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आर्मी डॉग Zoom को लगी दो गोली, फिर भी पकड़वाए दो आतंकी... कैसे तैयार होते हैं ऐसे देशभक्त असॉल्ट डॉग्स

ऋचीक मिश्रा
  • नई दिल्ली,
  • 11 अक्टूबर 2022,
  • अपडेटेड 10:05 AM IST
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भारतीय सेना (Indian Army) के असॉल्ट डॉग Zoom ने अनंतनाग में दो आतंकियों को पकड़वाने के लिए अपनी जान की भी चिंता नहीं की. दो गोलियां लगने के बावजूद उसने आतंकियों को भागने नहीं दिया. दोनों आतंकी पकड़े गए. अब ज़ूम का इलाज चल रहा है. गंभीर रूप से घायल है. उसके ठीक होने की प्रार्थना की जा रही है. आइए जानते हैं कि ऐसे डॉग्स की ट्रेनिंग कैसे होती है. कैसे इन्हें इतना खतरनाक शिकारी बनाया जाता है कि ये आतंकियों से भी नहीं डरते. (वीडियोग्रैबः चिनार कॉर्प्स)

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असल में Zoom जैसे डॉग्स की ट्रेनिंग भारतीय सेना के कई सेंटर्स में होती है. लेकिन मुख्य सेंटर मेरठ में है. ट्रेनिंग के बाद डॉग्स और उनके हैंडलर को अलग-अलग जगहों पर ड्यूटी के लिए भेजा जाता है. जंग का मैदान हो या आतंकी घुसपैठ. बम डिफ्यूज करना हो या सर्जिकल स्ट्राइक. हर जगह ये 'बहादुर' जीव खुद को प्रमाणित करते हैं. (वीडियोग्रैबः चिनार कॉर्प्स)
 

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ये लड़ाई करना तो जानते ही हैं. साथ ही बचाव कार्यों में भी मदद करते हैं. मिलिट्री के कुत्तों (Dogs) की भी किसी सैनिक की तरह कठिन ट्रेनिंग होती है. हर कुत्ता ट्रेनिंग पूरी नहीं कर पाता. फेल हो जाता है. तो ट्रेनिंग में सफल होते हैं, वहीं डॉग यूनिट में शामिल होते हैं. इनकी ट्रेनिंग रीमाउंट वेटरीनरी कॉर्प्स (RVC) को शौर्य चक्र मिल चुका है. सेना के पास 1000 प्रशिक्षित कुत्ते हैं. जिन्हें कोई न कोई रैंक हासिल है. इनकी ताकत, सेहत, संख्या संभालने की जिम्मेदारी रीमाउंट वेटरीनरी कॉर्प्स (RVC) को ही सौंपी गई है. (फोटोः चिनार कॉर्प्स)

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सेना के डॉग्स का मुख्य काम है सर्च एंड रेस्क्यू. इसके अलावा ये बारूदी सुरंगें या बम खोजने में मदद करते हैं. अगर वो ऐसा न करें तो कई मिलिट्री मिशन खतरे में पड़ जाएं. इन बहादुर कुत्तों की वजह से जवानों की जिंदगियां बच जाती हैं. सैन्य कुत्तों की ट्रेनिंग खास तरह से होती है. ये हाथ के इशारों और अलग-अलग तरह के मौखिक आदेशों के आधार पर काम करते हैं. इन्हें ये आदेश इनके हैंडलर देते हैं, जो इनका पूरा ख्याल रखते हैं. (वीडियोग्रैबः चिनार कॉर्प्स)

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डॉग यूनिट में शामिल होने के लिए सघन मिलिट्री ट्रेनिंग से गुजरना होता है. हर कुत्ते को अलग-अलग तरह के कमांड्स दिए जाते हैं. इन्हें अलग-अलग स्थितियों में अलग-अलग तरह से भौंकने और आवाज निकालने की ट्रेनिंग दी जाती है. साथ ही अपनी जगह बिना पता चले दुश्मन का ठिकाना खोजने की ट्रेनिंग दी जाती है. (वीडियोग्रैबः चिनार कॉर्प्स)

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आर्मी डॉग स्क्वॉड ने पहली बार साल 2016 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लिया था. रीमाउंट वेटरीनरी कॉर्प्स (RVC) सेंटर एंड कॉलेज मेरठ कैंट में है. जहां पर इन डॉग्स की ट्रेनिंग पूरी की जाती है. फिर उन्हें मार्च पास्ट की ट्रेनिंग भी जाती है. भारतीय सेना के डॉग यूनिट में सबसे प्रमुखता से जर्मन शेफर्ड और लेब्राडोर की भर्ती की जाती है. क्योंकि ये प्राकृतिक तौर पर ट्रेनिंग को समझने के लिए सक्षम होते हैं. इन्हें सिखाना आसान होता है. साथ ही ये सैनिक द्वारा बताए जाए कमांड को आसानी से मान लेते हैं. (वीडियोग्रैबः चिनार कॉर्प्स)

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डॉग यूनिट में एक कुत्ते का सर्विस पीरियड 8 से 10 साल होता है. कई बार उसके सेहत और काबिलियत के आधार पर उसे कुछ समय का एक्सटेंशन भी मिल सकता है. लेकिन ऐसा दुर्लभ ही होता है. रिटायर किए गए डॉग्स को संभालना बेहद महंगा होता है. या तो इन्हें किसी को दान कर दिया जाता है. या फिर इन्हें यूथेनाइज कर दिया जाता है. ताकि दुश्मन इनसे किसी भी तरह का संवेदनशील डेटा न निकाल सके. (वीडियोग्रैबः चिनार कॉर्प्स)

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