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11 साल तक बोले नहीं, 18 तक पढ़-लिख नहीं सके... कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर बनने वाले जेसन आर्डे की कहानी

दक्षिणी लंदन के क्लेफेम में 1985 में जन्मे जेसन आर्डे अब कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर बन गए हैं. जेसन आर्डे का जीवन बहुत उतार-चढ़ाव से भरा रहा है. जब वो तीन साल के थे, तब पता चला कि वो ऑटिज्म डिसऑर्डर से पीड़ित हैं. 11 साल की उम्र तक बोल नहीं सके थे. 18 साल की उम्र तक उन्हें पढ़ना-लिखना भी नहीं आता था. लेकिन अब वो प्रोफेसर हैं.

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जैसन आर्डे कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के सबसे कम उम्र के अश्वेत प्रोफेसर होंगे. (फोटो क्रेडिट- कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी)
जैसन आर्डे कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के सबसे कम उम्र के अश्वेत प्रोफेसर होंगे. (फोटो क्रेडिट- कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी)

जेसन आर्डे आज 37 साल के हैं. जब उनकी उम्र तीन साल थी, तब उन्हें पता चला कि वो ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से पीड़ित हैं. इस डिसऑर्डर से पीड़ित व्यक्ति का दिमाग अलग तरह से काम करता है. 

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इसका नतीजा ये हुआ कि आर्डे 11 साल की उम्र तक बोल भी नहीं पाते थे. इतना ही नहीं, 18 साल की उम्र होने के बावजूद न तो वो पढ़ सकते थे और न ही लिखना आता है. पर आज जेसन आर्डे कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर बन गए हैं. 

ब्रिटिश न्यूज वेबसाइट द गार्जियन के मुताबिक, आर्डे 6 मार्च को कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में सोशलॉजी के प्रोफेसर की जिम्मेदारी संभालेंगे. आर्डे कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में नियुक्त होने वाले सबसे कम उम्र के अश्वेत प्रोफेसर होंगे. इससे पहले आर्डे डरहम और ग्लास्गो यूनिवर्सिटी में काम कर चुके हैं. इस समय कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में पांच अश्वेत प्रोफेसर हैं. 

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी दुनिया की तीसरी सबसे पुरानी यूनिवर्सिटी है, जिसकी स्थापना साल 1209 में हुई थी. इस समय ये दुनिया की दूसरी सबसे बेस्ट यूनिवर्सिटी है. 

बीबीसी से बात करते हुए जेसन आर्डे ने कहा, मेरा इस बात पर फोकस है कि कैसे वंचित लोगों के लिए हम ज्यादा से ज्यादा दरवाजे खोल सकते हैं और हायर एजुकेशन का असल मायने में लोकतंत्रीकरण कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि कैम्ब्रिज जैसी यूनिवर्सिटी में होने से मुझे अपने एजेंडे को राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ाने में और मदद मिलेगी. आर्डे कहते हैं, 'बातें करना अलग बात है और काम करना अलग बात.'

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कौन हैं जेसन आर्डे?

द गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक, जेसन आर्डे का जन्म दक्षिणी लंदन के क्लेफेम में हुआ था. उनका बचपन भी यहीं बीता. आर्डे जब तीन साल के थे, तब पता चला कि वो ऑटिज्म डिसऑर्डर से पीड़ित हैं.

11 साल की उम्र तक आर्डे कुछ बोल भी नहीं पाते थे. वो साइन लैंग्वेज में बात किया करते थे. रिपोर्ट के मुताबिक, उनके परिवार से कह दिया गया था कि आर्डे आजीवन ऐसे ही रहेंगे, लेकिन उन्होंने सबको गलत साबित कर दिया.

ऑटिज्म की वजह से आर्ड 18 साल की उम्र तक पढ़ना-लिखना भी नहीं जान पाए थे. आठ साल पहले तक आर्डे ब्रिटेन के एक सुपरमार्केट में पार्ट टाइम जॉब भी किया करते थे.

आज आर्डे के पास कई सारी डिग्रियां हैं. उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ सरे से बैचलर डिग्री हासिल की. इसके बाद सेंट मैरी यूनिवर्सिटी से एजुकेशन में एमए किया. लिवरपूल जॉन मूरे यूनिवर्सिटी से एमएड की पढ़ाई की और यहीं से डॉक्टरेट की डिग्री भी हासिल की. आर्डे कई किताब भी लिख चुके हैं.

आर्डे से क्या सीख सकते हैं?

गार्जियन ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि आज से 10 साल पहले आर्डे ने अपना मां के बेडरूम की दीवार पर एक पोस्टर लगाया था. इसमें उन्होंने अपने जीवन के लक्ष्य लिखे थे. इस लिस्ट में तीसरे नंबर पर लिखा था, 'एक दिन में ऑक्सफोर्ड या कैम्ब्रिज में काम करूंगा.'

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6 मार्च को आर्डे का सपना हकीकत में बदल जाएगा. उनकी कहानी का सार ये है कि 'कुछ भी संभव है.' आर्डे कहते हैं, 'मुझे पता है कि मेरे पास बहुत ज्यादा टैलेंट नहीं है, लेकिन मैं ये जानता हूं कि मैं किसी चीज को कितनी शिद्दत से चाहते हैं और पता था कि उसके लिए मैं कितनी मेहनत करना चाहता था.'

उन्होंने कहा कि मैं जितना आशावादी हूं, उस हिसाब से मैं ऐसा नहीं सोच सकता कि यह नहीं होगा. अगर मैं अंदाजा लगाने वाला शख्स भी होता, तो भी इसकी अपनी बाधाएं होती.

'आप ये कर सकते हैं'

2018 में प्रोफेसर आर्डे का पहला पेपर पब्लिश हुआ था. डरहम यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर बनने से पहले रोएहैम्पटन यूनिवर्सिटी में सोशलॉजी डिपार्टमेंट में एसोसिएट प्रोफेसर थे.

2021 में वो ग्लास्गो यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर बने. उस समय आर्डे पूरे यूके के सबसे युवा प्रोफेसर थे. आर्डे कहते हैं, 'मुझे किसी ने कहा था- आप ये कर सकते हैं. मुझे लगता है कि हम दुनिया का सामना कर सकते हैं और जीत सकते हैं.'

आर्डे कहते हैं, 'पीछे मुड़कर देखें तो पहली बार मुझे खुद पर विश्वास हुआ था. बहुत सारे एकेडमिशियन कहते थे कि उन्हें इस काम में बहुत ठोकरें खानी पड़ीं हैं, लेकिन उस समय मैं फोकस था. मैं जानता था कि मेरा लक्ष्य क्या है.'

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दिन के समय प्रोफेसर आर्डे लेक्चर देते थे. शाम और रात का वक्त वो अपने एकेडमिक पेपर तैयार करने और सोशलॉजी की पढ़ाई पर खर्च करते थे. उनसे जब पूछा गया कि उन्हें कब ये महसूस हुआ कि वो सोशलॉजिस्ट हैं? तो उन्होंने कहा, 'ये शायद 2015 की बात है.'

 

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