
शिवपुरी! मध्यप्रदेश का बेहद हराभरा ये शहर पहली नजर में किसी भी मंझोले आम इलाके जैसा लगेगा. सांवली-सुस्त सड़कों पर धुआं उड़ेलती गाड़ियां. पुरानी ढब के मकान-दुकान. चौराहों पर पान के साथ गप्पें चबाते पुरुष. और सिर पर घूंघट काढ़े औरतें. ज्यादातर ओडीशा, झारखंड, बंगाल और छत्तीसगढ़ से आई हुईं. ब्याहता की तरह लगती ये औरतें खरीदकर लाई गई हैं.
गलियों में ढेर के ढेर एजेंट्स. आप जरूरत बताइए, वे लड़की दिलवाएंगे. कीमत 10 हजार से लेकर कई लाख तक. पसंद न आने पर रीसेल की गुंजाइश भी. खरीदार किसी झंझट-मुसीबत में न फंस जाए, इसके लिए राजीनामे का करार भी.
कुछ सालों पहले तक शिवपुरी में एक परंपरा हुआ करती थी- धड़ीचा. इसमें पेपर पर लिखा-पढ़ी के साथ औरतें खरीदी-बेची या किराये पर ली जाती थीं. भाड़े पर लेने की मियाद कुछ महीनों से लेकर सालों तक हो सकती थी. प्रथा ऊपरी तौर पर बंद हो चुकी, लेकिन परदे की ओट में सबकुछ वही. पुराने जानकार इसे दधीचा, खरीचा, लड़ीचा जैसे कई नाम देते हैं.
थोड़ा खोजने पर फॉर्मेट लेकर बैठे नोटरी बाबू भी मिलेंगे और ‘फ्रेश मौड़ी’ दिलवाने वाले बिचौलिए भी. वे हाथ के हाथ आपको दो-चार फोटो दिखा देंगे. पसंद कीजिए और हफ्तेभर में लड़की आपकी. बस, उम्र, रंगरूप और ताजा-पुरानी के आधार पर कीमत बदल जाएगी.
अंदरुनी बीमारी की तरह फलती-फूलती इस परंपरा को टटोलने हम दिल्ली से निकले.
आगरा-बॉम्बे नेशनल हाइवे होते हुए लगभग 8 घंटे में शिवपुरी पहुंच जाएंगे. पोहरी तहसील हमारा पड़ाव था, जहां करार पर लाई हुई लड़कियों और एजेंटों से हमारी मुलाकात होनी थी.
कुछ पति भी टकराए, जिनकी औरतें उन्हें छोड़कर भाग चुकीं. उखड़े लहजे में वे कहते हैं- 'पैसे भी गए. मौड़ी (लड़की) भी. भाग जाएगी, अंदाजा होता तो बेचकर ‘लागत’ ही निकाल लेते.'
लेकिन भागी क्यों?
क्या पता! हमारी बोली नहीं समझ पाती थी तो खींचकर दो-चार जमा दिए थे. बस, इसी पर तुनक गई.
चेहरे पर छोड़कर गई पत्नी की याद की कोई खरोंच नहीं. जैसे नया एसी बिगड़ने पर हम सर्विस सेंटर कॉल करते हैं, वैसे ही खरीदार, दलालों के पास शिकायत करते हुए. कम दाम पर नई मौड़ी दिलाने की मांग करते हुए. कुछ को औरत के साथ भागे हुए बच्चे चाहिए थे ताकि वंश चल सके.
लगभग ढाई सौ गांवों वाली तहसील पोहरी में हर हजार पुरुषों पर 874 महिलाएं हैं, यानी कुल 126 लड़कियां कम.
डिमांड और सप्लाई के बीच इसी फासले को पाट रहे हैं एजेंट. वे गरीब राज्यों से लड़कियां लाते और यहां बेचते हैं. रकम का बड़ा हिस्सा लड़की के परिवार या दूसरे स्टेट के बिचौलिए को मिलेगा, जबकि बचा हुआ लोकल दलाल के पास चला जाएगा. कभी-कभार माला पहनाने की रस्म होती है, कभी वो भी नहीं. लड़की आएगी और पुराने नौकर की तरह घर के सारे काम संभाल लेगी. बस, फर्क इतना है कि वो भरोसेमंद कभी नहीं हो पाती.
