इराक जल रहा है और लाखों उस आग में झुलस रहे हैं. उसकी आंच दूर-दूर तक पहुंच रही है. दुनिया का कोई भी देश उससे अछूता नहीं है क्योंकि इससे तेल का बाजार गरम हो रहा है. महंगे तेल की कीमतें और ऊपर जा पहुंची है जिसका असर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ रहा है. आखिर यह तेल ही तो है जो यह खून-खऱाबा और नरसंहार करवा रहा है. इंग्लैंड ने 1917 से अगले एक दशक तक वहां भारी सैन्य शक्ति का इस्तेमाल करके तेल के कुओं पर अपना कब्जा बनाए रखा. तीस साल तक वहां शासन करने के बाद अंग्रेजों ने उसे आज़ादी दी.
सद्दाम के जरिये अमेरिका की एंट्री
उसके बाद 1972 तक तो सब कुछ ठीक चला और फिर वहां की सरकार ने तेल कुओं का
राष्ट्रीयकरण कर दिया. यहीं से सारी समस्या शुरू हुई. इससे इंग्लैंड और अमेरिका के हितों को
भारी चोट पहुंची क्योंकि तब तक इराक पेट्रोलियम कंपनी अंग्रेजों और अमेरिकी हितों को ध्यान
में रख रही थी. इसके बाद वहां अमेरिका ने अपने पत्ते खेलने शुरू कर दिए और बगावत करवा
कर सद्दाम हुसैन की बाथ पार्टी को सत्ता दिलवा दी. सद्दाम हुसैन को बाद में लगने लगा कि वह
ताकतवर हो गए हैं तो उन्होंने कुवैत पर हमला करने की गलती की जिसका नतीजा पहले खाड़ी
युद्ध के रूप में मिला. अमेरिका ने इराक पर न केवल हमला करके कुवैत को आजाद कराया
बल्कि उसकी मोटी कीमत भी वसूली.
60 फीसदी हैं शिया, लेकिन सुन्नी भी कम ताकतवर नहीं
इतना ही नहीं झूठा आरोप लगाकर उसने इंग्लैंड के साथ मिलकर 2003 में इराक पर पूरी तरह
कब्जा भी कर लिया. 2011 में इराक को आज़ादी तो मिली लेकिन तब तक सद्दाम हुसैन के
परिवार तक का सफाया हो चुका था. सद्दाम ने अपने लंबे शासन काल में इराक को एक समृद्ध
और मजबूत देश बनाया. लेकिन उन्हें फांसी दिए जाने के बाद वहां आंतरिक सत्ता का संतुलन
गड़बड़ा गया. वहां के प्रधानमंत्री नूरी अल-मालिकी शिया हैं और उन्होंने सुन्नी समुदाय को
विश्वास में लेने की कभी कोशिश नहीं की. शिया और सुन्नी में बंटे इराक में शियाओं की तादाद
लगभग 60 फीसदी है लेकिन वहां सुन्नी गुट काफी ताकतवर रहे हैं जिन्होंने हमेशा वहां शासन
किया था.
पिछले साल भी सुन्नी लड़ाकों ने की थी बगावत
पिछले साल सुन्नी लड़ाकों ने पश्चिमी इराक के शहरों फ़लुजा और रमादी को तहस नहस कर
दिया. फ़लुजा पर तो उनका कब्जा ही हो गया. अब उनके लड़ाके मोसुल शहर को जीतते हुए
बगदाद की ओर बढ़ रहे हैं. वहां भीषण लड़ाई हो रही है और हजारों लोग मारे जा चुके हैं. इराक
की सरकार बचने के लिए अमेरिका से गुहार लगा रही है और कह रही है कि वह हमलावरों पर
हमले करे. लेकिन बराक ओबामा और जॉर्ज बुश में यहीं पर फर्क है. बुश होते तो अब तक
अमेरिकी सेना भेज चुके होते लेकिन ओबामा इतना बड़ा जोखिम नहीं लेना चाहते. वे जानते हैं
कि बाद में इसके जटिल नतीजे हो सकते हैं. बुश इराक फौजें भेजकर बेहद अलोकप्रिय हो गए
थे. अमेरिका को उसकी बहुत ज्यादा आर्थिक कीमत भी चुकानी पड़ी थी.
क्या विभाजन की तरफ बढ़ रहा इराक?
बहुत से अमेरिकी तो मानते हैं कि यह सत्ता संतुलन का स्वाभाविक मामला है जिसमें इराक के
दो टुकड़े भी हो सकते हैं. अगर ऐसा होता भी है तो अमेरिका को कई फर्क नहीं पड़ता और
उसका कारण है कि इराक के तेल भंडारों में अमेरिकी कंपनियों की दिलचस्पी अब खत्म होती
जा रही है. नई टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से उसकी दूसरों पर निर्भरता कम होती जा रही है और
वेनेजुएला तथा कनाडा से तेल की आपूर्ति बढ़ने से उसके पास तेल की कमी नहीं है. अमेरिका
एक व्यापारी देश है और उसका हर कदम नफा-नुकसान के अनुसार ही उठता है. इस बार भी
वह वैसे ही फैसले करेगा. मतलब साफ है, इराकियों को अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी होगी चाहे
देश के दो टुकड़े क्यों न हो जाए.