दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धस्थल (World's Highest Battleground) सियाचिन पर इस समय दिन में माइनस 4 डिग्री तापमान है. रात में यह माइनस 10 तक जाता है. लेकिन सर्दियों में यहां पर पारा माइनस 55 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है. 35 फीट तक बर्फबारी होती है. 2500 वर्ग किलोमीटर में फैले दुनिया के सबसे बड़े ग्लेशियर सियाचिन पर भारतीय सेना के औसतन 5 हजार जवान तैनात रहते हैं. इतनी ठंड से बचने के लिए उनकी वर्दी भी खास तरह की होती है. जो उन्हें ठंडी हवा, बर्फ, नमी, सूरज की तेज रोशनी से बचाती है. (फोटोः इंडिया टुडे आर्काइव)
क्या कहते हैं इस तरह की वर्दी को?
इतनी ऊंचाई पर पहनने वाले यूनिफॉर्म को अलग-अलग नामों से बुलाया जाता है. भारतीय रक्षा अनुसंधान संगठन (DRDO) ने इसे एक्सट्रीम कोल्ड वेदर क्लोदिंग सिस्टम (Extreme Cold Weather Clothing System - ECWS) नाम दिया है. कुछ जगहों पर इसे एक्सट्रीम कोल्ड क्लाइमेट क्लोदिंग (ECCC) कहते हैं. इसके अलावा हाई एल्टीट्यूड कूल क्लोदिंग (High Altitude Cool Clothing) भी बुलाया जाता है. (फोटोः पीटीआई)
क्या खासियत होती है इस वर्दी की?
सियाचिन पर पहनी जाने वाली वर्दी की खास बात ये होती है कि ये अत्यधिक कम तापमान यानी माइनस 50 डिग्री सेल्सियस में भी शरीर को सुरक्षित रखता है. वर्दी का कपड़ा ऐसा होता है, जो नमी विरोधी होता है. वॉटरप्रूफ होता है. घर्षण रोधी होता है. पॉली यूथेरेन से बना होने के नाते यह काफी ब्रीदेबल होता है. बेहद मजबूत होता है. यानी तेज बर्फीली तूफानी हवाओं को संभाल सकता है. गीला नहीं होता. शरीर की गर्मी को वर्दी से बाहर नहीं जाने देता. बाहर की तेज रोशनी का बुरा असर त्वचा पर नहीं पड़ने देता. (फोटोः पीटीआई)
इस वर्दी में क्या-क्या होता है?
सियाचिन में पहनी जाने वर्दी में आमतौर पर जैकेट, विंडचीटर, वेस्ट कोट, ट्राउजर्स, ग्लेशियर कैप, रैपेलिंग दस्ताने, स्पेशल मोजे, थर्मन इनसोल्स और स्नो गॉगल होता है. इसके अलावा जवानों को हाई एल्टीट्यूड पल्मोनरी ओडेमा (HAPO) दिया जाता है. सिर्फ सियाचिन नहीं बल्कि द्रास, करगिल, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में तैनात भारतीय जवानों को इस तरह के यूनिफॉर्म और इक्विपमेंट दिए जाते हैं. (फोटोः इंडिया टुडे आर्काइव)
कितना वजन होता है यूनिफॉर्म का?
आमतौर पर सर्दियों में पहने जाने वाले जैकेट का वजन 2.4 किलोग्राम होता है. इसे फ्लीस और पॉलीस्टर से बनाया जाता है. जिनके ऊपर वॉटरप्रूफ कोटिंग होती है. इसमें थर्मल वेस्ट लगा होता है. या फिर अलग से पहनने को दिया जाता है. वहीं, ट्राउजर्स यानी पैंट का वजन 1.2 किलोग्राम होता है, जो पूरी तरह से पॉलीस्टर से बनाया जाता है. (फोटोः पीटीआई)
क्या इन वर्दियों को लेकर विवाद है?
सियाचिन में भारतीय सैनिकों द्वारा पहनी जाने वाली वर्दियों की गुणवत्ता को लेकर कई सालों से राजनीतिक विरोध और शिकायतें आ रही हैं. आती रहती हैं. आरोप लगाया जाता है कि भारतीय सेना की सियाचिन वाली वर्दी थोड़ी भारी है. इसके अलावा सैनिकों को स्लीपिंग बैग, राशन, हथियार और गोला-बारूद लेकर पेट्रोलिंग करनी होती है या फिर पोस्ट से निगरानी करनी पड़ती है. यह भी कहा जाता है कि जूते भी सही नहीं है. इसके बाद सरकार ने क्या किया? (फोटोः पीटीआई)
डीआरडीओ ने किया है ये काम?
पिछली साल दिसंबर में DRDO के प्रमुख डॉ. जी. सतीश रेड्डी ने एक्सट्रीम कोल्ड वेदर क्लोदिंग सिस्टम (Extreme Cold Weather Clothing System - ECWS) की तकनीक पांच भारतीय कंपनियों को दी. ताकि वो मिलकर भारतीय सेना के जवानों के लिए ऐसी वर्दी तैयार कर सकें. ये खास तरह की वर्दी हिमालय में तैनता भारतीय जवानों के लिए बनाई गई है. (फोटोः पीटीआई)
ECWS की खासियत क्या है?
एक्सट्रीम कोल्ड वेदर क्लोदिंग सिस्टम (Extreme Cold Weather Clothing System - ECWS) की सबसे बड़ी खासियत ये है कि यह तीन लेयर की है. यह शरीर की अंदरूनी गर्मी को वर्दी से बाहर नहीं जाने देता. बाहर भले ही 15 डिग्री सेल्सियस से लेकर माइनस 50 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान क्यों न हो. दूसरी बात ये है कि ये वर्दी शारीरिक मेहनत के साथ-साथ शरीर को अंदर से गर्म करती है. यह सैनिक को किसी भी तरह के शारीरिक कार्य के लिए मदद करती है न कि उसमें बाधा बनती है. (फोटोः इंडिया टुडे आर्काइव)
अभी कैसी वर्दी का हो रहा उपयोग?
फिलहाल, भारतीय सेना अमेरिका और यूरोप में बने हाई एल्टीट्यूड कूल क्लोदिंग का उपयोग कर रही है. लेकिन बहुत जल्द इसे स्वदेशी वर्दी मिलेगी. डीआरडीओ ने बेहतरीन तीन लेयर की IREQ तकनीक से इस नई वर्दी को बनाया है. जिसका निर्माण देश की पांच कंपनियां कर रही हैं. (फोटोः पीटीआई)