अक्सर उम्र का फासला इतना होता है कि परिवार को हरदम उसके भागने का डर रहता है. लेकिन इसकी भी तोड़ है. आते ही वो प्रेग्नेंट कर दी जाती है. 'बचुवन का चेहरा देखकर खूंटे से टिक ही जाएगी.' ये बात बताते हुए लोकल सोर्स ऐसे ही एक चेहरे से मुलाकात करवाता है.
कुल साढ़े चार साल में नेहा के 3 बच्चे हो चुके. हम जब पहुंचे, वो वहीं कपड़े सुखा रही थीं. नए लोगों के सामने पड़ने पर भी रुककर देखने की कोई कोशिश, आंखों में कोई जुंबिश नहीं. बुलाहट पर साड़ी से हाथ पोंछते हुए खड़ी हो जाती हैं. सवाल या हैरानी से खाली नर्म बचकाना चेहरा.
ओढ़ी हुई बुजुर्गियत जितनी ही पुराने रंग की साड़ी पहनी नेहा से पूछती हूं- हम अंदर बैठकर बात करें! वे चुपचाप देखती रहती हैं. सवाल दोहराने पर भी चुप. आखिरकार उनकी सास मोर्चा संभालती हैं- यहीं बात कर लीजिए न. मैं कूलर चला देती हूं. नहीं. हाथ से बरजते हुए रिक्वेस्ट करती हूं- आपकी बहू से तसल्ली से बात करनी है. वे जितनी खुलेंगी, आपको उतना फायदा होगा.
बात असर कर जाती है. वे नेहा को पास वाले कमरे में भेज देती हैं. असल में यहां के लोगों से बात करते हुए हम एनजीओ वाले थे, जो दूसरे स्टेट से आई लड़कियों के लिए वेलफेयर स्कीम पर काम कर रहे थे.
लगभग साढ़े चार साल पहले यहां आई नेहा पुरानी भाषा शायद बिसार चुकीं. बुंदेली मिली हिंदी में कहती हैं- पांच साल पहले मां-बाप गुजरे. घर में मुझे मिलाकर दो दीदियां थीं. दोनों शादीशुदा. तभी वो (बिचौलिया) आया. कहा- 'शादी करा दो. खाता-पीता घर है. सुखी रहेगी. पांव थोड़े खराब हैं, लेकिन बे-मां-बाप को और क्या जुटेगा.' दीदी लोग मान गईं.
और आप?
नेहा कंधे उचकाती हैं, मानो ये भी एक भाषा हो, जिससे बेमतलब सवालों का जवाब दिया जाता हो.
शादी हुई थी आपकी इनसे!
नहीं. माला पहनाई. मुंह में मोती (मोतीचूर) का लड्डू ठूंसा. और एक कागज पर साइन करवाए.
कौन सा कागज?
क्या जानें! मुझे बस साइन करने कह दिया. साथ में कोई था नहीं कि मना करती या पूछती.
क्यों, दीदी लोग कहां थीं आपकी?
उनसे तो फिर कभी मिल ही नहीं सकी. पति ने नंबर हटा रखा है. कहता है कि उनसे बात करोगी तो घर टूट जाएगा. मेरे हाथ में कभी फोन भी नहीं आता. एक बार फोन मिल भी गया तो समझ नहीं आया कि बात किससे करूं. न तो मुझे कोई नंबर याद है, न कोई नाम, जिसके सामने रोने का जी चाहे. बड़ी दीदी से एक बार बात करने की कोशिश की तो पति ने लत्ते की तरह भरकस कूटा. फिर हिम्मत नहीं हुई.
कभी भागने की कोशिश नहीं की, या पुलिस के पास जाने की!
नेहा बैठे हुए ही साड़ी को झटकारती हैं, जैसे धूल या कीड़-मकोड़ झाड़ रही हों. फिर धीरे से कहती हैं- पहले-पहल खूब चाहा था. लेकिन फिर पेट में बच्चा आ गया. एक के बाद एक तीन होते चले गए. अकेली होती तो भाग जाती. इन्हें लेकर कहां जाऊं! कोई है ही नहीं.
