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माफिया मुख्तार अंसारी की मौत का गाजीपुर और आसपास की राजनीति पर क्या असर होगा?

गाजीपुर और आसपास के इलाकों में 90 के दशक के बाद पहली बार कोई चुनाव होने जा रहा है जिसमें माफिया डॉन मुख्तार अंसारी का सीधा प्रभाव नहीं होगा, लेकिन कुछ न कुछ असर तो होगा ही - सवाल फिलहाल यही है कि कितना, कहां और क्या असर होगा?

मुख्तार अंसारी के न होने का उसके भाइयों की राजनीति पर असर होगा (फाइल फोटो) मुख्तार अंसारी के न होने का उसके भाइयों की राजनीति पर असर होगा (फाइल फोटो)
मृगांक शेखर
  • नई दिल्ली,
  • 29 मार्च 2024,
  • अपडेटेड 9:30 PM IST

मुख्तार अंसारी के खिलाफ हत्या के 8 केस तब दर्ज हुए थे जब वो जेल में बंद था, और अलग अलग जेलों में रहते हुए ही मुख्तार अंसारी ने अपने जीवन के आखिरी तीन चुनाव जीते थे - 2007, 2012 और 2017 का विधानसभा चुनाव. 

मुख्तार अंसारी को मऊ से लगातार 5 बार विधायक बनने का मौका मिला, जिसमें दो बार वो मायावती की बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा था. पहली बार भी मुख्तार को बीएसपी उम्मीदवार के रूप में ही कामयाबी मिली थी. 

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2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में मऊ सीट से अपनी जगह अपने बेटे अब्बास अंसारी को आगे किया, और तब सुहेलदेव समाज पार्टी के नेता ओम प्रकाश राजभर ने अपने कोटे से उसे टिकट दिया था. तब ओम प्रकाश राजभर का समाजवादी पार्टी से चुनावी गठबंधन हुआ करता था, लेकिन अखिलेश यादव अपनी तरफ से मुख्तार अंसारी से दूरी बनाने की कोशिश करते थे. 

जेल में रहते हुए मुख्तार अंसारी की मौत पर राजनीतिक दलों ने रिएक्ट तो किया है, लेकिन काफी संभल कर. किसी ने सीधे सीधे कोई सवाल नहीं उठाया है, बल्कि ज्यादातर नेता मुख्तार अंसारी के परिवार के आरोपों को ही आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं.

यूपी के विपक्षी दलों का ये संभल कर बोलना ही इस बात का संकेत है कि वे इसे चुनावों से जोड़ कर देख तो रहे हैं, लेकिन असर उलटा न पड़ जाये इस बात का उनको डर भी लग रहा है. अखिलेश यादव के मुकाबले मायावती इस मुद्दे पर ज्यादा सतर्क नजर आ रही हैं. 

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मुख्तार की मौत पर नेताओं का रिएक्शन

जेल में बंद मुख्तार अंसारी की मौत को लेकर बीएसपी नेता मायावती ने सोशल साइट X पर लिखा है, 'मुख्तार अंसारी की जेल में हुई मौत को लेकर, उनके परिवार द्वारा जो लगातार आशंकायें व गंभीर आरोप लगाए गए हैं... उनकी उच्च-स्तरीय जांच जरूरी है ताकि उनकी मौत के सही तथ्य सामने आ सकें... ऐसे में उनके परिवार का दुखी होना स्वाभाविक है... कुदरत उन्हें इस दुख को सहन करने की शक्ति दे.'

समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव ने जेल में मुख्तार अंसारी के मौत के लिए यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार को कठघरे में खड़ा किया है, और मौत की न्यायिक जांच की मांग के साथ X पर अपनी पोस्ट में लिखा है, हर हाल में और हर स्थान पर किसी के जीवन की रक्षा करना सरकार का सबसे पहला दायित्व और कर्तव्य होता है.

मुख्तार अंसारी ने जेल में उनको धीमा जहर दिये जाने का इल्जाम लगाया था. असदुद्दीन ओवैसी और तेजस्वी यादव जैसे नेताओं ने भी उसी इल्जाम का हवाला देते हुए यूपी की बीजेपी सरकार पर सवाल उठाया है. 

मुख्यमंत्री रहते 2009 के लोकसभा चुनावों की तैयारी कर रही मायावती ने मुख्तार अंसारी को 'गरीबों का मसीहा' तक बता डाला था, और बयान दिया कि मुख्तार अंसारी को झूठे आपराधिक मामलों में फंसाया गया है. 

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लेकिन करीब साल भर बाद ही मायावती अपने पुराने बयान से पलट गईं, और मुख्तार अंसारी के आपराधिक गतिविधियों को स्वीकार करते हुए बीएसपी से निकाल दिया. 2016 में मुख्तार अंसारी ने समाजवादी पार्टी में शामिल होने की कोशिश की, लेकिन अखिलेश यादव तैयार नहीं हुए.

