इंसान का शरीर सबसे बेहतर कहां काम करता है, जवाब है- समुद्र तल पर. यहां उसके फेफड़ों और दिमाग के लिए सही मात्रा में ऑक्सीजन मिलता है. लेकिन जितना वह ऊपर जाता है, उसके लिए कठिनाई बढ़ती चली जाती है. पर दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ माउंट एवरेस्ट (Mount Everest) के डेथ जोन पर इंसान के शरीर के साथ कितना बुरा होता है? (फोटोः गेटी)
माउंट एवरेस्ट समुद्र तल से 29,029 फीट यानी 8.8 किलोमीटर से ज्यादा ऊंचा है. यानी इतनी ऊंचाई जहां जाने पर आपके शरीर के धागे खुल जाते हैं. नसें सिकुड़ने लगती हैं. सांसें थमने लगती हैं. दिखना बंद हो जाता है. दिमाग सही से काम नहीं करता. इस जगह को डेथ जोन (Death Zone) कहते हैं. (फोटोः पेक्सेल/नंदा राम घरती)
डेथ जोन की शुरुआत 8000 मीटर से शुरू होती है. यानी यहां से ऊपर आपको इतना कम ऑक्सीजन मिलता है कि शरीर मरना शुरू कर देता है. हर मिनट खत्म होता है. शरीर की हर कोशिका मर रही होती है. यहां से आपके दिमाग और फेफड़ों को पता चलता है कि ऑक्सीजन कितना जरूरी है. (फोटोः गेटी)
अगले 800 मीटर की चढ़ाई चढ़ते-चढ़ते लोगों की फैसला लेने की शक्ति खत्म हो जाती है. दिल का दौरा और ब्रेन स्ट्रोक आने की आशंका कई गुना बढ़ जाती है. माउंट एवरेस्ट पर चढ़ चुके शॉना बर्के ने बताया कि असल में शरीर मरने लगता है. एवरेस्ट पर चढ़ना यानी समय के खिलाफ शरीर की जंग. (फोटोः AFP)
साल 2019 में एवरेस्ट पर चढ़ते समय 19 लोगों की मौत हुई थी. इनमें से 11 मौतें डेथ जोन में हुई थीं. क्योंकि इन्होंने वहीं पर सबसे ज्यादा समय बिताया. कुछ लोगों ने इसे ज्यादा भीड़ की वजह से होने वाला हादसा बताया. लेकिन ये वजह कुछ लोग नहीं मानते क्योंकि मौसम सही था. फिर भी मौतें डेथ जोन में हुईं. खराब होता तो क्या ही होता. (फोटोः गेटी)
असल में 22 मई 2019 को एवरेस्ट फतह करने के लिए एकसाथ 250 पर्वतारोही चढ़ गए थे. पीक पर जाकर उतरने के लिए लंबी लाइन लग गई. ये लाइन डेथ जोन में थी. लोगों को लंबा समय डेथ जोन में इंतजार करना पड़ा. 19 में से 11 मौतें इसी डेथ जोन में हुई थीं, क्योंकि ये काफी ज्यादा देर डेथ जोन में रुक गए थे. (फोटोः गेटी)
असल में जब समुद्र तल पर होते हैं, तो हवा में 21 फीसदी ऑक्सीजन होता है. लेकिन जब आप 12 हजार फीट के ऊपर जाते हैं, तब आपको हर सांस में 40 फीसदी कम ऑक्सीजन मिलता है. डेथ जोन में पर्वतारोही सिर्फ और सिर्फ एक चौथाई ऑक्सीजन पर जिंदा रहता है. इस बात के साइंटिफिक प्रमाण भी हैं. (फोटोः AFP)
8.8 किलोमीटर ऊंचाई पर ऐसे लगता है जैसे आप ट्रेडमिल पर दौड़ रहे हों और सांस लेने के लिए आपको एक स्ट्रॉ दी गई हो. जब आपके शरीर में जरूरी मात्रा से सिर्फ एक चौथाई ऑक्सीजन ही बचेगा तो आपको काफी ज्यादा दिक्कत होगी. यानी आपका दिल हर मिनट 140 बार धड़कता है. यानी दिल का दौरा कभी भी पड़ सकता है. (फोटोः AFP)