इतने बच्चे क्यों कर रही हैं, आप तो नए जमाने की हैं! समझाइश-नुमा सवाल न चाहकर भी चला आया.
मैंने उसको (पति) मना भी किया, लेकिन वो रुकता ही नहीं. कमरे से भागो तो पकड़कर मारपीट करेगा. गुस्से का तेज है. डर लगता है कि कहीं बच्चों को भी न पीट दे इसलिए चुप हो जाती हूं. फिर सब चीज औरत के बस में कहां...
छोटे-सांवले चेहरे पर बेहद कमउम्र, लगभग दुधमुंही आंखें.
उम्र क्या है आपकी? 20 साल की हो जाऊंगी दो-चार महीने में.
बर्थ सर्टिफिकेट देखे बिना भी समझ आता है कि लड़की की उम्र इससे भी कम होगी. तीन बच्चे, दिन-रात का काम और रोज-रोज की मारपीट भी आंखों का बचपना नहीं छीन सकी. लेकिन आवाज में 20 साल की लड़की का कोई उछाह नहीं.
क्या अच्छा लगता है, कोई शौक!
उधर से जवाब आता है- शौक क्यों नहीं होगा! किसे नहीं होता! इतने साल में अस्पताल के अलावा कभी बाहर नहीं निकली. बाजार देखना चाहती हूं. फुचके (ये पहला शब्द था, जो उनके मायके का था) खाना चाहती हूं. बहन के घर जाना चाहती हूं. मन की साड़ी पहनना चाहती हूं. ये क्या जिंदगी है. किसी ने कपड़े दिए तो पहन लिए.
ये साड़ी आपको किसने दी. आंखों में किरकिराते सलेटी रंग को दिखाते हुए आखिर पूछ ही डालती हूं.
पड़ोस की चाची ने. पुरानी हो गई थी. फेंकती, इससे अच्छा मुझे मिल गई. बिना लाग-लपेट जवाब आता है.
आपको पता है कि यहां लड़कियां खरीदकर लाई जाती हैं! टोह लेता सवाल. कूलर बंद है इसलिए आवाज दबाकर बात की जा रही है.
जानती हूं. पूरे गांव में हैं. बगल वाली ही एक लाख में आई. यहां यही चलता है. बूढ़े-बूढ़ों की शादी नहीं होती तो हमारे वहां से ले आते हैं. फिर किसी और को बेचकर नई ले आते हैं.
आपको कितने में लाया गया!
मैं...! मुझे नहीं पता. बिचौलिया अकेला नहीं था. मेरी दीदी भी थी. वो क्यों पैसे लेगी! खुद को ही भरोसे की थपकी देती आवाज. जैसे पहली बार ये बात सुनी हो, लेकिन सोच कई-कई बार चुकी हो.
बात चल ही रही थी कि किवाड़ हटाकर भीतर नेहा का परिवार आ जाता है. वेलफेयर स्कीम की दरयाफ्त करते हुए सास बताती हैं- बिना मां-बाप की बच्ची थी. हमने सोचा घर बस जाएगा तो ले आए. इसे तो न बोली आती थी, न यहां का तौर-तरीका. रात में भी भात खोजती. जैसे-तैसे अपने में ढाल पाए.
नेहा सामने ही बैठी हैं. सलेटी साड़ी को रुक-रुकर झाड़ती हुई, मानो पुराने जन्म की याद झाड़कर हटा रही हों.
आगे हमारी मुलाकात हुई 42-43 साल की मीना से. करीब 30 साल पहले कॉन्ट्रैक्ट पर पोहरी आई ये महिला तीन हाथों से गुजर चुकी.
हाथों से गुजरना- यहां ये टर्म खूब बोला जाता है. मीना की ये तीसरी शादी है, या यूं कहें कि वे तीन बार बेची जा चुकीं. हर शादी से हुए बच्चे उसी पति के पास छोड़ने पड़े. पूरी बातचीत के दौरान मीना हंसती रहती हैं. पूछने पर कहती हैं- ये पहली बार है जब कोई हमई (हमारी) बात सुनने आया, वो भी इतनी दूर से. हंसी तो आएगी.
