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दुनिया के सबसे रईस शख्स और टेस्ला के सीईओ एलन मस्क ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन किया है. मस्क ने कहा कि सबसे ज्यादा आबादी वाला देश होने के बावजूद भारत का यूएनएससी का स्थायी सदस्य न होना बिल्कुल 'बकवास' है.
मस्क यहीं नहीं रुके. उन्होंने आगे कहा कि समस्या ये है कि जिनके पास ज्यादा ताकत है, वो इसे छोड़ना नहीं चाहते. भारत के साथ-साथ मस्क ने अफ्रीका के लिए भी एक स्थायी सीट का समर्थन किया.
हाल ही में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी UN के संस्थानों में सुधार की वकालत की थी. उन्होंने कहा था कि संस्थानों को आज के हिसाब से चलना चाहिए, न कि 80 साल पहले की दुनिया के हिसाब से.
गुटेरेस की इस पोस्ट पर अमेरिकी मूल के इजरायली कारोबारी माइकल आइसेनबर्ग ने पूछा, और भारत के बारे में क्या? बेहतर होगा कि संयुक्त राष्ट्र को खत्म कर दिया जाए और रियल लीडरशिप के साथ कुछ नया बनाया जाए.
भारत लंबे वक्त से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग करता आ रहा है. विदेश मंत्री जयशंकर कई मौकों पर संयुक्त राष्ट्र में सुधार की बात कह चुके हैं. एक बार अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने भी कहा था कि समय आ गया है कि सुरक्षा परिषद में ऐसे सुधार किए जाएं जो आज की जरूरत को बेहतर तरीके से पूरा कर सकें.
पर ये संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद क्या है?
दूसरे विश्व युद्ध के बाद एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय मंच की जरूरत पड़ी जो सभी देशों को साथ लेकर चल सके. इसलिए 24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र का गठन हुआ. इसका हेडक्वार्टर न्यूयॉर्क में है. मौजूदा समय में 193 देश इसके सदस्य हैं.
संयुक्त राष्ट्र के 6 प्रमुख अंग- जनरल असेंबली, सिक्योरिटी काउंसिल, इकोनॉमिक एंड सोशल काउंसिल, ट्रस्टीशिप काउंसिल और सेक्रेटेरिएट और इंटरनेशनल कोर्ट है. इंटरनेशनल कोर्ट नीदरलैंड के हेग में स्थित है. बाकी सभी न्यूयॉर्क में है.
संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के तहत अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की जिम्मेदारी सुरक्षा परिषद यानी सिक्योरिटी काउंसिल पर है. सुरक्षा परिषद में 15 सदस्य हैं. इनमें 5 स्थायी और 10 अस्थायी सदस्य हैं.
स्थायी सदस्यों में अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, चीन और फ्रांस हैं. अस्थायी सदस्यों में अल्जीरिया, इक्वाडोर, गुयाना, जापान, माल्टा, मोजैम्बिक, साउथ कोरिया, सिएरा लियोन, स्लोवेनिया और स्विट्जरलैंड शामिल हैं. अस्थायी सदस्य दो साल के लिए क्षेत्रीय आधार पर चुने जाते हैं.
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भारत की क्या है मांग?
भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता देने की मांग करता रहा है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के गठन के बाद से अब तक कई बार भारत अस्थायी सदस्य बन चुका है.
भारत पहली बार 1950-51 में अस्थायी सदस्य बना था. उसके बाद 1967-68, 1972-73, 1977-78, 1984-85, 1991-92, 2011-12 और 2021-22 में दो साल के लिए सदस्य बना था.
सुरक्षा परिषद में भारत को स्थायी सदस्यता देने का समर्थन कई देश करते भी हैं, लेकिन अब तक कुछ खास हुआ नहीं है.
एक बार महासभा को संबोधित करते हुए विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा था कि भारत बड़ी जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार है. उन्होंने कहा कि अपने कार्यकाल में भारत ने कई गंभीर मुद्दों को सुलझाने के लिए ब्रिज की तरह काम किया है. हमने समुद्री सुरक्षा, शांति स्थापना और आतंकवाद का मुकाबला करने जैसी चिंताओं पर भी ध्यान केंद्रित किया है.
भारत लंबे समय से यूएनएससी के स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने पर जोर देता रहा है. उसका तर्क है कि ये संख्या इसलिए बढ़नी चाहिए, क्योंकि जब से बना, तब से अब तक कई देश काफी ताकतवर हो चुके हैं.
क्या भारत बनेगा परमानेंट मेंबर?
भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की वकालत करता आ रहा है. सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे ताकतवर देश भी इसमें सुधार की बात कर चुके हैं.
जानकारों का मानना है कि अगर सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाई जाती है, तो भारत के परमानेंट मेंबर बनने की सबसे मजबूत संभावना है.
कुछ साल पहले अटलांटिक काउंसिल नाम के थिंक टैंक ने एक सर्वे किया था. इसमें सामने आया था कि अगर नई सीट बनती है, तो भारत के स्थायी सदस्य बनने की संभावना सबसे ज्यादा 26% है. इसके बाद जापान (11%) और फिर ब्राजील (9%) है. हालांकि, सर्वे में शामिल 64% लोगों का ये भी मानना था कि 2033 से पहले सुरक्षा परिषद में सीट बढ़ने की संभावना नहीं है.
पिछले साल ब्रिटेन ने सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट बढ़ाने की वकालत की थी और कहा था कि भारत के साथ-साथ ब्राजील, जर्मनी, जापान और अफ्रीकी देश को स्थायी सदस्यता दी जाए.
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फिर कहां फंस जाता है पेच?
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच में से चार स्थायी सदस्य भारत के साथ हैं. सिर्फ चीन ही है जो भारत को स्थायी सदस्य बनाने का विरोध करता है. चीन के अड़ंगे की वजह से ही भारत स्थायी सदस्य नहीं बन पा रहा है.
चीन सुरक्षा परिषद में सुधार की बात तो करता है, लेकिन भारत की स्थायी सदस्यता पर सीधा बोलने से बचता है.
चीन के विदेश मंत्रालय ने तीन साल पहले एक बयान जारी कर कहा था कि 'सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का सवाल है, तो उस पर चीन का वही रुख रहेगा, जो हमेशा रहा है. चीन सुरक्षा परिषद में सुधार का समर्थन करता है, जिससे विकासशील देशों का प्रतिनिधित्व बढ़े और छोटे और मध्यम आय वाले देशों के पास यूएनएससी के फैसलों में भाग लेने का अवसर हो.'
और जब तक चीन अड़ंगा लगाता रहेगा, तब तक भारत को स्थायी सदस्यता नहीं मिल सकेगी. वो इसलिए क्योंकि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांचों स्थायी सदस्यों के पास वीटो पावर है. और सुरक्षा परिषद में किसी भी प्रस्ताव के पास होने के लिए पांचों की रजामंदी जरूरी है. अगर एक भी देश वीटो लगा देता है तो वो प्रस्ताव पास नहीं हो सकता.