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वित्त मंत्रालय ने किया जमकर काम मगर चुनौतियां भी बरकरार

अर्थव्यवस्था में दूरगामी ढांचागत सुधारों में वित्त मंत्रालय ने निभाई अहम भूमिका, पर अमल में खामियां और रुकावटें बरकरार. तेल की कीमतों में उछाल सरकार के लिए बड़ी चुनौती

चंद्रदीप कुमार चंद्रदीप कुमार
श्वेता पुंज/संध्या द्विवेदी/मंजीत ठाकुर
  • नई दिल्ली,
  • 04 जून 2018,
  • अपडेटेड 3:02 PM IST

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भाजपा में अगुवाई की अगली पांत तैयार करने में अहम भूमिका अदा की है.

अगर चार साल पहले नॉर्थ ब्लॉक में वित्त मंत्री से मुलाकात के लिए इंतजार कर रहे रिलायंस समूह के चेयरमैन अनिल अंबानी से टकरा जाना आम बात थी, तो अब वित्त मंत्रालय के गलियारों में किसी ताकतवर उद्योगपति को देख पाना दुर्लभ हो गया है—यह हिंदुस्तान में कारोबार करने के नियमों में एक किस्म का बड़ा भारी बदलाव है.

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रिश्तों पर टिकी सौदेबाजी से हटकर नियम-कायदों पर आधारित व्यवस्था के इस बदलाव की अगली पांत में केंद्रीय वित्त मंत्रालय है जिसकी अगुआई अरुण जेटली कर रहे हैं.

पहली बार वित्त मंत्री बने अरुण जेटली ने माल और सेवा कर (जीएसटी) सरीखे अहम सुधारों पर आम राय बनाने के लिए अपने सियासी रिश्तों और मेलजोल का बड़ी चतुराई से इस्तेमाल किया. वैसे उनके तौर-तरीके पुरानी लीक पर ही हैं और मोटे तौर पर उन्होंने सुरक्षित खेल ही खेला है.

चार साल पहले अर्थव्यवस्था कमजोर रुपए, छीजते विदेशी मुद्रा भंडार, राजकोषीय और चालू खाते के ऊंचे घाटे और दहाई में महंगाई से जद्दोजहद कर रही थी.

2018  में वृहत अर्थव्यवस्था के संकेतकों में खासा सुधार आया है—क्रिसिल के एक विश्लेषण के मुताबिक, खुदरा कीमतों की महंगाई 2015-2018 में औसतन 4.7 फीसदी रही है, जबकि इससे पहले के पांच साल में यह औसतन 10.2 फीसदी रही थी; चालू खाते का घाटा बीते चार साल में घटकर आधा रह गया है और विदेशी मुद्रा भंडार में अच्छा-खासा इजाफा हुआ है. रुपए का अवमूल्यन पहले के पांच साल के 5.5 फीसदी के मुकाबले घटकर 1.7 फीसदी पर आ गया है.

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जीएसटी और दिवालिया तथा शोधन अक्षमता संहिता (आइबीसी) जैसे सुधार कारोबार करने के उसूलों में आमूलचूल बदलाव लाने का भरोसा बंधा रहे हैं. आइबीसी ने असरदार ढंग से बता दिया है कि कर्ज लेकर उसे न चुकाने का बेलगाम और बेशर्म तरीका अब और काम नहीं आएगा.

सरकार ने कर अनुपालन को बढ़ाने और नोटबंदी के साथ आमदनी की घोषणा योजना के जरिए और ज्यादा लोगों को औपचारिक अर्थव्यवस्था के दायरे में लाने की एकजुट कोशिशें की हैं.

प्रत्यक्ष करों की वसूली में तेज बढ़ोतरी हुई है, बावजूद इसके कि जीडीपी की ग्रोथ पिछले दो वित्तीय साल में धीमी पड़ी है. शुरुआती गड़बडिय़ों के बावजूद हिंदुस्तान के अप्रत्यक्ष कर आधार में जीएसटी के लागू होने के बाद 50 फीसदी से ज्यादा का इजाफा हुआ है.

कर और जीडीपी का अनुपात 2014 के वित्तीय साल के 5.7 फीसदी से बढ़कर 2018 के वित्तीय साल में 6 फीसदी पर पहुंच गया. प्रत्यक्ष कर संग्रह वित्तीय साल 2016 के 0.6 फीसदी से बढ़कर 2018 के वित्तीय साल में 1.9 फीसदी पर पहुंच गया.

हालांकि नोटबंदी के अंतिम नतीजों पर अभी फैसला होना बाकी है और कुछ अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि इससे जीडीपी की ग्रोथ में 1-2 फीसदी की सेंध लग सकती है, पर इसका असर प्रत्यक्ष कर (खासकर आयकर) के बढ़े हुए अनुपालन में साफ दिखाई देता है.

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अलबत्ता इस बात पर आम राय है कि नौकरियां 7.4 फीसदी की वृद्धि दर के साथ कदमताल करते हुए नहीं बढ़ी हैं और कारोबार करने में आसानी की फेहरिस्त में हिंदुस्तान की ऊंची छलांग के बाद भी निजी निवेश परवान नहीं चढ़ सके हैं.

सामान्य मॉनसून और बंपर फसल के बावजूद 2018 में ग्रामीण अर्थव्यवस्था मुश्किलों से घिरी रही. कृषि की असल जीडीपी ग्रोथ वित्तीय साल 2010-14 के 4.3 फीसदी से तकरीबन आधी घटकर 2015-18 के वित्तीय साल में 2.4 फीसदी पर आ गई. बड़ी तादाद में नौकरियां देने वाले निर्माण क्षेत्र को नोटबंदी और जीएसटी की मार सहनी पड़ी है.

मगर जेटली को अपने सबसे भीषण तूफान का सामना तेल की बढ़ती कीमतों की शक्ल में करना पड़ेगा. इससे चालू खाते के घाटे पर सीधा असर पड़ेगा और यह महंगाई की आग में घी का काम कर सकती है.

पेट्रोल-डीजल के दाम ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंच रहे हैं और ऐसे में खुदरा तेल पर केंद्र और राज्य सरकारों के शुल्कों को कम करने की मांग तेज हो रही है.

यही नहीं, अगर जीएसटी की खामियों को दुरुस्त नहीं किया गया तो ग्रोथ पर असर पड़ेगा और सामान्य से कम मॉनसून ग्रामीण अर्थव्यवस्था की परेशानियां बढ़ा देगा.

यह अगले साल चुनावों में उतरने जा रही नरेंद्र मोदी की सरकार के रास्ते का सबसे बड़ा कांटा साबित हो सकता है.

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