2017 के विधानसभा चुनावों से पहले मायावती ने फिर से ये कहते हुए मुख्तार अंसारी को साथ ले लिया कि वो उनको सुधरने का मौका देना चाहती हैं. तब मायातवी दलित और मुस्लिम वोटों के बूत सत्ता में आने की कोशिश कर रही थीं. उसी वक्त मुख्तार अंसारी ने अपने भाई के साथ अपनी पार्टी कौमी एकता दल का बीएसपी में विलय कर दिया था. लेकिन 2022 आते आते मायावती ने नये सिरे से फैसला लिया कि वो किसी अपराधी को टिकट नहीं देंगी - और उस पैमाने पर मुख्तार अंसारी छंट गये.

लोकसभा चुनाव 2024 पर कोई असर होगा क्या?

अव्वल तो मुख्तार अंसारी का गाजीपुर के आस पास की कई सीटों पर प्रभाव महसूस किया जाता रहा है, लेकिन मऊ और मोहम्मदाबाद विधानसभा सीट के साथ साथ गाजीपुर लोकसभा सीट पर मुख्तार अंसारी और बीजेपी का सीधा आमना सामना हुआ है. 

बतौर बीएसपी उम्मीदवार मुख्तार अंसारी ने वाराणसी लोकसभा सीट पर बीजेपी प्रत्याशी मुरली मनोहर जोशी को खासी टक्कर दी थी, और हार जीत का फैसला 20 हजार से भी कम वोटों के अंतर से हुआ था - और तब इस चुनाव को लेकर कई किस्से चर्चित हुए थे. 

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और 2019 में तो मुख्तार अंसारी के भाई अफजाल अंसारी ने बीजेपी के मनोज सिन्हा को ही शिकस्त दे डाली थी. अफजाल अंसारी को इस बार अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों की पहली ही सूची में जगह दे दी थी. 

समाजवादी पार्टी का उम्मीदवार बनाये जाने के बाद अफजाल अंसारी का कहना था, मुझे सरकारी मशीनरी जरिए लूट लिया गया है... बाप-दादाओं की जमीन बेचकर चुनाव लड़ेंगे और जीतेंगे... यहां मोदी फैक्टर नहीं चलेगा... और गरीब जनता का साथ मिलेगा. 

गाजीपुर लोकसभा क्षेत्र के तहत आने वाली 5 विधानसभा सीटों में से 4 पर समाजवादी पार्टी का कब्जा है, और पास मऊ और मोहम्मदाबाद विधानसभा सीटों पर भी करीब करीब वही हाल है. असल में मऊ विधानसभा सीट घोसी लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है, जहां से मुख्तार का बेटा अब्बास अंसारी विधायक है. ऐसे ही बलिया लोकसभा क्षेत्र में आने वाली मोहम्मादबाद सीट पर पर भी समाजवादी पार्टी ही विधायक सुहैब अंसारी भी मुख्तार अंसारी का भतीजा है. 

बीते पांच साल राजनीतिक बदलाव ये हुआ है कि इस बार समाजवादी पार्टी और बीएसपी अलग अलग चुनाव लड़ रहे हैं, और SBSP नेता ओम प्रकाश राजभर बीजेपी के साथ एनडीए में आ गये हैं - खास बात ये भी है कि जिन सीटों पर मुख्तार अंसारी का प्रभाव माना जाता रहा है, उन इलाकों में ओम प्रकाश राजभर का अच्छा खासा वोट बैंक है, जिसका फायदा इस बार बीजेपी को मिल सकता है.  

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2017 में चुनाव प्रचार के दौरान मऊ की रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बाहुबली और कटप्पा का खासतौर पर जिक्र किया था. तब भी बीजेपी के साथ चुनाव लड़ रहे ओम प्रकाश राजभर की पार्टी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के उम्मीदवार महेंद्र राजभर अपना चुनाव निशान छड़ी लिये मंच पर मौजूद थे. 

महेंद्र राजभर की ओर देखते हुए मोदी ने कहा था, 'बाहुबली फिल्म आई थी... बाहुबली फिल्म में कटप्पा पात्र था... बाहुबली का सब कुछ तबाह कर दिया था उसने... इस छड़ी वाले में वह दम है... यह छड़ी नहीं, यह कानून का डंडा है... 11 मार्च को इसकी ताकत दिखाई देगी.'

असल में उस साल 11 मार्च को भी चुनाव नतीजे आने थे. चुनाव तो निश्चित दिन ही आये, लेकिन बाहुबली मुख्तार अंसारी ने कटप्पा महेंद्र राजभर को शिकस्त दे दी थी. इस बार मुख्तार अंसारी का चले जाना, और ओम प्रकाश राजभर एनडीए में लौट आना बीजेपी के लिए फायदेमंद हो सकता है, बशर्ते किसी तरह का ध्रुवीकरण न हुआ तो ही. 

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