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दोस्ती का ऑफर ठीक लेकिन PAK के दिए घाव गहरे... नवाज के गुडविल पर क्यों भरोसा नहीं कर सकता भारत?

कर्ज और भूख से बेहाल पाकिस्तान को अब पड़ोसी भारत से रिश्ते सुधारने में दिलचस्पी बढ़ गई है. अमन और शांति के वास्ते बीती बातें भूलने की गुहार लगा रहा है. हालांकि, भारत इतने जल्द भरोसा करने वाला नहीं है. शिमला समझौते से लेकर लाहौर समझौते तक भारत को सिर्फ धोखा और दगाबाजी ही मिली है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी जब दोस्ती का हाथ बढ़ाया तो पाकिस्तान ने आतंकी हमले कर जख्मों को हरा किया है.

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पाकिस्तान लगातार भारत को दोस्ती का ऑफर दे रहा है.
पाकिस्तान लगातार भारत को दोस्ती का ऑफर दे रहा है.

दोस्ती का मंच भी था. मौका भी था और तस्वीरें भी आईं, लेकिन रिश्तों की बर्फ पिघली नहीं. हम बात कर रहे हैं विदेश मंत्री जयशंकर के पाकिस्तान दौरे की, जिसमें हाथ तो मिला, लेकिन दिल नहीं मिला. ऐसे में आतंक को पनाह देने वाला पाकिस्तान अब पड़ोसी होने की दुहाई दे रहा है. भारत से पहले जैसे रिश्ते चाहता है. सत्तारूढ़ पार्टी के प्रमुख नवाज शरीफ खुद यह पहल कर रहे हैं. वे सालभर से इस कवायद की जमीन तैयार करने में जुटे हैं. एक दिन पहले ही नवाज शरीफ बिगड़े संबंधों को लेकर फिर भावुक हुए और भारत से अपील की कि अब अच्छे पड़ोसियों की तरह रहते हैं. हालांकि, भारत के रुख में नरमी नहीं है. भारत का कहना है कि आतंक और बातचीत साथ-साथ नहीं हो सकती है.

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दो दिवसीय शंघाई शिखर सम्मेलन में शामिल होने गए विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इस्लामाबाद की जमीन से ही पाकिस्तान और चीन को कड़े शब्दों में आतंकवाद और विस्तारवाद पर लताड़ लगाई और एक अच्छे पड़ोसी की तरह रहने की नसीहत दी. खास बात ये है कि इस दौरे पर भारत और पाकिस्तान के बीच कोई द्विपक्षीय वार्ता नहीं हुई. चूंकि, भारत SCO का सदस्य है, इसलिए इस समिट में हिस्सा लेने के लिए एस. जयशंकर पाकिस्तान पहुंचे थे. आखिरी बार दिसंबर 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पाकिस्तान गए थे, उसके बाद से पहली बार एस. जयशंकर के रूप में कोई बड़ा नेता पाकिस्तान पहुंचा.

क्यों पाकिस्तान पर भरोसा नहीं?

इतिहास गवाह है, भारत ने जब-जब पाकिस्तान से संबंध सुधारे, उसकी पींठ में छुरा ही घोंपा गया. साल 1972 का शिमला समझौता हो या 1999 में लाहौर बस यात्रा सेवा शुरू करना अथवा 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पाकिस्तान पहुंचकर दोस्ती का हाथ आगे बढ़ाना... बदले में भारत को धोखा मिला और आतंकवादी हमले की चोट खाई है. यही वजह है कि भारत अब पाकिस्तान पर जल्दी भरोसा करने वाला नहीं है. कई मौकों पर भारत ने साफ कर दिया कि बातचीत और व्यापार तभी आगे बढ़ेगा, जब पाकिस्तान आतंकवाद पर पूरी तरह लगाएगा. बातचीत और आतंकवाद एक साथ नहीं चल सकते.

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जयशंकर की पाकिस्तान यात्रा

रात्रिभोज के दौरान एस जयशंकर को शहबाज शरीफ से हाथ मिलाते और बातचीत करते देखा गया. हालांकि, एससीओ सम्मेलन में विदेश मंत्री जयशंकर हमेशा की तरह आक्रामक मुद्रा में दिखे. उन्होंने पाकिस्तान का नाम लिए बिना कहा, आतंकवाद, उग्रवाद और अलगाववाद नाम की तीन बुराइयां व्यापार, एनर्जी फ्लो और बातचीत को संभव नहीं बनाती हैं. समापन से पहले उन्होंने पाकिस्तान के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश दिया. जयशंकर ने कहा, अगर विश्वास की कमी है या सहयोग अपर्याप्त है. अगर दोस्ती में कमी आई है और अच्छे पड़ोसी की भावना कहीं गायब है तो निश्चित रूप से आत्मनिरीक्षण करने और कारणों को समझने की जरूरत है.

