लैटिन अमेरिका के पेरू (Peru) में पुरातत्वविदों को कुछ ऐसी कब्रें मिली हैं, जिनके अंदर इंसानी रीढ़ की हड्डियों को लकड़ियों में डालकर रखा गया था. जैसे किसी कबाब की सींक में कबाब लटके होते हैं. कुछ लकड़ियों के ऊपर हिस्से में सिर का कंकाल भी फंसाया गया था. ऐसी करीब 192 रीढ़ की हड्डियां मिली हैं, जिन्हें एक घाटी में बनी कब्रों से निकाला गया है. (फोटोः सी ओशी)
इस खोज के बारे में हाल ही में जर्नल एंटीक्विटी में रिपोर्ट प्रकाशित हुई है. जिसमें बताया गया है कि यह बेहज अजीबोगरीब प्रथा थी. न जाने क्यों इंसानी रीढ़ की हड्डी के छल्लों को इस तरह से निकाल कर लकड़ी में डालकर रखा जाता था. ये सारी रीढ़ की हड्डियां पेरू की राजधानी लीमा से 200 किलोमीटर दक्षिण में स्थित चिन्छा घाटी (Chincha Valley) में मिली हैं. (फोटोः जे. गोमेज मेजिया)
कहा जाता है कि इस घाटी पर जब यूरोपियन लोगों ने हमला किया था, तब यहां के लोग भूख और बीमारियों से मारे गए थे. यूरोपियन डकैतों और शासकों ने इन्हें जीभर कर लूटा था. यहां तक कि कब्रों में पड़े शवों के शरीर से जेवर-गहने और कीमती वस्तु निकाल ले जाते थे. लूट के समय वो शवों और उनके कंकालों को क्षत-विक्षत कर देते थे. (फोटोः गेटी)
इसलिए चिन्छा घाटी में बचे हुए लोगों ने अपने पूर्वजों की कब्रों में मौजूद क्षत-विक्षत शवों को ठीक करने के लिए उनकी हड्डियों को सही करते थे. इसलिए वो रीढ़ की हड्डियों को लकड़ी में डालकर उनके ऊपर सिर का कंकाल रखकर वापस से कब्र में दबा देते थे. आज वही कब्र जब फिर से खोदी गई तो इस अजीबो-गरीब प्रथा का पता चला. (फोटोः जैकब बॉन्गर्स)
पुरातत्वविदों के मुताबिक चिन्छा घाटी की आबादी 1533 में करीब 30 हजार के आसपास थी. लेकिन 500 साल में यहां की आबादी घटकर सिर्फ 979 ही बची. इनके लोग जब मरते थे तो उन्हें कीमती वस्तुओं के साथ दफनाया जाता था, जैसे सोना आदि. जो 192 रीढ़ की हड्डियां कब्रों से मिली हैं, वो 1450 से 1650 के बीच की है. यह वह समय था जब यूरोपीय लोगों ने इस इलाके पर हमला करके घरों और कब्रों को तहस-नहस कर दिया था. (फोटोः गेटी)
इस स्टडी में शामिल डॉ. जैकब बॉन्गर्स ने बताया कि लूटने की प्रथा तो पुरानी है. किसी भी जगह पर जब कोई घुसपैठ या हमला करता है, तो वह यह काम सबसे पहले करता है. यूरोपीय लुटेरों ने सोने और चांदी की वस्तुओं की चोरी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. उन्होंने कब्रों तक को खोद डाला. उनका मकसद था कि वो इस इलाके के स्थानीय लोगों को, उनकी परंपरा को पूरी तरह से खत्म कर दें. (फोटोः गेटी)
शवों को फिर से ठीक करने के लिए स्थानीय लोगों ने रीढ़ की हड्डियों के छल्लों को लकड़ियों में डालकर उन्हें कब्रों में वापस रख दिया. ताकि उनके पूर्वजों को शांति मिले. लेकिन उन्हें कंकाल के बारे में उस समय ज्यादा पता नहीं था, इसलिए किसी में रीढ़ की हड्डियां सीधी हैं, तो किसी में उल्टी लगी हैं. कुछ बेतरतीब तरीके से लगाई गई थीं. स्थानीय लोग शवों और उनके अवशेषों को सही से रखना चाहते थे. (फोटोः जैकब बॉन्गर्स)
डॉ. जैकब ने बताया कि उदाहरण के लिए इनकान बच्चों की बलि के समय यह ध्यान दिया जाता था, उनके शरीर से खून न निकले. इसलिए उन्हें गला घोंट कर मारा जाता था. या फिर जीवित ही दफना दिया जाता था. मकसद यह था कि कुछ भी पूरा नहीं होता अगर सूर्य को सही से बलि यानी कुछ ऑफर नहीं दिया जाता है. ऐसी ही हालत अटाकामा रेगिस्तान में रहने वाले चिन्छोरो समुदाय के लोगों की थी. वो अपने शवों को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें ममी बना देते थे. (फोटोः गेटी)
चिन्छोरो समुदाय के लोग भी शवों की हड्डियों के साथ लकड़ी बांध देते थे, या फिर रीढ़ की हड्डियों के छल्लों में लकड़ी फंसा देते थे. जो अवशेष मिले हैं, उनसे यह पता लगता है कि इसकी शुरुआत चिन्छा घाटी में ही हुई थी. वो खराब शव को ठीक रखने के लिए बैक बोन के छल्लों में लकड़ी डालकर उन्हें सीधा करके कब्र में वापस दफना देते थे. यह दक्षिण अमेरिका में प्राचीन समय के अंतिम संस्कार का तरीका था. (फोटोः गेटी)