
बिहार पुलिस और प्रशासन की नजरों में आतंकवाद के खिलाफ लड़ने वाले लोगों की कोई कीमत और अहमियत नहीं है. इसीलिए दो दुर्दांत आतंकवादियों को पकड़वाने वाले अनुराग बासु को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक प्रशस्ति पत्र और महज 3500 रुपये देकर पन्ना झाड़ लेते हैं.
बिहार पुलिस भी अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट के मास्टरमाइंड इन बेहद खतरनाक आतंकवादियों को पकड़वाने वाले अनुराग को रत्ती भर श्रेय नहीं देना चाहती और इसीलिए चार्जशीट में अनुराग का जिक्र तक नहीं किया गया.
इतना ही नहीं अनुराग ने 'आजतक' को बताया कि उल्टे पुलिस उसे 120बी में फंसाने की धमकी भी देती रहती है. अपनी जान दांव पर लगाकर 56 लोगों की हत्या के मास्टरमाइंड आतंकवादियों को पकड़वाने वाला अनुराग अब पुलिस को फूटी आंख नहीं सुहा रहा.
आपको बता दें कि गया का रहने वाला अनुराग साइबर कैफे चलाता है और मार्शल आर्ट में ट्रेंड है. उसने अपने साइबर कैफे पर आए दो व्यक्तियों को जब अपनी जान जोखिम में डालकर पुलिस के हाथों पकड़वाया तब उसे शायद पता भी नहीं था कि वे अहमदाबाद में 2008 में 16 जगहों पर 21 सीरियल ब्लास्ट में शामिल रहे दुर्दांत आतंकवादी हैं.
अनुराग की बहादुरी और सजगता के ही चलते पुलिस ने न सिर्फ पठान तौसीफ और सन्ने खां जैसे दुर्दांत आतंकवादियों को गिरफ्तार किया, बल्कि तौसीफ से मिले इनपुट के आधार पर देश भर से 10 दुर्दांत अपराधियों को पकड़ने में भी मदद मिली थी. इन अपराधियों पर भी 10 लाख रुपये से अधिक का इनाम घोषित था.
आपको बता दें कि ATS, NIA सहित तमाम खुफिया एजेंसियों को पिछले 10 साल से दोनों दुर्दांत आतंकवादियों की तलाश थी, जिन्हें पिछले साल 13 सितंबर को अनुराग की बहादुरी और सजगता के चलते गिरफ्तार किया जा सका.
पुलिस ने दोनों आतंकवादियों के खिलाफ 10 मार्च को चार्जशीट दाखिल की है, लेकिन पुलिस की चार्जशीट में न तो अनुराग का जिक्र है और न ही उसके साइबर कैफे का जहां से दोनों आतंकवादी गिरफ्तार किए गए.
इस तरह पकड़े गए थे आतंकवादी
साधारण सा साइबर कैफे चलाने वाले अनुराग के जेहन में कहीं न कहीं दिल्ली पुलिस द्वारा जारी 10 आतंकवादियों की तस्वीर चस्पा रह गई थी. 13 सितंबर, 2017 को जब दोनों आतंकवादी उसके साइबर कैफे में आए तो उनकी संदिग्ध गतिविधियों ने उसके मन में शंका पैदा कर दी.
उसने अपनी समझदारी से न सिर्फ दोनों को काफी देर तक साइबर कैफे में ही फंसाए रखा, बल्कि मार्शल आर्ट में माहिर अनुराग ने जब देखा कि पुलिस आने में देर कर रही है और संदिग्ध भागने लगे तो उसने अपनी जान पर खेलकर दोनों को अकेले ही धर दबोचा.
यहां तक कि तेलंगाना पुलिस अनुराग के साइबर कैफे के 4 कंप्यूटरों की हार्ड डिस्क भी लेकर गई, जिसके आधार पर 4 लाख के इनामी अब्दुल सुब्हान कुरैशी को दिल्ली से, 10 लाख के इनामी मोहम्मद पैगंबर शेख को सिलिगुड़ी से और 10 लाख के ही इनामी मोहम्मद कमरूद्दीन को मुर्शिदाबाद से गिरफ्तार करने में कामयाबी मिली.
