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मुर्दा मकड़ियों को रोबोट में बदल रहे हैं वैज्ञानिक, क्या मरी हुई चीजें अब लैब्स में चलती-फिरती नजर आने लगेंगी?

मरी हुई मकड़ी अचानक रोबोट की तरह काम करने लगे, सुनने में भले ये किसी साइंस फिक्शन मूवी का हिस्सा लगे, लेकिन वैज्ञानिकों ने इसे सच साबित कर दिया है. साइंस लैब्स में अब मरी हुई मकड़ियां नाजुक सामान उठाती नजर आ जाएंगी, जिन्हें दूसरे टूल्स की मदद से उठाना आसान नहीं. साइंस की भाषा में ये नेक्रोटिक्स है, यानी मृत शरीर से रोबोटिक चीजें बनाना.

मकड़ियों के शरीर में हाइ़ड्रोलिक प्रेशर सिस्टम होता है, जो उनके पैरों को कंट्रोल करता है. सांकेतिक फोटो (Unsplash) मकड़ियों के शरीर में हाइ़ड्रोलिक प्रेशर सिस्टम होता है, जो उनके पैरों को कंट्रोल करता है. सांकेतिक फोटो (Unsplash)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 20 जनवरी 2023,
  • अपडेटेड 2:25 PM IST

मरी हुई मकड़ी से रोबोटिक उपकरण बनाने का खयाल यूं ही नहीं आया, बल्कि इसकी कई वजहें थीं. जैसे ये बायोडिग्रेडेबल होती है, मतलब पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बगैर मिट्टी में मिल जाती है. दूसरा, एक ग्रिपर की तरह मकड़ियां बेहतरीन काम कर पाती हैं. एक मरी हुई मकड़ी भी अपने वजह से लगभग 130 गुना भार उठा लेती है. ये रोबोटिक आर्म की तरह काम कर सकती है. लेकिन इतने सारे फायदे एक्सपर्ट्स ने एकाएक नहीं सोचे, बल्कि संयोग से इसकी शुरुआत हुई. 

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साल 2019 में अमेरिका की राइस यूनिवर्सिटी की लैब में वैज्ञानिकों की नजर एक मकड़ी पर पड़ी. उन्होंने गौर किया तो पाया कि सभी मकड़ियां मरने के बाद एक ही पोजिशन में दिखती हैं.अकड़कर उनके पैर सटे दिखते हैं. ऐसा क्यों हैं. 

शोध में पता लगा कि मकड़ियों के शरीर में हाइ़ड्रोलिक प्रेशर सिस्टम होता है, जो उनके अंगों को कंट्रोल करता है. इसमें उनके शरीर से एक तरह का द्रव्य निकलता है जो पैरों को बाहर फैलाता है. साथ ही इंसानों या ज्यादातर जीव-जंतुओं से अलग उनमें फ्लेक्जोर मसल्स होती हैं. ये वो मांसपेशियां हैं, जो दो हड्डियों को एक तरह से जोड़े रखती हैं. आसान भाषा में ऐसे भी समझ सकते हैं कि जैसे हमारी घुटने या कुहनी के चारों ओर फ्लेजोर मसल्स हैं, जिससे वे आसानी से मुड़ सकें. 

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स्पाइडर इन्हीं मसल्स की मदद से अपने पैरों को भीतर की तरफ सिकोड़ता है और बाहर की तरफ फैलने में हाइड्रोलिक प्रेशर मदद करता है. जब मकड़ी मरती है तो उनमें हाइड्रोलिक प्रेशर खत्म हो जाता है, मतलब वो द्रव्य नहीं निकल पाता, जिससे प्रेशर बने और पैर बाहर फैल सकें. इससे पैर भीतर की तरफ ही सिकुड़े रह जाते हैं. 

वैज्ञानिकों को ये सिस्टम काफी काम का लगा. स्पाइडर को अगर वे अपनी लैब में इस्तमाल कर सकें तो कई ऐसी चीजें उठाई जा सकेंगी, बाकी टूल्स से जिनमें टूट-फूट का खतरा रहता है. लेकिन मरे हुए मकड़े से काम कैसे लिया जाए! अब उन्होंने उसके हाइड्रोलिक चैंबर में एक सुई डालकर उसमें हवा भरी, जिससे पैर बाहर की तरफ खुलने लगे. 

मामूली लगने वाले इस प्रयोग का नतीजा शानदार था. पाया गया कि मरी हुई मकड़ी भी अपने वजन से 130 गुना भार उठा सकती है और ऐसा हजार बार से भी ज्यादा की साइकिल में हो सकता है. हालांकि बिना कोटिंग के मकड़ी के साथ इस प्रयोग के बाद वे ज्यादा नहीं टिक सकीं. तब वैज्ञानिकों ने मकड़ी पर मोम की परत चढ़ा दी और दिखा कि इससे वे ज्यादा समय तक टिक रही हैं. 

मकड़ी के डेलिकेट पैर लैब में कई काम कर सकते थे, जैसे माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स को असेंबल करना या फिर स्पेसिमेन जमा करना. इन कामों के लिए आमतौर पर छोटे-छोटे टूल्स बनाए जाते हैं, जो जल्द ही किसी काम के नहीं रहते. ये कबाड़ हो जाता है, जो ग्लोबल वार्मिंग बढ़ा रहा है. वहीं डेड स्पाइडर का रोबोट की तरह इस्तेमाल करने पर ये डर नहीं रहता. वो बायोडिग्रेडेबल है जो मिट्टी में मिलकर खत्म हो जाता है. 

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राइस यूनिवर्सिटी की इस रिसर्च को नेक्रोबोटिक्स कहा गया. एडवांस्ड साइंस में नेक्रोबोटिक्स- बायोटिक मटेरियल्स एज रेडी टू यूज एक्युएटर्स नाम से रिपोर्ट छपने के बाद से उम्मीद की जा रही है कि आगे चलकर लैब में नेक्रोबोटिक्स का चलन बढ़ सकेगा.

नेक्रोबोटिक्स का एक बड़ा फायदा ये भी बताया जा रहा है कि ये रोबोट की तरह लगातार काम भी कर सकते हैं और इसके लिए उन्हें पावर-ऑन या प्लग-इन करने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी. खासकर स्पाइडर के मामले को देखें तो ये ग्रिपर की तरह काम करते हैं, जो कि फिलहाल रोबोट कर रहे हैं. इसमें माइक्रोडिजाइनिंग की जरूरत भी होती है, जबकि स्पाइडर्स कुदरती तौर पर ग्रिपर का काम कर पाते हैं. 

इससे पहले भी इन्सेक्ट-रोबोटिक प्रोजेक्ट हो चुके हैं, लेकिन वो ज्यादा कामयाब नहीं रहे. जैसे कॉक्रोच के ब्रेन में इलेक्ट्रोड्स लगाकर उनसे काम करवाना. ये जिंदा कॉक्रोच के साथ किया जा रहा था, जिसपर खुद वैज्ञानिकों की एक बिरादरी ने एतराज उठाया. अब नेक्रोबोटिक्स के साथ ये खतरा नहीं. 

 

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