यूक्रेन-रूस तनाव के बीच भारत के तटस्थ रुख की चर्चा खूब हो रही है. भारत ने मंगलवार को हालिया तनाव पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि सभी पक्षों को संयम रखने की जरूरत है.
भारत ने दोनों पक्षों से तनाव कम करने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि कूटनीतिक बातचीत से ही समस्या का समाधान हो सकता है. भारत के इस रुख के बीच यूक्रेन के विदेश मंत्री दिमित्रो कुलेबा का एक बयान चर्चा में है, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत इस तनाव को खत्म करने में अहम भूमिका निभा सकता है.
क्या कहा था यूक्रेन के विदेश मंत्री ने?
यूक्रेन के विदेश मंत्री दिमित्रो कुलेबा ने तीन फरवरी को कहा था कि रूस और अमेरिका के साथ घनिष्ठ संबंधों के कारण भारत रूस-यूक्रेन के संकट को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.
उन्होंने एक वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि भारत रूस से स्पष्ट रूप से कह सकता है कि यूक्रेन उसका दोस्त और सहयोगी है, ऐसे में रूस की किसी भी सैन्य कार्रवाई या यूक्रेन को अस्थिर करने की कोशिश को भारत की तरफ से स्वीकार नहीं किया जाएगा.
उन्होंने आगे कहा था, 'अगर रूस भारत सरकार की बातें सुनता है तो ये हमारे समर्थन में एक बहुत मजबूत संदेश होगा और इसका प्रभाव पड़ेगा.'
क्या है यूक्रेन के विदेश मंत्री के इस बयान का मतलब?
अमेरिका और पश्चिमी देश यूक्रेन पर रूसी हमले को लेकर आशंकित है और कह रहे हैं कि रूस कभी भी हमला कर सकता है.
ऐसे में भारत ने न तो रूस द्वारा यूक्रेन के दो अलगाववादी क्षेत्रों दोनेत्स्क और लुहांस्क को स्वतंत्र क्षेत्र की मान्यता दिए जाने की आलोचना की है और न ही यूक्रेन के संप्रभुता की बात की है.
भारत और रूस के बीच ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंध काफी मजबूत है. बताया जाता है कि भारत के 50-80 फीसद तक सैन्य उपकरण रूस में निर्मित हैं. ऐसे में अगर भारत अपने हितों की अनदेखी करते हुए रूस के रूख की आलोचना करता है तो विश्व को लगेगा कि रूस को लेकर पश्चिमी देशों की चिंता वाजिब है. इससे रूस को भी एक कड़ा संदेश जाता.
लेकिन यूक्रेन पुतिन के लिए बेहद संवेदनशील मामला है. वो इस मामले पर किसी भी देश की नहीं सुनेंगे, चाहे वो उनका पुराना दोस्त भारत ही क्यों न हो.
भारत के लिए क्या सही?
भारत अभी तक इस मुद्दे पर निष्पक्ष रुख अपनाए हुए हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का ये रुख बिल्कुल जायज है लेकिन रूस के हालिया कदम पर भारत के रुख की कई हलकों में आलोचना भी हो रही है. लोगों का कहना है कि भारत को रूस के रुख की आलोचना करनी चाहिए और यूक्रेन की संप्रभुता की बात करनी चाहिए.
लेकिन भारत अगर ऐसा करता है तो वो अपने एक बेहद पुराने सहयोगी को नाराज कर देगा. रूस भारत से नाराज होकर चीन के और करीब जाएगा जो भारत के लिए किसी भी सूरत में सहीं नहीं होगा.
वहीं, अगर भारत रूस के समर्थन में बोलता है तो अमेरिका और पश्चिमी देशों की नाराजगी भारत को झेलनी पड़ेगी. हाल के दिनों में भारत और अमेरिका के रिश्तों में मजबूती आई है. भारत द्वारा रूस से एस-400 मिसाइल सिस्टम की खरीद के बावजूद अमेरिका ने भारत पर CAATSA कानून लागू नहीं किया.
अमेरिका इस कानून के जरिए उन देशों पर प्रतिबंध लगाता है जो रूस के साथ रक्षा सौदा करते हैं. भारत अगर रूस का समर्थन करता है तो अमेरिका भारत पर CAATSA के तहत प्रतिबंध लगा सकता है. अमेरिका के साथ भारत के सामरिक संबंध भी काफी मजबूत हैं. रूस के समर्थन में आने पर भारत-अमेरिका सामरिक संबंधों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा.
भारत में चीनी अतिक्रमण के खिलाफ भी अमेरिका लगातार बोलता रहा है जिस पर भी असर पड़ सकता है. ऐसे में जरूरी है कि भारत मसले पर तटस्थ बना रहे. लेकिन अगर युद्ध शुरू होता है तो भारत के लिए मुश्किल खड़ी हो जाएगी कि वो किसका पक्ष ले.