लेबनान के दक्षिणी इलाकों में बुधवार यानी 18 सितंबर को एक बार फिर कई धमाके हुए. ये धमाके वॉकी-टॉकी में हुए. जिन्हें हैंड-हेल्ड रेडियो भी कहा जाता है. इजरायल और हिजबुल्लाह में एक साल पहले जंग शुरू हुई थी. तब से लेकर अब तक ये सबसे जानलेवा दिन साबित हुआ है. क्योंकि इससे एक दिन पहले हजारों पेजर ब्लास्ट हुए थे. (फोटोः रॉयटर्स)
इन धमाकों से कई सवाल उठे. तरीकों पर सवाल उठे. मकसद पता करने की कोशिश की गई. ये भी सवाल उठ रहा है कि वॉकी-टॉकी जैसे यंत्रों को हथियार में कैसे बदला जा सकता है. ये सारा हमला हिजबुल्लाह के कम्यूनिकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर को बर्बाद करने के लिए था. बेहद जटिल और नया तरीका किसी दुश्मन को डराने का. मारने का. (फोटोः एपी)
कैसे वॉकी-टॉकी को विस्फोटक बनाया... सबसे बड़ा सवाल यही है. विस्फोट होने वाले वॉकी-टॉकी की जांच हो रही है. डिटेल्स बाद में आएंगे. लेकिन ये एक बड़ा इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर था. एक्सपर्ट्स ने कुछ खास तरीके बताए हैं, जिनके जरिए इस तरह के यंत्रों को विस्फोटक में बदला जा सकता है. या उनमें धमाके किए जा सकते हैं. (फोटोः एपी)
RFI से रिमोट डेटोनेशन... वॉकी-टॉकी में पहले विस्फोटक लगाए जाते हैं. फिर उनमें एक सेकेंडरी सर्किट लगाई जाती है. ताकि वह खास रेडियो फ्रिक्वेंसी पर एक्टीवेट हो सके. हमलावर हिजबुल्लाह के रेडियो फ्रिक्वेंसी स्पेक्ट्रम का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. इन वॉकी-टॉकी को रेडियो फ्रिक्वेंसी इंटरफेरेंस के जरिए धमाके कराए जा सकते हैं. वो भी काफी दूर से. इसके लिए नजदीक जाने की जरूरत भी नहीं. (फोटोः रॉयटर्स)
यंत्र के अंदर ही विस्फोटक लगाना... वॉकी-टॉकी और पेजर में डिस्ट्रीब्यूशन से पहले विस्फोटक लगाना. हिजबुल्लाह ज्यादातर ऐसे ही यंत्रों के सहारे कॉर्डिनेट करती थीं. इंटेलिजेंस जमा करता है. ऐसे यंत्रों को बंटने से पहले टैंपर करना यानी उसमें विस्फोटक लगाना आसान है. इसकी जानकारी हिजबुल्लाह लड़ाकों को हुई नहीं. जैसे इन यंत्रों को इस्तेमाल में लिया गया, हमलावरों ने उन्हें एनकोडेड सिग्नल से ट्रिगर करके उड़ा दिया. (फोटोः एपी)
बूबी-ट्रैप्ड डिवाइसेस... बूबी ट्रैप का मतलब होता है वॉकी-टॉकी के ट्रांसमिट बटन को विस्फोटक की सर्किट के साथ जोड़ना. ताकि जैसे ही वॉकी-टॉकी को मुंह के पास लाकर हिजबुल्लाह लड़ाके बात करने के लिए बटन दबाएं. वो फट जाए. यह बहुत साधारण और देसी तरीका है. लेकिन वहीं संभव है, जहां पर एक ही तरह के यंत्र कई वर्षों से इस्तेमाल हो रहे हों. (फोटोः रॉयटर्स)