मीना ज्यादा कुछ कहने को राजी नहीं. बोलती हैं- बूढ़ी-बाढ़ी सही, लेकिन हूं तो बच्चों-वाली. ये वाला खूब 'गुस्सावर' है. बेच देगा तो बच्चे छूट जाएंगे. काफी हील-हुज्जत के बाद मनाया जा सका कि कहीं भी उनका नाम या चेहरा नहीं दिखेगा. ओडीशा के कंधमाल से आई ये महिला शिवपुरी की अलग लहजे वाली हिंदी बोल रही हैं.
वे याद करती हैं- महीना आया ही था कि मेरी शादी हो गई. घरवालों ने बताया कि नए घर में पेट भरकर खा सकेगी. खाना मिला तो लेकिन एकदम अलग. वहां भात-मछली खाते. यहां रोटी और महीन चावल का चलन. शुरू में खाना रुचता ही नहीं था. आहिस्ते-आहिस्ते रोती कि कहीं घर से न निकाल दें.
सबसे ज्यादा बिगाड़ बोली पर हुई. न मैं उनकी भाषा समझती थी, न वे मेरी. कुछ काम करने को कहते, मैं देर तक समझ ही नहीं पाती थी. फिर बेदम कुटाई होती. एक बार पति ने लोटा मांगा. मैं खड़ी रही. वो बिदक गया. खुद लोटा खोजकर लाया और मेरे सिर पर दे मारा. कांस का भारी बर्तन. खून बह रहा था, लेकिन मैं, लोटा क्या है, ये समझ रही थी.
मीना के सिर पर अब भी एक निशान दिखता है. वो माथे पर हाथ फिराकर हंसते हुए ही दर्द की पूरी तस्वीर खींच जाती हैं.
बोली न समझने की 'शिकायत' एजेंट के पास टकराए एक पति ने भी की. मुन्ना लाल नाम का ये शख्स दो औरतें ला चुका. ‘पहली वाली 10 हजार में आई थी. वो सालभर तक कुछ समझ ही नहीं सकी. हाथ लगा-लगाकर समझाना पड़ता था कि फलां चीज चाहिए. बेटा भी नहीं दे सकी. हारकर उसे भगाना पड़ा.’
भगाना पड़ा मतलब?
दूसरे के पास बेच दिया.
आपने अपनी ही पत्नी को दूसरे को बेच दिया?
सवाल पर मुन्ना पान रंगे दांत दिखाते कहते हैं- शादी कहां. बेटा तो दे नहीं सकी. अब नई वाली है. उसे 20 हजार में लाया. देखें, वो क्या करती है.
खरीदकर क्यों लाते हैं? यहां आपको लड़की नहीं जुट सकी?
यहां कोई व्यवस्था नहीं. और आदतें भी अपनी कुछ खराब थीं. सब जानते थे तो बेटी नहीं देना चाहते थे. दरम्यानी उम्र का ये शख्स अब भी कुछ चबा रहा है. चेहरे पर किसी किस्म की हड़बड़ाहट या डर नहीं. वो 10 हजार देने पर भी बोली न समझने और बेटा न दे पाने वाली औरतों पर नाखुश है.
कई और पतियों से मुलाकात हुई. एक काफी रसूखदार. अपने से आधी उम्र की औरत को ब्याहकर लाया ये पति फिलहाल अकेला है. पत्नी छोड़कर छत्तीसगढ़ भाग चुकी. साथ में बच्चा भी ले गई. पति यहां-वहां अर्जी लगाते हुए कि औरत बदचलन है, वो जहां चाहे रहे, लेकिन बेटा लौटा दे.
मुझसे कहते हैं- छत्तीसगढ़ में पहचान हो तो बताइए. मैं फ्लाइट, रहने सबका खर्चा दूंगा. बस, लड़का मुझे मिल जाए.
देश के कई और हिस्सों में लुक-छिपकर दुल्हनों की खरीद-फरोख्त होती है, लेकिन शिवपुरी का मामला सबसे अलग है.