पाकिस्तान ने कैसे तोड़ा भारत का भरोसा? 

साल 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ और पाकिस्तान को बुरी तरह मात खानी पड़ी. इस युद्ध के बाद पूर्वी पाकिस्तान, बांग्लादेश के रूप में स्वतंत्र देश बन गया. पाकिस्तानी सेना में अशांति बढ़ गई. उस समय पाकिस्तान में कोई संविधान नहीं था, इसलिए मार्शल लॉ नियम जारी किए गए और एक सिविलियन को सत्ता ट्रांसफर की गई. हालांकि, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पाकिस्तान से बातचीत करने को तैयार नहीं थीं. ऐसे में पाकिस्तान के सिविलियन चीफ मार्शल एडमिनिस्ट्रेटर और राष्ट्रपति ज़ुल्फिकार अली भुट्टो रूस दौरे पर पहुंचे और कहा कि वो अपने 'पुराने' मित्र रूस के जरिए भारत पर बातचीत शुरू करने का दबाव डलवाना चाहते हैं. काफी कूटनीतिक प्रयास के बाद इंदिरा गांधी, पाकिस्तान से बातचीत के लिए तैयार हुई.

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शिमला समझौते के नाम पर की दगाबाजी...

यह वो दौर था, जब पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी पाकिस्तान में भारतीय सेना के सामने सरेंडर कर दिया था. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 73 हजार पाकिस्तानी नागरिक भारतीय सेना की हिरासत में थे. इनमें 45 हजार पाकिस्तानी सैनिक या अर्धसैनिक शामिल थे. पश्चिमी पाकिस्तान का करीब 5 हजार वर्ग मील क्षेत्र भारत के कब्जे में था. पाकिस्तान बैकफुट पर आया और इसी सिलसिले में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो की हिमाचल प्रदेश के शिमला में मुलाकात हुई. 

यहां जो समझौता हुआ, उसे शिमला समझौता कहा गया. संपर्क बहाल हुए और प्रतिनिधिमंडलों का आना-जाना शुरू हो गया. शिमला समझौते और उसके बाद दिल्ली समझौते ने पाकिस्तान को वो सब कुछ दिया जो वह चाहता था. पाकिस्तान के वो सभी इलाके दिए, जिन पर भारतीय सेना का कब्जा था. इस बीच, साल 1976 में जुल्फिकार अली भुट्टो ने जनरल मुहम्मद जिया-उल-हक़ को सेना प्रमुख बना दिया. कुछ ही समय में सेना प्रमुख के तेवर बदल गए और पाकिस्तान ने जम्मू कश्मीर में आतंक के बीज बो दिए. जिया उल हक का मानना था कि जो काम (कश्मीर पर कब्जा) पाकिस्तान 1947-48, 1965 और 1971 के युद्धों में नहीं कर सका, उसे घाटी में धार्मिक कट्टरपंथ, आतंकवाद और अलगाववाद को बढ़ावा देकर आसानी से कर सकता है.

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शिमला समझौता पर हस्ताक्षर करतीं इंदिरा गांधी (फाइल फोटो)

जिया-उल-हक़ ने बढ़ाया आतंकवाद और कट्टरवाद

जिया-उल-हक़ कहा करता था कि कश्मीर को आजाद कराने की योजनाओं में हमने अतीत में गलतियां की हैं. हमने सीधे-सीधे सैनिक हस्तक्षेप के चलते कश्मीर को भारत से अलग कराना चाहा और मात खा गए. भविष्य में इन गलतियों से सबक लेते हुए सेना के अंतिम विकल्प को सुरक्षित रखेंगे. पाकिस्तान चाहता था कि पंजाब और घाटी दो-दो मोर्चों पर आतंकवाद से जूझने पर भारत को अस्थिर करने में आसानी होगी. ऑपरेशन टोपैक के जरिए ढाई लाख कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार कर उन्हें घरों से भगा दिया गया. जनरल जिया उल हक जैसे-जैसे सेना में ऊंचाइयां हासिल करते गए, वैसे-वैसे उनमें धर्म को लेकर कट्टरता बढ़ती गई. जब तख्तापलट के बाद जिया उल हक ने राष्ट्रपति पद संभाला तो संविधान को ठुकराते हुए शरिया कानून को लागू किया था, जिससे पाकिस्तान धार्मिक कट्टरता की राह पर चल पड़ा. आज पाकिस्तान बदहाली के जिस मोड़ पर है, वहां तक पहुंचाने में जनरल जिया उल हक की नीतियां जिम्मेदार बताई जाती हैं.

