीय संघ के कोर्ट ने एक नियम बनाया जिसमें यह कहा गया कि सरकारी नौकरी कर रही महिलाएं अगर अपने काम के दौरान हिजाब नहीं उतारतीं तो उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाएगा.

ब्रिटेन ने भी अपने स्कूलों में हिजाब, नकाब समेत धार्मिक कपड़ों को पहनने पर प्रतिबंध लगा रखा है. हालांकि, स्कूलों के अलावा किसी अन्य जगह पर इस्लामिक ड्रेस कोड फॉलो करने पर कोई रोक नहीं है.

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