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अब सपने भी हमें अपने-आप नहीं, कंपनियों की मर्जी से आएंगे... क्या है ड्रीम इनक्यूबेशन, जिसे माना जा रहा बड़ा खतरा?

सपने हम सबको आते हैं. कभी मजेदार, कभी बेसिर-पैर. कई ड्रीम साइंटिस्ट भी होते हैं, जो सपनों का मतलब बताते हैं. लेकिन क्या हो अगर सपने भी किसी प्रोडक्ट की तरह डिजाइन होने लगें. इसे ड्रीम मैनिपुलेशन कहते हैं, यानी सपनों को अपने मुताबिक तोड़-मरोड़ देना. एक अमेरिकी बियर कंपनी ने शराब बेचने के लिए सपनों तक में घुसपैठ कर डाली.

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अमेरिका में ड्रीम मैनिपुलेशन की तैयारी हो चुकी. सांकेतिक फोटो (Unsplash)
अमेरिका में ड्रीम मैनिपुलेशन की तैयारी हो चुकी. सांकेतिक फोटो (Unsplash)

अमेरिकी बियर कंपनी कूर्स ने साल 2021 में एक नया विज्ञापन बनाया, जो सपनों में आकर लोगों को उनके ब्रांड की शराब खरीदने के लिए उकसाता. कंपनी ने दावा किया कि सोने से ठीक पहले लोग अगर उसका एड देखकर सोएं और उसके बाद पूरी रात एक खास म्यूजिक बजता रहे तो सपनों में उसी कंपनी की शराब दिखेगी. एड और फिर शराब से जुड़ा खास साउंड एक तरह के ट्रिगर का काम करेगा, जिससे वैसे ही सपने आएंगे. 

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एक्सपर्ट्स ने बताया खतरा

ये तो पता नहीं लगा कि कितने लोगों ने कूर्स ने इस ड्रीम मेनिपुलेशन प्रोजेक्ट में हिस्सा लिया. हालांकि इसके बाद वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक अलर्ट हो गए. सपने फिलहाल ऐसी चीज हैं, जिसपर किसी का कंट्रोल नहीं. अगर कंपनियां ही उसपर भी काबू पाने लगें तो इंसान का दिमाग पूरी तरह तहस-नहस हो जाएगा. नींद भी नेचुरल नहीं रह जाएगी, जिसका खतरनाक असर हर जगह दिखेगा.

हार्वर्ड समेत कई इंटरनेशनल यूनिवर्सिटीज के स्लीप एंड ड्रीम रिसर्चरों ने एक ओपन लेटर लिखकर सपनों में जबरन घुसकर उसे डिजाइन करने के खतरे गिनाए. इसके बाद कंपनियों की ऐसे प्रयोग की रफ्तार पर ब्रेक लगा. 

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अब तक बेडरूम तकनीक से लगभग बचा हुआ था. सांकेतिक फोटो (Unsplash)

क्या है सपनों को अपने अनुसार तय करना?

सपनों को तोड़ने-मरोड़ने को ड्रीम इनक्यूबेशन कहते हैं. ये किसी खास ड्रीम को ट्रिगर करता है. तीन साल पहले मेसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने ये टर्म देते हुए कहा कि सपनों में क्या आ रहा है, इसे डिजाइन की किया जा सकता है. इसके लिए उन्होंने एक एप बनाया, जिसे सोकर पहनने पर सपनों को ट्रैक किया जा सके. 

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इस स्टेज में सपनों पर हो सकता है कंट्रोल

सोने के बाद सपनों की जो पहली अवस्था होती है, उसमें लोग जानते होते हैं कि उन्हें कैसे सपने आ रहे हैं. यही वो अवस्था है, जिस समय ड्रीम का कंटेंट डिजाइन हो सकता है. ड्रीम ट्रैकर जब देखता है कि सोया हुए शख्स इस स्टेज में पहुंच चुका तो वो खास म्यूजिक बजाने लगता है. ये म्यूजिक धुन भी हो सकती है और आवाज भी, जो कोई खास बात सोचने को उकसाती है. जैसे ट्रैकर अगर लगातार ये सोचने को कहे कि आप पहाड़ों के बीच खड़े हैं तो हो सकता है कि अगली सुबह आप मनाली या हिमाचल की टिकट बुक कर लें. 