जिसने सेना प्रमुख बनाया, उसी को फांसी पर लटकाया

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने ही जनरल जिया उल को चीफ ऑफ ऑर्मी स्टाफ बनाया था. मगर उसी जनरल जिया उल हक ने मौका मिलते ही 5 जुलाई 1977 को न केवल जुल्फिकार अली भुट्टो का तख्तापलट कर सैन्य शासन लागू कर दिया, बल्कि उन्हें जेल भेजकर बाद में फांसी पर भी लटका दिया. जिया ने तख्तापलट के पीछे तर्क देते हुए कहा था कि जुल्फिकार अली भुट्टो के कार्यकाल में पाकिस्तान के हालात खराब हो चले थे, लिहाजा सैन्य शासन जरूरी था.

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वाजपेयी ने लाहौर समझौता किया, पाकिस्तान ने छेड़ दिया करगिल युद्ध

जनरल जिया की दगाबाजी से दोनों देशों में तनाव बना रहा. साल 1998 में दोनों देशों ने परमाणु परीक्षण किए. पाकिस्तान का पूरा परमाणु प्रोग्राम भारत की बराबरी करने के लिए शुरू हुआ था. इसके चलते पाकिस्तान को प्रतिबंधों की मार झेलनी पड़ी और निवेश में बड़ी गिरावट आई. इस बीच, फरवरी 1999 में जब अटल बिहारी वाजपेयी अमृतसर दौरे पर जाने वाले थे तो इस बात की जानकारी तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को मिली और उन्होंने वाजपेयी जी को फोन किया और पाकिस्तान आने का न्योता दिया. मतभेद के बावजूद भारत ने इस न्योते को स्वीकार किया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी कूटनीतिक समझ का परिचय दिया. क्योंकि परमाणु टेस्ट के बाद अमेरिका समेत कई पश्चिमी देश, भारत पर कड़ी नजर रख रहे थे.

vajpeyee and nawaz

20 फरवरी 1999 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी खुद दिल्ली-लाहौर बस सेवा की शुरुआत करने के लिए वाघा बॉर्डर पार कर पाकिस्तान पहुंचे. 21 फरवरी को वाजपेयी और नवाज शरीफ ने लाहौर वार्ता के द्विपक्षीय मसौदे पर हस्ताक्षर किए. मुख्य मुद्दा था- दोनों देशों में अब जंग नहीं होगी. लेकिन इतिहास गवाह है कि चंद महीने के बाद ही पाकिस्तान ने करगिल युद्ध का जख्म दिया. अटल बिहारी वाजपेयी के सपनों को पाकिस्तान ने रौंद दिया. नवाज शरीफ ने खुद इस बात को स्वीकार किया था कि लाहौर समझौते पर पाकिस्तान ने पानी फेर दिया था. उन्होंने स्वीकार किया था कि 28 मई 1998 को पाकिस्तान ने पांच परमाणु परीक्षण किए, उसके बाद वाजपेयी वहां गए और उनके साथ समझौता किया. लेकिन पाकिस्तान ने उस समझौते का उल्लंघन किया, यह उनकी गलती थी.

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PM मोदी ने 'सरप्राइज' दिया, लेकिन पाकिस्तान ने किए आतंकी हमले?

भारत का अपने पड़ोसी मुल्क से यूं ही मोहभंग नहीं हुआ है. साल 2015 में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोस्ती और बातचीत को एक नया रूप देने की कोशिश की और जब वो काबुल से लौट रहे थे तो अचानक पाकिस्तान पहुंचे और तत्कालीन पीएम नवाज शरीफ की मां को जन्मदिन की बधाई दी और रिश्ते को पटरी पर लाने के लिए कवायद भी की. लेकिन, सालभर बाद ही पाकिस्तानी आतंकी हमलों ने फिर जख्म हरे कर दिए और 2 जनवरी 2016 को पंजाब के पठानकोट में वायुसेना के एयरबेस पर अटैक कर दिया, जिसमें सात सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए थे. जबकि 37 घायल हो गए थे.

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यह सिलसिला थमा नहीं और कुछ ही महीने बाद सितंबर 2016 में आतंकियों ने जम्मू-कश्मीर के उरी सेक्टर में एलओसी के करीब भारतीय सेना के स्थानीय मुख्यालय पर बड़ा हमला किया. उरी हमले में भी 18 सैनिक शहीद हो गए थे. जवाबी कार्रवाई में चारों आतंकी मारे गए. देश में पाकिस्तान को लेकर नाराजगी चरम पर पहुंच गई. भारत ने पाकिस्तान सीमा में घुसकर आतंकियों के ठिकाने पर सर्जिकल स्ट्राइक की और इस हमले का बदला लिया था. इसी घटना पर ‘उरीः द सर्जिकल स्ट्राइक’ फिल्म भी बनी है.

