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वे देश, जो अमेरिकी यात्रियों को देखते ही भड़क जाते हैं, क्या होता है उन नागरिकों के साथ, जो यहां 'फंस' जाएं?

अमेरिका लगातार अपने लोगों के लिए ट्रैवल एडवाइजरी जारी करता है. वो बताता है कि किन देशों की यात्रा की जा सकती है और कहां जाना जोखिम-भरा है. यूएस स्टेट डिपार्टमेंट ने लगभग 20 देशों को ट्रैवल के लिए 'सबसे खतरनाक' माना. वहीं कई ऐसे भी मुल्क हैं, जो खुद ही अपने दरवाजे अमेरिकियों के लिए बंद करते रहे. यहां अमेरिकी नागरिक होना ही सबसे बड़ा खतरा है.

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कई देश हैं, जहां जाने से अमेरिकी नागरिक बचते हैं. सांकेतिक फोटो (Pixabay)
कई देश हैं, जहां जाने से अमेरिकी नागरिक बचते हैं. सांकेतिक फोटो (Pixabay)

सबसे पहले समझते हैं कि अमेरिका में किस तरह की ट्रैवल एडवाइजरी जारी होती है और उसके क्या मायने हैं. यहां 4 लेवल हैं, जिनमें अलग-अलग देशों को रखा गया. लेवल के मुताबिक, यात्री तय करते हैं कि उन्हें कहीं जाना चाहिए भी या नहीं. पहले लेवल पर आने वाले देशों को अमेरिका सेफ मानता है. दूसरे लेवल पर वो देश आते हैं, जिनके बारे में अमेरिका थोड़ा डरा रहता है. अमेरिकियों को वहां एक्स्ट्रा सावधानी रखने को कहा जाता है. तीसरे स्तर के देश वे हैं, जिनके बारे में यूएस मानता है कि वहां जाना टालना चाहिए. इसके बाद आता है आखिरी और चौथा लेवल. इसका मतलब है- डू नॉट ट्रैवल. 

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सबसे ज्यादा रिस्क वाले देश
चौथे स्तर के देशों के बारे में अमेरिकी सरकार अपने नागरिकों को वॉर्न करती है कि वे किसी भी हाल में वहां न जाएं. या फिर अगर जाना ही हो, तो जितनी जल्दी हो, निकल जाएं. सरकार ये भी मानती है कि लेवल 4 देशों में कोई इमरजेंसी बन आए तो अमेरिका अपने लोगों की 'वेरी लिमिटेड' मदद कर पाएगा. 

करीब 20 देशों को यूएस ने लेवल 4 में रखा है
यहां आतंकवाद, राजनैतिक अस्थिरता और लोकल क्राइम इन सबका ग्राफ ऊपर होता है. सूडान, जहां फिलहाल जंग छिड़ी हुई है, वो भी इसी लिस्ट में आता है. इसके अलावा अफगानिस्तान, बेलारूस, बुर्किना फासो, सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक, म्यांमार, गाजा पट्टी, हैती, इरान, इराक, लीबिया, माली, मैक्सिको, सीरिया, वेजेजुएला, यमन और उत्तर कोरिया भी वे देश हैं, जहां जाने से अमेरिका अपने लोगों को रोकता है. 

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करीब 20 देशों को यूएस ने लेवल 4 में रखा हुआ है. सांकेतिक फोटो (Unsplash)

रूस में भी ट्रैवल सेफ नहीं
रूस भी इस लिस्ट का हिस्सा है. अमेरिका और रूस का तनाव खुला हुआ है. ऐसे में अगर रूस में फंसे अमेरिकी नागरिकों के साथ कोई अनहोनी हो, तो स्टेट डिपार्टमेंट साफ कहता है कि वो काफी लिमिटेड मदद ही दे सकेगा. दूसरे विश्व युद्ध के बाद से ऐसे हालात बने, जब अमेरिका ने रूस को पछाड़ना शुरू कर दिया.

किन देशों में अमेरिकी सिटीजन्स को पसंद नहीं किया जाता?
अमेरिका फिलहाल सुपरपावर है. यही वजह है कि उसके नागरिकों को सभी जगहों पर वेलकम किया जाता है. हेनले पासपोर्ट इंडेक्स के मुताबिक अमेरिकी पासपोर्ट के साथ 186 देशों में बिना वीजा के जा सकते हैं. लेकिन कई देश ऐसे भी हैं, जहां अमेरिकी होना मुसीबत ला सकता है.

नॉर्थ कोरिया ऐसा ही एक देश है. दिलचस्प बात ये है कि अमेरिका ने भी उसे लेवल 4 पर रखा हुआ है, यानी डू नॉट ट्रैवल. अमेरिकी लोग अगर जाना चाहें, तो वहां किसी भी खतरे के जिम्मेदार वे खुद होंगे. लेकिन छोटा-सा देश उत्तर कोरिया हमेशा ही अमेरिका से नाराज रहा. वो मानता है कि अमेरिका ने उसके दुश्मन देश साउथ कोरिया की मदद से उसे कमजोर बनाना चाहा. इसके अलावा कम्युनिस्ट उत्तर कोरिया को पूंजीवादी सोच की वजह से भी अमेरिका पसंद नहीं. 

