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दिल्ली हाई कोर्ट का समय बर्बाद करने वाले वकील पर जुर्माना कायम, सब्सिडी रोकने की मांग की थी

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि कोई भी सरकार यह तय करने के लिए स्वतंत्र है कि वह राज्य में आम लोगों को किन चीजों पर सब्सिडी देना चाहती है.

हाई कोर्ट ने कायम रखा जुर्माना हाई कोर्ट ने कायम रखा जुर्माना
पूनम शर्मा
  • नई दिल्ली,
  • 21 अगस्त 2020,
  • अपडेटेड 1:48 PM IST

  • 'PIL की आड़ में कोर्ट का बहुमूल्य समय बर्बाद किया'
  • सब्सिडी राज्य का मैटर, नहीं कर सकते हैं हस्तक्षेप-HC

दिल्ली सरकार की बिजली-पानी को लेकर दी जाने वाली सब्सिडी पर सवाल उठाने वाली पुनर्विचार याचिका को भी दिल्ली हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया है. उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता पर 28 जुलाई को लगाया गया 25 हजार रुपये का जुर्माना भी बरकरार रखा है.

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कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि पुनर्विचार याचिका भी जनहित याचिका की आड़ में न्यायालय का समय बर्बाद करने के लिए लगाई गई थी. यह याचिका पूरी तरह से निरर्थक है क्योंकि सब्सिडी देना किसी भी राज्य का पॉलिसी मैटर है जिसमें कोर्ट हस्तक्षेप नहीं कर सकता.

कोर्ट ने कहा कि कोई भी सरकार यह तय करने के लिए स्वतंत्र है कि वह राज्य में आम लोगों को किन चीजों पर सब्सिडी देना चाहती है. कोर्ट ने माना दिल्ली सरकार का बिजली-पानी को लेकर आम लोगों को सब्सिडी देने का फैसला गलत नहीं ठहराया जा सकता.

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दरअसल, हाई कोर्ट में शैलेंद्र कुमार सिंह की याचिका में कहा गया था कि दिल्ली सरकार की ओर से बिजली पानी को लेकर जो सब्सिडी दी जा रही है, उस रकम से दिल्ली में बड़े विकास कार्य मसलन शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर किया जा सकता है.

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याचिकाकर्ता का दावा था कि उसने आरटीआई से मिली जानकारी के आधार पर पाया है कि दिल्ली सरकार द्वारा दी जा रही सब्सिडी राज्य सरकार के कुल खर्चे का 10 फीसदी के आसपास है. याचिकाकर्ता की तरफ से कहा गया था कि अकेले बिजली पर ही 2500 करोड़ की सब्सिडी साल में दी जा रही है.

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कोर्ट ने 28 जुलाई को कहा था कि इस याचिका पर सुनवाई की कोई जरूरत नहीं दिखती. कोर्ट ने माना कि यह याचिका मीडिया में सुर्खियां बंटोरने के इरादे से लगाई गई है. इस तरह की याचिकाएं आगे न लगाई जाएं इसके लिए याचिकाकर्ता पर 25 हजार का जुर्माना भी लगाया जा रहा है. जनहित याचिका खारिज होने के बाद याचिकाकर्ता ने इस मामले में दोबारा पुनर्विचार याचिका लगाते 25,000 रुपये के जुर्माने को हटाने की कोर्ट से दरख्वास्त की. लेक़िन कोर्ट ने अदालत का बहुमूल्य समय नष्ट करने के लिए जुर्माना हटाने से इनकार कर दिया.

याचिकाकर्ता की क्या थी दलील

याचिकाकर्ता ने पुनर्विचार याचिका में 1 घंटे तक अपनी दलील रखी और कहा कि सब्सिडी लेना किसी भी व्यक्ति का संवैधानिक अधिकार नहीं है बल्कि यह राज्य की तरफ से जब दी जाती है जब किसी व्यक्ति को इसकी जरूरत हो, या फिर उसकी आर्थिक स्थिति खराब हो. इसके अलावा सब्सिडी जरूरतमंदों को नहीं दी जा रही है बल्कि हर घर में दी जा रही है जहां पर इसकी जरूरत भी नहीं है. याचिकाकर्ता का कहना था कि पिछले 3 साल के दौरान लगातार सरकार का सब्सिडी पर दिए जाने वाला बजट बढ़ता जा रहा है.

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याचिकाकर्ता का कहना था कि दो कमरों के घर में रहने वाले व्यक्ति एक कमरा खुद का दिखाकर और दूसरे को फर्जी तरीके से किराये पर दिखाकर बिजली पर सब्सिडी ले रहे हैं. राज्य सरकार सब्सिडी पब्लिक मनी से ही देती है. ऐसे में सीधे-सीधे टैक्स देने वाले लोगों से प्राप्त होने वाले पैसे का दुरुपयोग है. इसीलिए याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि कोर्ट राज्य सरकार को निर्देश दे कि इस सब्सिडी को बंद किया जाए. लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट ने इस याचिका को सुनवाई योग्य ना मानते हुए खारिज कर दिया और कहा कि इस याचिका में कोई मेरिट नहीं है.

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