यहां नोटरी के पास कॉन्ट्रैक्ट होता है, जिसे लिव-इन करार कहते हैं. इसका बाकायदा एक फॉर्मेट है, जिसमें तय बातें ही लिखी जाएंगी, न कुछ कम, न ज्यादा. अगर लड़की ‘फ्रेश’ है, जैसा दलाल वादा करते हैं तो करार का फॉर्मेट अलग होगा. वहीं, अगर वो ‘दूसरे हाथ से गुजर’ रही हो तो कागज की भाषा बदल जाएगी.
इसी साल के ऐसे दो कॉन्ट्रैक्ट हमारे पास पहुंचे. इसमें दिखाया ये जाता है कि लड़की अपनी मर्जी के किसी से जुड़ रही है. साथ ही ये भी लिखा जाता है कि वो पहने हुए कपड़ों में आई है, उसके पास पुराने पति या माता-पिता के घर का कोई गहना-नगद नहीं.
कभी कोई मामला हो जाए तो ये कॉन्ट्रैक्ट कितने फुल-पूफ्र हैं, ये समझने के लिए हमने स्थानीय वकील से बात की.
शिवपुरी जिला कोर्ट में प्रैक्टिस कर रहे सीनियर एडवोकेट आनंद धाकड़ कहते हैं- धड़ीचा प्रथा पूरी तरह से गैरकानूनी है. दलालों के जरिए लड़कियां बाहर से लाई जाती हैं और नोटरी कागज बना देते हैं. ये वैधानिक शादी नहीं. गरीब तबके का फायदा दलाल और बाकी लोग उठा रहे हैं.
क्या कॉन्ट्रैक्ट में पैसों का लेनदेन भी होता है?
पैसों के लेनदेन पर मीडिएटर ही ठीक से बता सकता है लेकिन दस्तावेजों पर ये नहीं लिखा जाता. न ही टाइम पीरियड रहता है कि फलां से फलां समय के लिए लड़की फलां शख्स के पास रहेगी. ये भी सुनने में आता है कि खरीदी हुई लड़की अगर पसंद न आए तो आदमी उसे दूसरे को बेच देता है.
इस कागज की कितनी कानूनी वैधता है. अगर कोई केस हो जाए तो लिव-इन का ये दस्तावेज किस काम आएगा?
ये डॉक्युमेंट किसी काम का नहीं, बस लोग अपनी तसल्ली के लिए बनवा लेते हैं. नीचे इसपर किसी वकील का नाम नहीं होता, केवल एक बेसिक ड्राफ्ट रहता है. ऐसे में कभी कोई मामला फंस जाए तो पीड़ित इसे अदालत में पेश तो कर सकते हैं, लेकिन कोर्ट इसे सच मानेगा या नहीं, ये उसकी मर्जी होगी. हो सकता है कि ऐन मौके पर लड़की इनकार कर दे कि मुझे धमकाकर साइन करवाया गया या अंगूठा लगवाया गया, मेरी साथ रहने की मर्जी नहीं थी.
कई बार लड़की साथ रहने आती है, और कीमती चीजें लेकर फरार हो जाती है. लेकिन चूंकि शादी हुई नहीं, न कोई कानूनी लिखी-पढ़ी है. खरीदकर लाया गया है तो कार्रवाई भी उतने दम से नहीं हो पाती.
लिव-इन में रहते हुए अलगाव हो जाए तो बच्चों की कस्टडी किसे मिलेगी?
कानून के मुताबिक, अगर कपल 7 या ज्यादा सालों तक साथ रहे तो उसके हक शादीशुदा जोड़े की तरह ही होते हैं. बच्चों के मामले में भी ये बात लागू होती है. वैसे उनपर मां का हक ज्यादा रहता है, जबतक कुछ अलग साबित न हो जाए, या बच्चा खुद मां से अलग रहने की बात न करे.
लड़कियों और जरूरतमंदों की बीच पुल का काम करने वाले एजेंटों से मुलाकात खास मुश्किल नहीं थी. बस, आपको खुद को क्लाइंट दिखाना था.
