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एक साल में कितना बदला रूस-यूक्रेन वॉर, क्या होगा युद्ध का भविष्य?

ऐसा लगता है कि पुतिन ने या तो यूक्रेन की सेना में लगातार हो रहे सुधारों को पूरी तरह से नजरअंदाज किया या फिर उन्हें इससे वाकिफ ही नहीं कराया गया. इन सबसे बावजूद युद्ध के पहले हफ्ते के दौरान रूस की सेना ने पूर्वी यूक्रेन में महत्वपूर्ण बढ़त बना ली थी. लेकिन जल्द ही रूस के आगे बढ़ने का सिलसिला थम गया और यह युद्ध एक ऐसी जंग में तब्दील हो गया, जो बदस्तूर जारी है.

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रूसी सैनिकों से मिलते राष्ट्रपति पुतिन
रूसी सैनिकों से मिलते राष्ट्रपति पुतिन

रूस, यूक्रेन युद्ध को जल्द ही एक साल होने जा रहा है. पिछले साल 24 फरवरी को रूस ने यूक्रेन पर धावा बोल दिया था. लेकिन रूस का यह युद्ध एक साल पहले की तुलना में बिल्कुल अलग है. रूस ने यूक्रेन में सत्ता परिवर्तन के इरादे से फरवरी 2022 को कीव पर हमला किया था. लेकिन जल्द ही रूस को यह ख्वाब टूटता नजर आया और यह स्पष्ट हो गया कि यूक्रेन इतनी आसानी से हथियार नहीं डालेगा.

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ऐसा लगता है कि पुतिन ने या तो यूक्रेन की सेना में लगातार हो रहे सुधारों को पूरी तरह से नजरअंदाज किया या फिर उन्हें इससे वाकिफ ही नहीं कराया गया. इन सबसे बावजूद युद्ध के पहले हफ्ते के दौरान रूस की सेना ने पूर्वी यूक्रेन में महत्वपूर्ण बढ़त बना ली थी. लेकिन जल्द ही रूस के आगे बढ़ने का सिलसिला थम गया और यह युद्ध एक ऐसी जंग में तब्दील हो गया, जो बदस्तूर जारी है.

इन सबके बीच यूक्रेन की सेना ने 2022 में गंवा चुके अपने इलाकों को दोबारा अपने कब्जे में लेना शुरू कर दिया. लेकिन फिलहाल यूक्रेन की रफ्तार थम सी गई है. ना ही रूस और ना ही यूक्रेन को अभी तक युद्ध में निर्णायक बढ़त मिल पाई है. कई पश्चिमी पर्यवेक्षकों के अनुमानों के बावजूद यूक्रेन में रूस की सेना अभी तक पस्त नहीं हुई है और ऐसे कोई संकेत भी नजर नहीं आ रहे हैं. ऐसे में यह युद्ध बीते एक साल में कितना बदल गया है. यह जानना जरूरी है.

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रूस की सेना की दोबारा तैनाती

उत्तरी यूक्रेन पर रूस का हमला निस्संदेह उसकी हार था, जिसे बाद में रोक दिया गया. इसकी वजह से पूर्वी यूक्रेन में रूस ने दोबारा अपनी फौजों को तैनात किया.  

दक्षिणी यूक्रेन में खेरसॉन इलाके से रूसी सेना के पीछे हटने पर इसी के प्रभाव पड़े थे. रूस ने एक बेहद छोटी सेना के साथ यूक्रेन पर हमला किया, जिससे वहां एक व्यापक युद्ध छेड़ पाना संभव नहीं था. हालांकि पुतिन ने कई महीनो तक यह स्वीकार ही नहीं किया कि यूक्रेन में उसका तथाकथित सैन्य ऑपरेशन एक युद्ध है. लेकिन अब वह ऐसा कह रहे हैं. इस स्वीकारोक्ति से यूक्रेन में रूसी सेना को काफी मजबूती मिली. आरक्षित सैनिकों को युद्ध में उतारने से रूसी सेना को पहले की तुलना में अधिक मानव संसाधन मिला. रूस के इन आरक्षित सैनिकों को पूर्वी यूक्रेन में तैनात किया गया है, जहां वे फ्रंटलाइन पर मौजूद हैं. 

रूस का आक्रामक अभियान अब मुख्य रूप से दोनेत्सक और लुहांस्क के बाकी बचे क्षेत्रों को सुरक्षित करने पर केंद्रित है. अब उस क्षेत्र को सुरक्षत करना इस आक्रमण का मुख्य औचित्य है. 

युद्ध का तरीका बदला

रूस मौजूदा समय में डोनबास के बखमुत क्षेत्र में तेजी से आगे नहीं बढ़ पा रहा है. वह सीमित तरीके से आगे बढ़ रहा है, जो कई मायनों में रूस की सेना के अनुरूप है. 

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युद्ध की शुरुआत में रूसी सैनिकों के कमांड और नियंत्रण को लेकर जो दिक्कतें थीं. वह अब सीमित दायरे में सेना के ऑपरेशन के साथ कम हो गई हैं. आमतौर पर कम अनुभवी और व्यापक प्रशिक्षण की कमी के कारण रूस के आरक्षित सैनिक आज अधिक सीमित और व्यवस्थित कार्यों के लिए ज्यादा अनुकूल हैं. रूस की सेनाओं को तोपों से युद्ध लड़ने का व्यापक अनुभव है. 

पश्चिमी देशों और नाटो का यूक्रेन को समर्थन

रूस को लगे झटकों के बावजूद कुछ सर्वेक्षण में यह कहा गया है कि रूस की आबादी अभी भी यूक्रेन युद्ध में देश का समर्थन करती है. जनता का यह समर्थन यूक्रेन में जंग लड़ रहे रूसी सैनिकों के लिए बहुत जरूरी है. 

वहीं, दूसरी तरफ यूक्रेन को पश्चिमी और नाटो देशों का पूरा-पूरा समर्थन है. आलम यह है कि पश्चिमी देश रूस के खिलाफ लामबंद हो गए हैं. कई रूसियों का मानना है कि क्रीमिया, रूस का अभिन्न अंग है और यूक्रेन के क्रीमिया पर दोबारा कब्जे के प्रयासों को लेकर पश्चिमी देश उसके पाले में खड़े हैं. हालांकि, जैसे-जैसे रूस यूक्रेन युद्ध आगे बढ़ेगा, दोनों पक्षों के पास मैनपावर और संसाधनों का अभाव होगा. एक तरफ ईरान और उत्तर कोरिया जैसे मुट्ठीभर साथी रूस का साथ देंगे जबकि नाटो गठबंधन यूक्रेन के पीछे खड़ा रहेगा.

लंबी जंग की संभावना

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रूस और यूक्रेन दोनों के पास इतनी क्षमता है कि वे इस युद्ध को लंबा खींच सकते हैं. पश्चिमी देशों की मदद, आधुनिक पश्चिमी हथियारों के दम पर यूक्रेन की सेना छोटी अवधि में बहुत सशक्त होगी. लेकिन वाहनों का प्रशिक्षण, रखरखाव और सप्लाई के मुद्दें इसे जटिल बना देंगें.

अगर युद्ध इसी तरह जारी रहेगा तो पूरी-पूरी संभावना है कि यह किसी भी पक्ष के लिए निर्णायक नहीं होगा. हालांकि, किसी भी पक्ष को इससे अस्थाई लाभ हो सकता है लेकिन लंबी अवधि के लिए यह किसी के लिए भी फायेमंद नहीं होगा. दुखद है कि बातचीत के अभाव में यह खूनखराबा फिलहाल कुछ और समय तक जारी रह सकता है.

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