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साइंस न्यूज़

दुनिया में पहली बार बंदरिया को इंजीनियर्ड भ्रूण से किया प्रेगनेंट, पता चलेगा कैसे होता है मिसकैरेज

aajtak.in
  • बीजिंग,
  • 07 अप्रैल 2023,
  • अपडेटेड 12:26 PM IST
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पहली बार किसी बंदरिया को इंजीनियर्ड एंब्रियो यानी कृत्रिम भ्रूण से गर्भवती कराया गया है. लैब में भ्रूण बनाने के लिए बंदर का ही स्टेम सेल लिया गया था. जिसे भ्रूण में विकसित करने के बाद, सरोगेट बंदरिया के गर्भाशय में डाला गया. अब बंदरिया और उसका भ्रूण दोनों ही स्वस्थ हैं. भ्रूण सही से विकसित हो रहा है. बंदरिया भी सेहतमंद है. (सभी फोटोः गेटी)

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इंसानों के लिए इस तरह की तकनीक पहले से विकसित हो चुकी है. लेकिन इस बार कठिनाई थी. वैज्ञानिकों के सामने 14 दिन की सीमा तय की गई थी. उन्हें भ्रूण को इतने ही दिन में विकसित करना था. इंसानों में स्टेम सेल से बनाए गए भ्रूण को गर्भाशय तक ले जाना फिलहाल संभव नहीं है. क्योंकि फिर लैब में विकसित भ्रूण के विकास की स्टडी को नहीं किया जा सकेगा. 

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इसका विकल्प खोजते-खोजते चीन के वैज्ञानिकों ने इंसानों के सबसे नजदीकी प्रजाति को चुना. ये हैं क्रैब ईंटिंग मकाउ. यानी केकड़ा खाने वाले बंदर. वैज्ञानिकों ने इन्हीं मकाऊ बंदरों का स्टेम सेल लिया. उसे सेल कल्चर में डाला. इस दौरान ग्रोथ फैक्टर्स का पूरा ध्यान रखा गया ताकि भ्रूण सही से विकसित हो. 

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जिन कोशिकाओं से भ्रूण बना, उसे ब्लास्टॉयड्स (Blastoids). ये खासतौर से शरीर में मौजूद प्राकृतिक ब्लास्टोसिट्स नाम की स्टेम सेल से निकाले जाते हैं. इंसानी स्टेम सेल से भ्रूण बनाने के बदले ब्लास्टॉयड्स से कृत्रिम भ्रूण बनाने की प्रक्रिया थोड़ी धीमी है. 

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खैर... इसके बाद उस सेल को लैब में कल्चर किया गया. तब तक कि वो तीन लेयर वाला भ्रूण न बन जाए. इसे गैस्ट्रूलेशन कहते हैं. यही वो वक्त होता है जब भ्रूण के अंदर शरीर के अलग-अलग अंगों का प्लान बनता है. इनमें से कुछ ब्लास्टॉयड्स योक सैक और एमनियन बनने लगे. यानी भ्रूण और उसके चारों तरफ लिक्विड वाला कवर. 

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माइक्रोस्कोप के नीचे देखने पर पता चला कि ब्लास्टॉयड्स ठीक उसी तरह से विकसित हो रहा है, जैसे इंसानों का होता है. ये स्थिति आते-आते 18 दिन हो चुके थे. भ्रूण खत्म कमजोर हो रहा था. खत्म होने की कगार पर था. तब वैज्ञानिकों ने इसे आठ बंदरियों के गर्भाशय में डाला गया. 

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हर एक सरोगेट बंदरिया को 8 से 10 ब्लास्टॉयड्स से गर्भवती बनाया गया. इसके बाद इन बंदरियों का अगले 20 दिन तक लगातार अल्ट्रासाउंड और हॉर्मोन टेस्टिंग किया गया. इंजीनियर्ड भ्रूण सफलतापूर्वक सरोगेट बंदरियों के गर्भाशय में पनपना शुरू हो चुका था. बंदरियों के शरीर में प्रोजेस्टेरोन और कोरियोनिक गोनाडैट्रोपिन जैसे हॉर्मोन्स बढ़े हुए थे. 

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यह स्टडी हाल ही में सेल स्टेम सेल जर्नल में प्रकाशित हुई है. इसे किया है चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेस के नॉन-ह्यूमन प्राइमेट फैसिलिटी के न्यूरोसाइंटिस्ट कियांग सुन ने. हालांकि 27वें दिन ये सारे भ्रूण बंदरियों के गर्भाशय से लापता हो गए. लेकिन कियांग सुन का कहना है कि छोटे समय के लिए ही सही बंदरिया गर्भवती हुई. हम इस प्रयोग को आगे भी करेंगे. 

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हालांकि कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि बतौर रिप्रोडक्टिव साइंटिस्ट हमें रिजल्ट की चिंता नहीं करनी चाहिए. हमें एक्सपेरिमेंट को करते रहना है. इससे यह पता चलेगा कि कैसे लोगों का गर्भ गिर जाता है. जैसे इन बंदरियों के साथ हुआ है. ये आगे चलकर इंसानों के लिए बेहतरीन स्टडी साबित होगी. 

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