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लॉस अलामोस... अमेरिका के उस जंगल की कहानी जहां सीक्रेट रूप से तैयार हुआ दुनिया का पहला परमाणु बम

अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव होने वाला है. बाइडेन के रास्ते से हटने के बाद डोनाल्ड ट्रंप और कमला हैरिस के बीच सीधा मुकाबला है. अमेरिका के चुनाव पर पूरी दुनिया की नजरें हैं. इसका कारण भी है. अमेरिका में होने वाली हर अच्छी और बुरी चीज का असर दुनिया पर होता है. हम आज बात करेंगे अमेरिका के उस आविष्कार की जिसे मानव सभ्यता का सबसे बड़ा खतरा माना गया तो महायुद्ध रोकने के महाहथियार भी. इस पूरे सीक्रेट मिशन को अंजाम दिया गया एक जंगल में, मैप से गायब रखे एक इलाके में. जंगल के बीच इतने बड़े मिशन को अंजाम दिए गए इस इलाके की क्या है पूरी कहानी आइए जानते हैं.

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Atom Bomb (File Photo)
Atom Bomb (File Photo)

अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव होने वाला है. बाइडेन के रास्ते से हटने के बाद डोनाल्ड ट्रंप और कमला हैरिस के बीच सीधा मुकाबला है. अमेरिका के चुनाव पर पूरी दुनिया की नजरें हैं. इसका कारण भी है. अमेरिका में होने वाली हर अच्छी और बुरी चीज का असर दुनिया पर होता है. हम आज बात करेंगे अमेरिका के उस आविष्कार की जिसे मानव सभ्यता का सबसे बड़ा खतरा माना गया तो महायुद्ध रोकने के महाहथियार भी. इस पूरे सीक्रेट मिशन को अंजाम दिया गया एक जंगल में, मैप से गायब रखे एक इलाके में. जंगल के बीच इतने बड़े मिशन को अंजाम दिए गए इस इलाके की क्या है पूरी कहानी आइए जानते हैं.)

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क्या आप जानते हैं कि एक छोटे से शहर में जहां गाय-बैल और भेड़ें चरती थीं, वहीं दुनिया का सबसे विनाशकारी हथियार बना. यह कहानी है लॉस अलामोस की, जहां दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान गुप्त रूप से परमाणु बम का निर्माण किया गया. जहां तैयार हुआ अब तक की दुनिया का सबसे खतरनाक सामान. जिससे शहर-देश और पूरी मानव सभ्यता खतरे में आ सकती है तो दूसरी ओर इसे विश्व शांति का रामबाण भी बताया गया. आइए जानते हैं क्या है ये पूरा मामला.

...दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हो चुका था. बम, गोले, बंदूक और जहाज से बमबारी की क्षमता तो दुनिया में आ गई थी, लेकिन महाविनाश का कोई महाहथियार देशों को तबाही मचाने का मौका नहीं देता था. तब दुनिया एटम बम का नाम भी नहीं जानती थी, न किसी वैज्ञानिक के दिमाग में ऐसा कोई विचार था. लेकिन, हिटलर के जर्मनी का एक वैज्ञानिक ओट्टो हान और उनके चेले स्ट्रॉसमैन लैब में यूरेनियम पर न्यट्रॉन से प्रहार कर रहे थे, तो अचानक यूरेनियम अपना रुप बदलकर बेरियम बन गया. वह चकराए कि यह क्या हो रहा है? तभी एक ऑस्ट्रियन यहूदी महिला साइंटिस्ट लीजा ने कहा कि यह तो विखंडन है. यह शोध नेचर पत्रिका में छपा तो दूर बैठे अमेरिका के वैज्ञानिकों को लगा कि यह तो युद्ध का महाअस्त्र हाथ लग गया है. इस खोज के मूल में जर्मन यहूदी साइंटिस्ट अलबर्ट आइंस्टाइन का जगत प्रसिद्ध फॉर्मूला था- E=MC स्कवॉयर...

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हिटलर ने यहूदियों को भगाना शुरू किया तो लिजा भी जर्मनी से निकल गई और पश्चिमी दुनिया के संपर्क में आई. यहूदियों के पलायन के साथ हिटलर के जर्मनी से यहूदी ब्रेन का भी पलायन हो रहा था. उधर व्हाइट हाउस इस बात को लेकर अलर्ट था कि जर्मनी एटम बम बना रहा है. उधर जब जापान ने पर्ल हार्बर पर बमबारी की तो अमेरिका को वर्ल्ड वॉर में उतरना पड़ा. राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने अलबर्ट आइंस्टाइन को चिट्ठी लिखकर एक गुप्त मिशन का बीड़ा उठाने को कहा- मैनहट्टन प्रोजेक्ट.