एवरेस्ट पर चढ़ाई शुरू करने से पहले पर्वतारोहियों को अपने शरीर को एक्लेमेटाइज करना होता है. वो कई दिनों तक थोड़ी-थोड़ी ऊंचाई बढ़ाते हुए आगे बढ़ते हैं. ताकि फेफड़ों और दिमाग को उस ऊंचाई पर मिलने वाली ऑक्सीजन की आदत पड़े. पीक पर जाने से पहले बेस कैंप से तीन ट्रिप ऊपर की ओर लगाते हैं. फिर बेस कैंप में लौटते हैं. (फोटोः AFP)
इतनी ऊंचाई पर पहुंचने के बाद शरीर में ज्यादा मात्रा में हीमोग्लोबिन बनने लगता है. ताकि ज्यादा से ज्यादा ऑक्सीजन की सप्लाई हो सके. पर ज्यादा हीमोग्लोबिन का बनना यानी खून का गाढ़ा होना. इससे दिल सारे शरीर में खून की सप्लाई ढंग से नहीं कर पाता. इसकी वजह से आपको स्ट्रोक आ सकता है. या फेफड़ों में पानी जमा हो सकता है. (फोटोः गेटी)
एवरेस्ट पर आमतौर पर पर्वतारोहियों को एक दिक्कत होती है. इसे हेप (HAPE) कहते हैं. यानी हाई एल्टीट्यूड पल्मोनरी एडिमा कहते हैं. इसमें आपके फेफड़ों में पानी भर जाता है. जिसकी जांच आप सामान्य स्टेथोस्कोप से कर सकते हैं. जब आप सीने पर आला लगाते हैं... अंदर से पानी के उबलने जैसी आवाज आती है. (फोटोः गेटी)
हेप में आपके शरीर में सांस की कमी होती है. आप लंबी-लंबी सांस लेते हैं. ऐसी ही एक दिक्कत होती है हेस (HACE). इसे हाई एल्टीट्यूड सेरेब्रल एडीमा कहते हैं. इसमें ऑक्सीजन की कमी से दिमाग सूजने लगता है. जिसकी वजह से बेचैनी, उलटी आना, सोचने में दिक्कत और फैसला लेने में दिक्कत होती है. (फोटोः गेटी)
सामान्य भाषा में हेस को इसे हाइपोक्सिया (Hypoxia) कहते हैं. पर्वतारोहियों को दिखना बंद हो जाता है. वो विचित्र व्यवहार करने लगते हैं. कपड़े फाड़ने लगते हैं. हवा में बातें करने लगते हैं. कई लोगों को तो लगातार खांसी आती है. ऐसे में हर सेकेंड आपके शरीर को बहुत ज्यादा ऑक्सीजन की जरुरत होती है. जो कि खतरनाक होता है. (फोटोः अन्स्प्लैश)
हेप और हेस मिलकर भूख कम कर सकते हैं. स्नो ब्लाइंडनेस हो सकती है. यानी दूर-दूर तक आपको सिर्फ बर्फ ही बर्फ दिखाई देगी. अस्थाई तौर पर दिखना बंद भी हो सकता है. आंखों के अंदर ही खून की नलियां फट सकती हैं. पारा इतना कम होता है कि त्वचा तुरंत जम सकती है. उंगलियां कट सकती हैं. बस यहीं से लोग गिरने लगते हैं. मर जाते हैं. (फोटोः अन्स्प्लैश)
आमतौर पर पर्वतारोही रात को दस बजे एवरेस्ट की चढ़ाई शुरू करते हैं. कैंप चार छोड़ देते हैं. ये 26 हजार फीट की ऊंचाई पर होता है. ज्यादातर हिस्सा चढ़ाई का रात में ही पूरा हो जाता है. सात घंटे के बाद ये एवरेस्ट के पीक पर होते हैं. थोड़ा रुक कर फोटो-सोटो करके वापस 12 घंटे में आते हैं. यह काम अंधेरा होने से पहले करना होता है. (फोटोः अन्स्प्लैश)