3 फरवरी 2022 को अमेरिकी उद्योगपति एलन मस्क (Elon Musk) की स्पेस कंपनी SpaceX ने फ्लोरिडा स्थित केनेडी स्पेस सेंटर से फॉल्कन-9 (Falcon-9) रॉकेट में 49 स्टारलिंक इंटरनेट सैटेलाइट (Starlink Internet Satellite) अंतरिक्ष में लॉन्च किए. दुर्भाग्य देखिए कि 24 घंटे के अंदर ही यानी 4 फरवरी 2022 को सूरज से आए जियोमैग्नेटिक तूफान (Geomagnetic Storm) ने 49 में से 40 स्टारलिंक को स्पेस में ही मौत की नींद सुला दिया. (फोटोः स्पेसएक्स)
SpaceX ने एक बयान में कहा कि हमारे 40 स्टारलिंक सैटेलाइट्स पर जियोमैग्नेटिक तूफान का हमला हुआ है. जिसमें वह खराब हो गए. प्राथमिक जांच में पता चला है कि इससे पहले कि वह सुरक्षित ऑर्बिट में पहुंचते या पहुंचाया जाता, सौर तूफान (Solar Storm) ने उन्हें नष्ट कर दिया. इसके बाद वह धरती के वायुमंडल में जलते हुए दिखाई दिए. सौर तूफान ने इन सैटेलाइट्स पर हमला तब किया जब वो धरती से ऊपर 210 किलोमीटर की कक्षा में चक्कर लगा रहे थे. (फोटोः Eddie Irizarry/ Sociedad de Astronomia del Caribe)
स्टारलिंक इंटरनेट सैटेलाइट (Starlink Internet Satellite) की कक्षा को जानबूझकर काफी नीचे रखा गया है. ताकि लॉन्च के बाद अगर कोई हादसा हो तो ये सैटेलाइट धरती की ओर गिरते-गिरते खत्म हो जाएं. ऐसा नहीं है कि स्टारलिंक सैटेलाइट्स को सौर तूफान से बचने के लिए प्रोग्राम नहीं किया गया है. इन्हें एज-ऑन (Edge-on) पोजिशन में रहने के लिए सेट किया गया है. ताकि सौर तूफान का असर कम हो. लेकिन जब सौर तूफान आया तब इन्हें अपनी यह पोजिशन लेने का समय नहीं मिला. (फोटोः स्पेसएक्स)
SpaceX ने कहा कि 40 स्टारलिंक सैटेलाइट धरती पर आते समय वायुमंडल में ही जलकर खत्म हो गए. न ही अंतरिक्ष में कोई कचरा पैदा हुआ. न ही किसी सैटेलाइट ने धरती को हिट किया. साल 2019 से स्पेसएक्स से अब तक 2000 से ज्यादा स्टारलिंक सैटेलाइट्स अंतरिक्ष में तैनात कर चुकी है. उसका प्लान है कि वह 42 हजार सैटेलाइट्स को धरती की कक्षा में तैनात करे. ताकि दुनियाभर के लोगों को अंतरिक्ष से इंटरनेट की सेवा मिल सके. (फोटोः स्पेसएक्स)
सौर तूफान की वजह से धरती के ऊपर जियोमैग्नेटिक तूफान (Geomagnetic Storm) आता है. जब सूरज से आने वाले चार्ज्ड पार्टिकल्स धरती की चुंबकीय क्षेत्र से टकराते हैं, तब जियोमैग्नेटिक तूफान आता है. इसकी वजह से धरती के चुंबकीय क्षेत्र में कुछ देर के लिए बाधा उत्पन्न होती है. जिससे लैटीट्यूट और लॉन्गीट्यूड समझने में दिक्कत होती है. इससे जीपीएस काम करना बंद कर देता है. (फोटोःगेटी)
इससे पहले भी सौर तूफान आए हैं. सबसे बड़ा डर ये है कि हमारे पास सौर तूफान और उससे पड़ने वाले असर को लेकर डेटा बहुत कम है. इसलिए हम ये अंदाजा नहीं लगा सकते कि नुकसान कितना बड़ा होगा. दुनिया में सबसे भयावह सौर तूफान 1859, 1921 और 1989 में आए थे. इनकी वजह से कई देशों में बिजली सप्लाई बाधित हुई थी. ग्रिड्स फेल हो गए थे. कई राज्य घंटों तक अंधेरे में थे. (फोटोः गेटी)
1859 में इलेक्ट्रिकल ग्रिड्स नहीं थे, इसलिए उनपर असर नहीं हुआ लेकिन कम्पास का नीडल लगातार कई घंटों तक घूमता रहा था. जिसकी वजह से समुद्री यातायात बाधित हो गई थी. उत्तरी ध्रुव पर दिखने वाली नॉर्दन लाइट्स यानी अरोरा बोरियेलिस (Aurora Borealis) को इक्वेटर लाइन पर मौजूद कोलंबिया के आसमान में बनते देखा गया था. नॉर्दन लाइट्स हमेशा ध्रुवों पर ही बनता है. (फोटोः गेटी)
1989 में आए सौर तूफान की वजह से उत्तर-पूर्व कनाडा के क्यूबेक में स्थित हाइड्रो पावर ग्रिड फेल हो गया था. आधे देश में 9 घंटे तक अंधेरा कायम था. कहीं बिजली नहीं थी. पिछले दो दशकों से सौर तूफान नहीं आया है. सूरज की गतिविधि काफी कमजोर है. इसका मतलब ये नहीं है कि सौर तूफान आ नहीं सकता. ऐसा लगता है कि सूरज की शांति किसी बड़े सौर तूफान से पहले का सन्नाटा है. (फोटोः SpaceX)
फिलहाल हमारे पास या दुनिया के किसी भी वैज्ञानिक के पास सौर तूफान को मापने या उससे होने वाले असर की भविष्यवाणी करने वाली कोई प्रणाली या मॉडल नहीं है. हमें नहीं पता कि कोई भयावह सौर तूफान आता है तो इसका हमारे पावर ग्रिड्स, इंटनरेट प्रणाली, नेविगेशन और सैटेलाइट्स पर क्या और कितना असर पड़ेगा. अगर एक बार फिर इंटरनेट प्रणाली बंद हुई तो उसे रीस्टार्ट करने या रीरूट करने में अरबों रुपयों का नुकसान हो जाएगा. (फोटोः गेटी)