1942 में मैनहट्टन के ब्रॉडवे पर एक ऊंची इमारत के अठारहवें मंजिल पर बम बनाने की तैयारी शुरू हो गई. वैज्ञानिक चुन लिए गए, पेंटागन बनाने वाले रिचर्ड ग्रोव्स ने दो महीने के भीतर बारह सौ टन यूरेनियम जुगाड़ लिया, फैक्ट्री बना ली, लेकिन एक चीज उनके बस की नहीं थी- एटम बम. क्योंकि वह तो अभी कल्पना मात्र थी.

अमेरिका
जिस जंगल के केंद्र में दुनिया का सबसे पहला एटम बम बना उस लॉस अलामोस में आज नेशनल लैबोरेटरी है.

अब रिचर्ड ग्रोव्स की नजर एक वैज्ञानिक पर गई- जूलियस रॉबर्ट ओपेनहाइमर. ओपनहाइमर का पूरा परिवार कम्युनिस्ट था. ग्रोव्स ने उसे सांचे में उतारा. ओपनहाइमर ने कहा- जनरल, मैं एटम बम बना कर दूंगा. लेकिन मुझे जिस वस्तु, जिस व्यक्ति, और जितने धन की जरूरत हो वह तुरंत मिलती रहे. जनरल ने कहा- डन.

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उधर हिटलर की सेनाएं बढ़ती जा रही थीं. लगभग पूरे यूरोप पर कब्जा करने के करीब थी. दूसरी ओर, उसका साथी जापान एशिया में तबाही मचाए हुए था. चीन के इलाकों को रौंद रहा था, अमेरिका के एशियन बेस पर कहर ढा रहा था. अमेरिका के लिए जरूरी हो गया था ऐसे अस्त्र की खोज जो उसे सब पर भारी शक्ति बना सके.

जगह की तलाश पूरी हो गई. मैनहट्टन की भीड़-भाड़ से कहीं दूर एक सुनसान बीहड़ जंगल 'लॉस अलामोस' में एटम बम की प्रयोगशाला बनी. हजारों वैज्ञानिक अनिश्चित काल के लिए इस गुप्त वन में बंद हो गए. बाहरी दुनिया से लगभग कोई संपर्क नहीं. यह स्थान मानचित्र से ही गायब हो गया. बम को गैजेट बुलाया जाता. जल्द ही यह शहर एक गुप्त परमाणु प्रयोगशाला में तब्दील हो गया. यहां हजारों वैज्ञानिक और सैनिक एकत्रित हुए, जिन्होंने परमाणु बम के निर्माण पर अगले कई वर्षों तक काम किया.

मैनहट्टन प्रोजेक्ट में ओपेनहाइमर के साथ कई और प्रमुख वैज्ञानिक शामिल थे- एनरिको फर्मी, रिचर्ड फायनमेन, लियो जिलार्ड, जेम्स चाडविक, डोनाल्ड मेसर्स और ओपेनहाइमर के छोटे भाई फ्रैंक ओपेनहाइमर.

उधर रूस और हिटलर में भी युद्ध ठन चुका था. रूसी सेना और हिटलर की सेना अब आमने-सामने थी. इसी बीच राष्ट्रपति रूजवेल्ट अचानक चल बसे. अमेरिका की सियासत में सीक्रेट बहुत आम है. हड़बड़ी में राष्ट्रपति बनाए गए हैरी ट्रूमैन एटम बम के प्लान से परिचित ही नहीं थे. बम अभी बना भी नहीं था. लेकिन लॉस अलामोस के जंगल में वैज्ञानिक तेजी से उस मिशन को पूरा करने की ओर बढ़ रहे थे जिसमें पूरी मानव सभ्यता के विनाश की ताकत थी. उधर रूसी सेना जर्मनी के नाजी शासक हिटलर पर भारी पड़ी.