इनाम के बजाय मिली सजा
अनुराग को जहां इतने दुर्दांत आतंकवादियों को पकड़वाने का इनाम मिलना चाहिए था, वहीं अब उसकी रोजी-रोटी के भी लाले पड़ गए हैं. जिस साइबर कैफे के चलते उसने दोनों आतंकवादियों को पकड़वाया, अब वह साइबर कैफे बंद पड़ा हुआ है. अनुराग को समझ नहीं आ रहा कि वह करे तो क्या करे.
अनुराग ने 'आजतक' से कहा कि मैंने तो देशहित में काम किया था. लेकिन अब मेरा बुरा हाल है. देशहित में ऐसा काम क्या करना कि अपनी रोजी-रोटी ही बंद हो जाए. मेरा अपना घर भी नहीं है. किराए पर ही घर है और दुकान भी किराए पर ही थी.
पुलिस का रवैया बेहद खराब
मेरे प्रति पुलिस का रवैया बेहद बुरा रहा है. चाहे थाना अध्यक्ष हों या DSP. मुझसे कहा गया कि अवॉर्ड या रिवॉर्ड की मांग की तो 120बी लगाकर अंदर कर दिया जाऊंगा. दोनों आतंकवादियों को पकड़ने का सारा श्रेय पुलिस खुद लेना चाहती है.
अनुराग का कहना है कि वह एक आम नागरिक है, इसलिए उसके साथ ऐसा किया जा रहा है. अवॉर्ड या रिवॉर्ड की बात तो दूर चार्जशीट में मेरा जिक्र तक नहीं है. 1 फरवरी को CGM के यहां मेरा जो बयान लिया गया, उसका तक जिक्र नहीं है.
पुलिस का कहना है कि पकड़े गए आतंकवादी के नेटवर्क में गया के लोकल लोग भी इनवॉल्व हैं. इस तरह तो मुझे ही जान का खतरा बन गया है. मैं यहां रहने लायक नहीं हूं और मेरे पास इतने पैसे भी नहीं हैं कि किसी दूसरी जगह चला जाऊं.
पुलिस बना रही दबाव
अनुराग ने बताया कि पुलिस उस पर बयान बदलने का दबाव बना रही है. पुलिस ने उससे कहा कि वह ऐसा बयान न दे कि पुलिस देर से पहुंची. बस यह बोलना है कि आतंकवादी को पकड़कर हैंडओवर किया. पुलिस मुझे ही जान के खतरे का भय दिखा रही है.
अब तो मेरा साइबर कैफे का धंधा भी बंद हो गया है. पुलिस और आतंकवादियों के डर जो लोग मेरे यहां काम करते थे, वे भी चले गए. मैं उनके घर पर भी गया कि चलो भाई काम करो, लेकिन आतंक के डर से वे काम नहीं कर रहे. कस्टमर्स का आना भी बंद हो गया.
PM मोदी से गुहार का भी नहीं हुआ असर
गया के सांसद हरि मांझी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी दो पत्र लिखे, लेकिन प्रधानमंत्री की ओर से भी न तो कोई आश्वासन ही मिला और न ही कोई कार्रवाई हुई. अनुराग को भी अब तक उसकी बहादुरी के लिए सही रिवार्ड नहीं दिया गया.
बिहार एटीएस के डीएसपी ने 10 मार्च को चार्जशीट कोर्ट में दाखिल की है, उसमें अनुराग का कोई जिक्र नहीं है. आजतक ने जब उनसे इस संबंध में पूछा तो उनका कहना है कि चार्जशीट में इसकी जरूरत नहीं होती. लेकिन हकीकत यही है कि अवॉर्ड या रिवॉर्ड चार्जशीट के आधार पर ही तय होते हैं.
हालांकि एमजीआर, प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की ओर 8 दिसंबर को लेटर आया था, जिसमें लिखा हुआ है कि अनुराग को वित्तीय सहायता, सुरक्षा एवं अन्य लाभ दिए जाएं. लेकिन अनुराग को अब तक इसमें से कुछ भी नहीं मिला है.