प्री-सेट टाइमर या एक्टीवेशन... वॉकी-टॉकी या पेजर को पहले से टाइम एक्टिवेशन मैकेनिज्म से जोड़ा गया हो. या ऐसे सेंसर लगाए गए हों, जो मूवमेंट या इस्तेमाल पर नजर रखते हों. इन सेंसर्स को लो-एनर्जी टाइमर से जोड़ा गया, ताकि समय आने पर एक साथ सीरीज में धमाके हों. हमलावरों को इसमें कम मेहनत करनी पड़ी होगी. (फोटोः एपी)
क्या कहते हैं एक्सपर्ट... मिडिल-ईस्ट की राजनीति और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर के एक्सपर्ट्स का मानना है कि हिजबुल्लाह के खिलाफ इस तरह के धमाके, उनके तरीके से नया बदलाव आएगा. वॉकी-टॉकी और पेजर के जरिए हमला दिखाता है कि ये साइकोलॉजिकल वॉरफेयर हैं. इससे हिजबुल्लाह के लड़ाके संचार के माध्यमों से डरेंगे. (फोटो- एपी)
हिजबुल्लाह की ऑपरेशनल कैपेसिटी को कम करना... हिजबुल्लाह कई तरह के कम्यूनिकेशन डिवाइसेस की मदद लेता है. ताकि उसके ऑपरेशंस चलते रहें. खासतौर से दक्षिणी लेबनान में. यहीं पर उसका मजबूत गढ़ है. इन यंत्रों पर हमला करके हमलावरों ने बता दिया कि अब हिजबुल्लाह के पास संचार में दिक्कत आएगी. जानकारियां शेयर नहीं कर पाएंगे. अलग-अलग रैंक के लड़ाकों के बीच संचार रुक जाएगा. इससे हिजबुल्लाह की काम करने की क्षमता प्रभावित होगी. इससे हमलावरों को रणनीतिक फायदा मिलता है. (फोटोः एपी)
हिजबुल्लाह लड़ाकों पर साइकोलॉजिकल असर... मारे जाने और जख्मी होने के अलावा हिजबुल्लाह के लड़ाकों के मन में ऐसे यंत्रों का डर बैठ जाएगा. वो ऐसे वॉकी-टॉकी और पेजर का इस्तेमाल करने से डरने लगेंगे. जो सबसे भरोसेमंद यंत्र हिजबुल्लाह के लिए थे. अब उसी से संगठन का भरोसा उठ जाएगा. इससे हिजबुल्लाह के लड़ाकों के बीच कॉर्डिनेशन में कमी आएगी. कनफ्यूजन पैदा होगा. प्लान शेयर नहीं हो पाएंगे. जहां पहले सिक्योरिटी महसूस होती थी, अब वहां डर महसूस होगा. (फोटोः एपी)
इन धमाकों से स्थानीय स्थिरता बिगड़ेगी... अगर ये धमाके इजरायल या किसी अन्य देश ने करवाए हैं, तो इससे सीमाओं पर संतुलन बिगड़ेगा. तनाव बढ़ सकता है. जंग हो सकती है. ये भी हो सकता है कि हिजबुल्लाह के अंदर कोई गुटबाजी हो. एकदूसरे के विरोध की वजह से ये हमले हुए हों. एक गुट ने दूसरो के लड़ाकों को खत्म करवाया हो. इससे भी बाहरी हमलावरों को हिजबुल्लाह पर हमला करने का मौका मिल जाएगा. (फोटोः एपी)
लेबनान में नया टेक्नोलॉजिकल वॉरफेयर... बेरूत में वॉकी-टॉकी विस्फोट बताता है कि लंबे समय से चल रहे इस संघर्ष में नया चैप्टर जुड़ गया है. कम्यूनिकेशन यंत्रों को हथियार बनाकर उन्हें उड़ाना ये बताता है कि ये काम करने वाले कितने सोफिस्टिकेटेड हैं. वो हर तकनीक इस्तेमाल कर सकते हैं. हर पैंतरा चला सकते हैं. ये एक नई जंग है. (फोटोः रॉयटर्स)