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7 मई 1945 को नाजी जर्मनी की सेना ने रूसी सेना और एलायंस के सामने सरेंडर कर दिया, लेकिन जापान रुकने का नाम नहीं ले रहा था. उसकी तबाही बढ़ती जा रही थी. अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन, ब्रिटिश पीएम चर्चिल और रूसी स्टालिन बर्लिन पहुंचे. जापान को रोकने के लिए ट्रूमैन ने संकेत दिया- हमारे पास शायद कुछ ऐसी चीज है जो युद्ध को रोक सकती है. स्टालिन मुस्कराए. रूस की नजर अमेरिका के इस सीक्रेट मिशन पर पहले से थी. अमेरिका-रूस हिटलर के खिलाफ साथ भले ही थे लेकिन दोनों देशों के जासूस एक दूसरे के पीछे भी लगे हुए थे.

अमेरिका
अमेरिका के बिकिनी द्वीप पर समंदर के अंदर भी एटम बम का परीक्षण किया गया था.

जुलाई के महीने में आखिरकार पहला प्लूटोनियम बनकर तैयार हुआ. 14 जुलाई को पहला प्रयोग प्रारंभिक फेज में असफल रहा. दो दिन बाद फिर प्रयोग किया गया. वर्षा के धीमे होते ही आखिर पहली बार ट्रिगर दबाया गया. न्यू मेक्सिको का वह पूरा जंगल कांप उठा. आकाश में अग्नि का इतना बड़ा विस्फोट नजर आया जो दुनिया में पहले कभी नहीं हुआ था. पहला एटम बम अमेरिका की धरती पर फट चुका था.

अब सवाल उठा कि इस बम का करना क्या है? पहले जापान को धमका कर रोकने का प्रयास किया गया. समुराई संस्कृति के जापानी लोग आत्मसमर्पण को तैयार नहीं हुए. अमेरिका ने एक रात टोक्यो में इतने बम गिराए कि एक लाख लोगों की मौत हुई लेकिन फिर भी जापानी आत्मसमर्पण को तैयार नहीं थे. 26 जुलाई 1945 को जापान को आखिरी चेतावनी दी गई. जापानी नरेश ने ऐलान किया कि आखिरी दम तक जापानी लड़ेंगे. ट्रूमैन ने एटम बम के लिए कोई लिखित या मौखिक आदेश नहीं दिया लेकिन उन्होंने कहा कि सैन्य लीडरशिप के किसी फैसले में वे रोड़ा नहीं बनेंगे. इनडायरेक्टली ये ग्रीन सिग्नल था.

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उसी वक्त नया-नया यूरेनियम बम 'लिटिल बॉय' तैयार होकर आया था. यह गोल न होकर किसी रॉकेट की तरह दिखता था. इसका परीक्षण नहीं हुआ था लेकिन भरोसा था कि काम तो करेगा ही. 6 अगस्त 1945 की सुबह 8.15 पर एक अमेरिकी B29 जहाज ने हिरोशिमा शहर पर यह 'लिटिल बॉय' गिरा दिया. लगभग तीन-चौथाई मील तक फैले इस विस्फोट की कंपन पूरे जापान में महसूस की गई. इस एक बम से 80,000 लोगों की उसी क्षण मृत्यु हो गई. रूसी सेना भी जापान में घुस गई, लेकिन जापान फिर भी रुकने को तैयार नहीं था. दो दिन बाद फिर जापान को चेतावनी दी गई. लेकिन जापान फिर भी तैयार नहीं हुआ.

9 अगस्त, 1945 की सुबह एक और B29 जापान के काकुरो शहर की तरफ उड़ा. लेकिन वहां घने बादल होने की वजह से दूसरे शहर नागासाकी पर 'फैट मैन' बम गिराकर लौट आया. इस बम से 80 हजार लोग और मरे. एटम बम के अटैक और रूसी सेना के हमले के बावजूद जापानी सरेंडर करने को तैयार नहीं हुआ. दुनिया भर में इतने बड़े नरसंहार के लिए अमेरिका की आलोचना हो रही थी. उसी वक्त ट्रूमैन ने मुंह खोला- बस, अब और नहीं. अब एक भी बम बिना मेरी मर्जी के नहीं गिराया जाएगा.

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उधर तबाही से जापान का मन भी बदल रहा था. अब जापान इस शर्त पर सरेंडर को तैयार हुआ कि हमारे राजा बने रहेंगे. बात बन गई. दूसरा विश्वयुद्ध खत्म हो गया था और उसका श्रेय गया महाविनाश के हथियार एटम बम को. दुनिया में इतने बड़े विनाश के लिए अमेरिका को खलनायक के रूप में देखा गया तो अमेरिका की धरती पर स्वागत हुआ. अगले साल बिकिनी द्वीप पर समंदर के अंदर एटम बम का फिर परीक्षण किया गया. पानी हजारों फीट तक उछला और लोगों ने इसकी तस्वीरें लीं. ओपेनहाइमर हीरो बन गए और अमेरिका दुनिया का सुपरपावर.