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PM Modi stuns everyone with unexpected stopover in Lahore to meet Nawaz  Sharif - India Today

तीन साल बाद 14 फरवरी 2019 में पाकिस्तानी आतंकियों ने कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर आत्मघाती हमला किया. इसे अब तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला माना गया है. इस आतंकी हमले में 40 जवान शहीद हुए थे. जबकि 25 से ज्यादा जवान घायल हो गए थे. भारत ने 26 फरवरी को बालाकोट एयरस्ट्राइक करके जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों को ढेर कर दिया था. 

पुलवामा हमले के बाद 17 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बयान में कहा था, मैं अपने दिल में वही आग महसूस करता हूं, जो आपके अंदर भड़क रही है. सभी आंसुओं का बदला लिया जाएगा और सशस्त्र बलों को दुश्मन के खिलाफ प्रतिशोध की जगह, समय को तय करने की पूर्ण स्वतंत्रता दी गई है.

नवाज शरीफ ने भारत से दोस्ती के लिए क्या-क्या कहा...

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने कहा, भारत और पाकिस्तान को अतीत को भूलकर अच्छे पड़ोसियों की तरह रहना चाहिए. नवाज का कहना था कि हम अपने पड़ोसियों को नहीं बदल सकते, ना ही पाकिस्तान और ना ही भारत, लेकिन हमें अच्छे पड़ोसियों की तरह रहना चाहिए. यहां तक कि उन्होंने दोनों देशों के बीच सेतु की भूमिका निभाने तक की बात कह दी.

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नवाज ने विदेश मंत्री एस जयशंकर की यात्रा को ‘अच्छी शुरुआत' बताया और उम्मीद जताई कि दोनों पक्ष सकारात्मक रुख के साथ आगे बढ़ेंगे. नवाज ने दिसंबर 2015 में प्रधानमंत्री मोदी की अचानक लाहौर यात्रा को भी याद किया और इसकी तारीफ भी की. नवाज ने कहा, मेरी मां से उनका मिलना बहुत बड़ी बात थी. हालांकि, रिश्ते उतने मधुर नहीं रहे. नवाज का कहना था कि भारत-पाकिस्तान ने 75 साल इसी तरह लड़ते हुए बिताए हैं. हमें इसे अगले 75 सालों तक नहीं चलने देना चाहिए. पीएमएल-एन की सरकार ने दोनों देशों के बीच रिश्ते सुधारने के लिए कड़ी मेहनत की है. दोनों पक्षों को मिल-बैठकर चर्चा करनी चाहिए कि आगे कैसे बढ़ना है.

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ।

नवाज ने भारत-पाकिस्तान के बीच क्रिकेट संबंधों को फिर से शुरू करने की वकालत की. नवाज का कहना था कि अगर दोनों टीमें पड़ोसी देश में किसी बड़े टूर्नामेंट के फाइनल में खेलती हैं तो वो भारत जरूर जाना चाहेंगे. नवाज ने दोनों दोशों के बीच व्यापारिक संबंधों के महत्व पर भी जोर दिया. नवाज ने 1999 में वाजपेयी की दिल्ली-लाहौर बस यात्रा को भी याद किया. उन्होंने कहा कि वाजपेयी को आज भी लाहौर घोषणा पत्र और उस समय उनके शब्दों के लिए याद किया जाता है. मैं जब भी उस यात्रा के वीडियो देखता हूं तो उन सुखद यादों को महसूस करता हूं और बहुत अच्छा लगता है.

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दोस्ती के लिए पाकिस्तान बेकरार क्यों?

पाकिस्तान में PMLN पार्टी की सरकार है और नवाज शरीफ के छोटे भाई शहबाज शरीफ प्रधानमंत्री हैं. पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था काफी समय से बदहाल है. कर्ज का बोझ बढ़ता ही जा रहा है. यहां तक कि ब्याज देने के पैसे नहीं हैं. पाकिस्तान पर वित्त वर्ष 2025 के लिए 26.2 अरब डॉलर का कर्ज है. पाकिस्तान की 40.5 प्रतिशत से ज्यादा आबादी गरीबी रेखा से नीचे है. उसे अगले 12 महीनों में 30.35 बिलियन अमेरिकी डॉलर का कर्ज चुकाना है. हालात यह हैं कि खर्चों में कटौती के लिए नौकरियां कम की जा रही हैं और मंत्रालय तक खत्म किए जा रहे हैं. सितंबर में पाकिस्तान ने डेढ़ लाख नौकरियों तक में कटौती की. छह मंत्रालय भंग किए और दो मंत्रालयों का विलय कर दिया. इन मंत्रालयों को चलाने के लिए सरकार के पास फंड नहीं है. पाकिस्तान में खाने-पीने की चीजों की कीमतें आसमान छू रही हैं. यही वजह है कि पाकिस्तान के तेवर अब ढीले पड़ने लगे हैं. शायद इसी वजह से वो रिश्ते सुधारने की वकालत कर रहा है.

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