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ड्रीम इनक्यूबेशन से समस्याओं का हल भी खोजा जा सकता है. सांकेतिक फोटो (Unsplash)

फ्री प्रोडक्ट के बदले ड्रीम इनक्यूबेशन का हिस्सा बनाया जाने लगा

वैज्ञानिकों ने जैसे ही सपनों को डिजाइन कर सकने की बात की, विज्ञापन कंपनियों के कान खड़े हो गए. वे इसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने की सोचने लगे. साल 2021 में बियर कंपनी मॉल्सन कूर्स ने सबसे पहले ऐसा किया. लोगों को फ्री ड्रिंक्स और छूट के बदले उन्हें कूर्स के ड्रीम इनक्यूबेशन प्रोजेक्ट का हिस्सा बनने के लिए कहा जाने लगा. लेकिन वैज्ञानिकों के दखल से बीच में ही इसपर रोक लग गई. 

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अमेरिका में रेड फ्लैग

साइंटिस्ट हल्ला तो मचा रहे हैं, लेकिन अब भी इस बात का खतरा टला नहीं है कि किसी रोज अचानक हमारे सपने किसी एडवरटाइजिंग कंपनी का हथियार बन जाएंगे. शराब से लेकर खिलौने, खाना और फोन भी सपनों के जरिए बेचे जाएंगे. अमेरिकन मार्केटिंग एसोसिएशन के फ्यूचर ऑफ मार्केटिंग सर्वे में दावा किया गया कि साल 2025 तक वहां फैली 400 से ज्यादा बड़ी मार्केटिंग कंपनियां में से 77% कंपनियां सपनों को हथियार बनाकर उसमें घुसपैठ करेंगी. 

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बहुत सी कंपनियां सपनों को खरीदने के फेर में हैं. सांकेतिक फोटो (Pixabay)

हम खुद भी कर सकते हैं सपने डिजाइन

ड्रीम मेनिपुलेशन का एक फायदा भी है, लेकिन तभी जब हम खुद इसे मेनिपुलेट करें. यानी हम तय करें कि हमें सपने में क्या देखना है. जैसे कल दफ्तर में आपका कोई बड़ा प्रेजेंटेशन है. आज रात सोते हुए आप तय करें कि आप प्रेजेंटेशन की कामयाबी के सपने ही देखेंगे. उसी बारे में सोचते हुए सोएं तो एक स्टेज आएगी, जिसे ल्यूसिड ड्रीम स्टेज कहते हैं. यही वो समय है, जब सोया हुए शख्स का अपने सपने पर पूरा-पूरा कंट्रोल होता है. वो जैसा चाहे, इसे वैसा शेप दे सकता है. तो प्रेजेंटेशन की सफलता देखने पर अगले दिन आपका कॉन्फिडेंस बढ़ा रहेगा. 

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प्रॉब्लम सॉल्विंग भी हो सकती है ख्वाब में

वैज्ञानिक ये भी मानते हैं कि ल्यूसिड ड्रीम के दौरान ही हम अपनी रियल लाइफ प्रॉब्लम्स का हल भी खोज सकते हैं. द कमेटी ऑफ स्लीप नाम की किताब में लेखक ने पूरी प्रोसेस बताई है कि किस तरह सोने पर हमारे सपनों में ही समस्या का हल मिल जाता है. इसके लिए सोने से पहले हमें लगातार उसी बारे में सोचना होगा. अगर किसी खास इंसान के चलते आप परेशान हैं तो उसकी फोटो देखते हुए सोने पर उससे जुड़ा सपना आने लगेगा, जैसे ही हम ल्यूसिड स्टेज में जाएं, तुरंत अपने दिमाग को समस्या की तरफ मोड़ दें. कई बार हम सपने देखकर उन्हें भूल जाते हैं. ऐसे भूले हुए सपनों को कैसे याद किया जाए, इसका भी तरीका होता है. 

 

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