अमेरिका
अमेरिका ने खुद परमाणु बम का इस्तेमाल करने के बाद UN में प्रस्ताव रखा कि अब कोई देश एटम बम न बनाए, लेकिन रूस ने इसे खारिज कर दिया.

उधर स्टालिन ने हिरोशिमा की तस्वीरें देखी और रूस भी सीक्रेट रूप से एटम बम बनाने में जुट गया. इस बीच, अमेरिका ने एक दांव खेला. संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव रखा कि अब कोई भी देश एटम बम न बनाए. स्टालिन ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया. 1949 में एक एटम बम विस्फोट अमेरिका से मीलों दूर कजाखस्तान में हुआ. सोवियत भी एटम बम बना चुका था. और यहीं से शुरुआत हुई अमेरिका और रूस के बीच कोल्ड वॉर की. जिसकी जद में पूरी दुनिया आने वाली थी और अगले कई दशक तक जो जारी रहने वाली थी.

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लॉस अलामोस से शुरू हुआ ये सीक्रेट मिशन जल्द ही दुनिया के कई देशों के बीच होड़ का कारण बन गया. आज 7 दशक बाद अमेरिका-रूस-फ्रांस-ब्रिटेन-चीन, भारत-पाकिस्तान समेत कई देशों के पास परमाण हथियार हैं. एक अनुमान के अनुसार दुनिया में इस वक्त 12100 न्यूक्लियर वॉरहेड हैं. एजेंसियां मानती हैं कि ईरान और उत्तर कोरिया जैसे कई देश भी गुपचुप परमाणु हथियार बनाने की क्षमता हासिल कर चुके हैं. मतलब धरती पर ही हजारों-लाखों टन एटम बम मौजूद है जो समूची मानव जाति को खतरे में डाल सकती है.

आज क्या है लॉस अलामोस में?

जिस जंगल के केंद्र में दुनिया का सबसे पहला एटम बम बना उस लॉस अलामोस में आज नेशनल लैबोरेटरी है. यह न्यू मैक्सिको में स्थित है. आज लॉस अलामोस नेशनल लैबोरेटरी में परमाणु हथियारों के अलावा कई अन्य विषयों पर शोध किया जा रहा है, जैसे कंप्यूटर विज्ञान, जैव प्रौद्योगिकी, ऊर्जा, पर्यावरण और स्वास्थ्य. यहां से कई प्रतिभाशाली वैज्ञानिक निकले हैं. परमाणु हथियारों के अलावा महामारियों से निपटने के लिए जैव प्रौद्योगिकी पर काम किया जा रहा है. इसमें डीएनए अनुक्रमण और वायरस विज्ञान शामिल हैं. नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के अलावा यहां की लैब्स में कैंसर, मधुमेह और अन्य बीमारियों के इलाज के लिए नई दवाओं और उपचारों पर भी काम किया जा रहा है.

ओपेनहाइमर की कहानी...

परमाणु बम के जनक जूलियस रॉबर्ट ओपेनहाइमर अमेरिका के थ्योरेटिकल फिजिक्स के विद्वान थे. ओपेनहाइमर का जन्म 1904 में न्यूयॉर्क में हुआ था. वो जर्मन-यहूदी माता-पिता की संतान थे. बचपन से ही रॉबर्ट ओपेनहाइमर को पढ़ाई और नई चीजों को जानने समझने का शौक था. 9 वर्ष की उम्र में ही वो ग्रीक और लैटिन चिंतन साहित्य पढ़ते थे. उनकी यही दिलचस्पी उन्हें भगवत गीता तक लेकर गई थी, जिसे पढ़ने और समझने के लिए उन्होंने संस्कृत भाषा सीखी. परमाणु बम बनाने वाले ओपेनहाइमर की पूरी फैमिली कम्युनिस्ट थी लेकिन वे भगवद्गीता के फॉलोवर थे. एटम बम परीक्षण के दौरान ओपेनहाइमर ने भगवद्गीता का एक श्लोक उद्धृत किया- 'अब मैं काल बन गया हूं, विनाशक.' ओपनहाइमर के इस एक कथन से एटम बम की ताकत और विनाश क्षमता दोनों का विश्लेषण हो जाता है... और अमेरिका के उस गुप्त मिशन के अंजाम का भी जिसने दुनिया में एक नया आविष्कार दिया तो महाहथियार की होड़ भी.

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