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क्यूबा में अमेरिका के खिलाफ हरदम गुस्सा दिखता रहा. सांकेतिक फोटो (Pixabay)

हर अमेरिकी प्रोडक्ट पर बैन
नॉर्थ कोरियाई सैन्य शासक किंग जोंग लगातार अमेरिका के बारे में जहर उगलते रहे. कहा तो यहां तक जाता है कि इस देश में हर वो चीज बैन है, जो अमेरिका में पसंद की जाती हो, जैसे ब्लू जींस, या हॉट डॉग्स तक. यहां तक कि गर्भ-निरोधक भी इस देश में रेस्ट्रिक्टेड तरीके से मिलते हैं क्योंकि कोरियाई सोच के मुताबिक, ये अमेरिका की देन है. 

डिटेंशन सेंटर में कैद कर दिए गए
अमेरिकी यात्री अगर नॉर्थ कोरिया में जाएं तो बहुत मुमकिन है कि उसपर हमला हो जाए या वे लंबे समय के लिए डिटेंशन कैंप में डाल दिए जाएं. ऐसा एक हाई प्रोफाइल मामला साल 2016 में हुआ था, जब अमेरिकी टूरिस्ट ऑट्टो वार्मबिअर को अरेस्ट करके 17 महीनों के लिए डिटेंशन कैंप में रखा गया. वहां कथित तौर पर वार्मबिअर को इतनी यातना मिली कि लौटने के कुछ दिनों बाद ही उनकी मौत हो गई. साल 2018 में कई अमेरिकी टूरिस्ट्स को डिटेंशन सेंटरों से छोड़ा गया. 

क्यूबा में अमेरिकियों का जाना आसान नहीं
क्यूबा भी ऐसा ही एक देश है, जो अमेरिकी टूरिस्ट्स को बुरी तरह से नापसंद करता है. इसके पीछे भी एक कहानी है, जो शुरू होती है साल 1898 से. तब तक क्यूबा स्पेन का हिस्सा था, फिर वहां के लोगों ने स्पेनिश हुकूमत के खिलाफ लड़ाई शुरू कर दी. अमेरिका ने क्यूबा की मदद करते हुए स्पेन पर हमला बोल दिया.

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हारे हुए स्पेन ने क्यूबा को आजाद देश घोषित करने की बजाए उसका कंट्रोल अमेरिका को दे दिया. तीन सालों बाद अमेरिका ने क्यूबा को अलग राष्ट्र माना लेकिन मुफ्त में नहीं. क्यूबाई जनता को इसकी कीमत चुकानी पड़ी. उसे अपने कुछ हिस्से अमेरिका को लीज में देने पड़े. इस समझौते को प्लाट अमेंडमेंट कहते हैं. 

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मॉस्को में कई ऐतिहासिक कैथेड्रल हैं. सांकेतिक फोटो (Pixabay)

लीज पर ली जगहों पर करता रहा एक्सपेरिमेंट
बहुत कम कीमत पर लीज में मिली इन जगहों पर अमेरिकी ऊटपटांग प्रयोग करता रहता है. कभी वहां आर्मी बेस बन जाता है, कभी सबसे खतरनाक कैदी रखे जाने लगते हैं. दोस्ती की आड़ में ठगी हुई क्यूबाई सरकार अमेरिका और वहां के लोगों को खास पसंद नहीं कर पाती. यही वजह है कि कई बार वहां अमेरिकियों पर हमले या हेट क्राइम जैसी बातें सुनाई देती रहीं. अमेरिका ने भी इसे लेवल 4 श्रेणी में रखा हुआ है. 

कई और देश हैं, जिनके साथ यूएस का रिश्ता बढ़िया नहीं
इनमें मुस्लिम-बहुल देश भी हैं और कम्युनिस्ट देश भी. तुर्कमेनिस्तान भी इसी श्रेणी में आता है. वहां अमेरिकी पासपोर्ट-धारी तब तक नहीं जा सकते, जबतक खुद वहां की सरकार न बुलाए. ऐसे ही ईरान के साथ भी अमेरिकी रिलेशन्स बनते-बिगड़ते रहे. फिलहाल अगर कोई अमेरिकी नागरिक वहां जाए तो पूरे समय एक होस्ट उसके साथ रहना जरूरी है, जो वहीं का लोकल नागरिक हो. ऐसा न होने पर जेल भी हो सकती है. इस दौरान एग्जिट वीजा के लिए अप्लाई करना होता है और जितने दिन तक वीजा को मंजूरी न मिल जाए, जेल काटनी पड़ेगी.

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