शहर में हमारी दो बिचौलियों से मुलाकात हुई. हफ्तेभर से लेकर 10 दिन में दुल्हन दिलाने का वादा. कीमत- ढाई लाख से लेकर सात लाख. ये फर्क इसलिए कि मेरी यानी भावी क्लाइंट की डिमांड कम-ज्यादा थी. एक एजेंट से बातचीत को हम जस का तस यहां लिख रहे हैं.
दिल्ली में हमारे एक परिचित हैं. उनके लिए लड़की चाहिए.
मिल जाएगी जी. क्या उम्र है लड़के की.
40 के आसपास. लेकिन दिखने में बहुत बढ़िया हैं.
कोई दिक्कत नहीं. दिखने से क्या होता है. गऊ मौड़ी दिलाएंगे- उठ तो उठ. बैठ तो बैठ.
वो तो ठीक है लेकिन हमें ऐसी-वैसी नहीं चाहिए. पढ़ी-लिखी हो. शहर में उठ-बैठ भी सके.
सोचते हुए...पढ़ी-लिखी तो दूसरी-तीसरी तक होगी, लेकिन शहर में रहना सीख जाएगी. एकदम फर्राटे से.
नहीं. इतनी कम पढ़ी नहीं. कम से कम कॉलेज तक तो पहुंची हो.
हंसते हुए...अब उसे कौन सी नौकरी करनी है. बोलचाल, देखभाल में बढ़िया दिलाएंगे. गोरी एकदम. चकाचक. लाइटें फैल (फेल) हो जाएंगी दिल्ली की.
पैसे कितने खर्च होंगे.
पैसों का क्या! आप तो जानने वाली (हम पहली बार मिले थे) हैं. कम लगा देंगे. ढाई लाख में हो जाएगा. अपना नंबर दे जाइए. बाकी बातें शाम को फोन पर हो जाएंगी.
जाते हुए मैं भरोसा पाने के लिए शक जताती हूं- यहां से कई केस सुने हैं. कोई गड़बड़ तो नहीं होगी! ऐसा तो नहीं कि लड़की पैसे लेकर फरार हो जाए!
नहीं जी. हम बीच में क्यों बैठे हैं. आप तसल्ली रखिए. फोन पर बात के बाद हम लड़कियों की फोटो भेज देंगे.
अभी फोटो हों तो कुछ तो दिखा दीजिए...
सोचते हुए...हैं तो लेकिन आपके काम की नहीं.
मार्केटिंग के पुराने बंदे की तरह बात करते दलाल का नेटवर्क दूसरे राज्यों तक था. फोटोग्राफ्स को पके-पकाए प्रोडक्ट की तरह साथ लेकर घूमता ये शख्स हर जरूरतमंद से अलग-अलग रेट मांगता. कई बार 10 हजार पर डील हो जाती है. ये बात उससे मिलवाने वाले सोर्स ने बताई.
दूसरा एजेंट कहीं ज्यादा चौकन्ना था. बाजार में बात करने को राजी नहीं. हम शहर से कुछ आगे एक गाड़ी में मिले.
आते ही कहता है- देखिए, हम गंदा काम करने वाले लोग नहीं. मार्केट में ऐसे ढेर मिल जाएंगे. पचास हजार में सौदा कर लेते हैं. उनका मामला साफ नहीं रहता.
तो आप हमें साफ मामले वाली मौड़ी दिलवाएंगे!
हां जी. बिल्कुल.
दिल्ली के लिए चाहिए. लड़का लगभग 40 का है.
मिल जाएगी. और बताइए.
पढ़ी-लिखी हो. पहले से शादीशुदा बिल्कुल नहीं चाहिए.
मिलेगी. एकदम फ्रेश दिलवाएंगे लेकिन कीमत बढ़ जाएगी.
कितनी.
सात लाख लग जाएंगे.
इतने पैसे. एक भाई साहब तो दो-ढाई में दिलवाने की बात कर रहे हैं.
बिदकते हुए...हमने तो पहले ही बताया. वो लोग गलत काम करते हैं. अपना ऐसा नहीं. बोल रहा हूं, फ्रेश लड़की मिलेगी. खूबसूरत. ऐसे में मां-बाप पैसे तो ज्यादा मांगेंगे ही.
फिर भी...पैसे ज्यादा हैं. आप अपना कमीशन कम कर लीजिए थोड़ा.
अरे मैडम. कमीशन कहां. अपन तो चाहते हैं कि किसी का काम बन जाए. थोड़ी-बहुत अपनी भी दाल-रोटी निकल जाती है.
अच्छा छोड़िए, कहां की लड़की होगी.
झारखंड या बंगाल.
छत्तीसगढ़ या एमपी की दिलवा सकते हैं क्या. वहां की होगी तो हिंदी बोल-समझ लेगी वरना इसी पर बखेड़ा होता है.
हां, वो तो है लेकिन अभी तो मेरे पास छत्तीसगढ़ की नहीं. और अपने यहां तो खुद ही तंगी है. आप ले जाइए. रहते-रहते सालभर में सीख ही लेगी.
नहीं. शहर में अकेली रहेगी. कौन सिखाएगा. आप हिंदी वाली दिलवाइये न!
....चलिए, मैं देखता हूं. आपको फोन करूंगा. नंबर दे जाइए.
कितनी जल्दी काम हो सकता है?
आज से ही लग जाता हूं. महीना खत्म होने से पहले लड़की आपके पास....
ये बताइए कि दूसरे स्टेट की लड़कियों को आप कैसे जानते हैं?
जाना-आना होता रहता है बहनजी. और आप तो तसल्ली रखिए. बिना लफड़े वाली दिलवाऊंगा...
सधी हुई बातें करते इन एजेंट्स की अलग डिक्शनरी है, जिसमें लड़कियां प्रोडक्ट हैं. उनकी अलग खामियां-खूबियां हैं. वे ‘लफड़े वाली’, ‘साफ’, ‘फ्रेश’ और ‘एक या दो हाथों से गुजरी हुई’ हो सकती हैं. इसी पर रेट बनेगा-बिगड़ेगा.
आमतौर पर बिचौलिए गरीब के साथ ऐसे घरों को निशाना बनाते हैं, जहां बच्ची के माता-पिता न हों ताकि कोई दिक्कत होने पर वो वापस न लौट सके, बल्कि दोबारा बिकने को राजी हो जाए.
ह्यूमन ट्रैफिकिंग के कानूनी पहलुओं को समझने के लिए हमने दिल्ली हाई कोर्ट के वकील मनीष भदौरिया की मदद ली.
वे कहते हैं- यहां सारी चीजें लड़की के बयान पर निर्भर करती हैं. अगर वो बालिग है और पुलिस और मजिस्ट्रेट के सामने कहे कि जो कुछ भी हो रहा है, उसमें उसका राजीनामा है तो कोई चाहकर भी मदद नहीं कर सकेगा. फिर भले ही लड़की 10 बार क्यों न बिक जाए, या कितना ही शोषण क्यों न हो. दूसरी तरफ अगर नाबालिग की खरीद-फरोख्त हो तो उसका कंसेंट मायने नहीं रखता. जैसे ही शिकायत पहुंचेगी, पुलिस और कानून एक्शन लेगा.
धाराएं लगाते हुए ये देखा जाएगा कि खरीदी किस मकसद के साथ हुई. क्या खरीदार उसे नौकरानी की तरह रखना चाहते थे, या क्या उसका यौन शोषण करना चाहते थे, या फिर ऑर्गन बेचना चाहते थे. इसी आधार पर तय किया जाता है कि कौन सी धाराएं लगे और क्या सजा हो.
फिलहाल भारतीय नागरिक संहिता में मानव तस्करी और नाबालिग के यौन शोषण पर काफी कड़ाई की जा रही है. दोषी को उम्र कैद से लेकर फांसी की सजा भी मिल सकती है. लेकिन बात वही है, लड़की अगर बालिग हो और ज्यादती रिपोर्ट न करे तो कोई कुछ नहीं कर सकता.
(गोपनीयता बनाए रखने के लिए कुछ नाम बदले गए हैं.)