
बिहार विधानसभा चुनाव में 2015 जैसा राजनीतिक हश्र न हो इसके लिए असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने खास रणनीति बनाई है. बिहार की सियासी जंग फतह करने के लिए विधानसभा सीटों को चिन्हित कर लिया गया है. एआईएमआईएम ने बिहार में A-प्लस, A और B ग्रेड में विधानसभा सीटों को बांटा है. बिहार के सीमांचल और मिथलांचल इलाके की मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर जीत की उम्मीद ओवैसी लगाए हुए हैं, लेकिन क्या सियासी गुल खिलाते हैं यह तो वक्त ही बताएगा?
हर जिले में लड़ेगी AIMIM चुनाव
बिहार में एआईएमआईएम युवा प्रदेश अध्यक्ष मोहम्मद आदिल ने aajtak.in को बताया कि बिहार के सभी जिलों में हमारा संगठन है और प्रदेश के हर जिले में मजलिश का उम्मीदवार चुनाव लड़ेगा. इसके लिए हमने विधानसभा सीटों को चिन्हित कर लिया है. हमारा मुख्य फोकस दलित, मुस्लिम और अति पिछड़ा बाहुल्य सीटों पर हैं, लेकिन इस बार चुनावी मैदान में सभी समाज के लोगों को प्रत्याशी बनाकर उतारेंगे. इसमें दलित से लेकर ब्राह्मण, राजपूत और भूमिहार समुदाय के भी उम्मीदवार एआईएमआईएम के निशान पर चुनाव लड़ते दिखेंगे.
विधानसभा सीटों की ग्रेडिंग
बिहार की विधानसभा सीटों को एआईएमआईएम ने A-प्लस, A और B ग्रेड में बांट कर चुनावी रणनीति बनाई है. मोहम्मद आदिल ने बताया है कि बिहार में मुस्लिम मतदाता जिन सीटों पर 32 फीसदी से ज्यादा हैं, उसे A-प्लस में रखा गया है. ए-प्लस के तहत 20 सीटें चिन्हित की गई हैं, जिनमें सीमांचल की 16 सीटें शामिल हैं. इसके अलावा दरभंगा की दो सीटें, मधुबनी की एक सीट और चंपारण की एक सीट शामिल है.
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20 से 30 फीसदी के बीच जिन सीटों पर मुस्लिम मतदाता हैं, उसे A-ग्रेड में रखा गया है. A-ग्रेड के तहत 14 सीटें शामिल हैं, जहां पर एआईएमआईएम द्वारा दलित और गैरमुस्लिम प्रत्याशी को मैदान में उतारने की रणनीति बनाई गई है. इनमें काफी सुरक्षित सीटें हैं, लेकिन निर्णायक वोट मुस्लिम मतदाता हैं. ऐसे ही B-ग्रेड के तहत 16 सीटें चिन्हित की गई हैं, जहां मुस्लिम आबादी 15 से 20 फीसदी के बीच और दूसरे समुदाय का अच्छा खासा वोट है. ऐसे में बैलेंस बनाए रखने के लिए यहां से जिस समुदाय का सबसे ज्यादा वोट होगा उसे प्रत्याशी बनाकर उतारा जाएगा.
बिहार की मुस्लिम बाहुल्य सीटें
बिहार में 243 विधानसभा सीटों में से 47 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम वोटर निर्णायक स्थिति में हैं. इन इलाकों में मुस्लिम आबादी 20 से 40 प्रतिशत या इससे भी अधिक है. बिहार की 11 सीटें हैं जहां 40 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम मतदाता है और 7 सीटों पर 30 फीसदी से ज्यादा हैं. इसके अलावा 29 विधानसभा सीटों पर 20 से 30 फीसदी के बीच मुस्लिम मतदाता हैं. मौजूदा समय में बिहार में 24 मुस्लिम विधायक हैं.
कैंडिडेट चयन के लिए सर्वे करेगी एजेंसी
एआईएमआईएम बिहार विधानसभा चुनाव में प्रोफेशनल सर्वे एजेंसी की मदद लेने जा रही है. इसके लिए आंध्र प्रदेश की एक सर्वे एजेंसी को ओवैसी ने हायर किया है. एजेंसियां बिहार में सर्वे का काम इसी सप्ताह से शुरू कर देंगी. इस सर्वे एजेंसी का काम विधानसभावार जातीय समीकरण, स्थानीय मुद्दे और जीतने वाले उम्मीदवार के नाम तलाशने का होगा. एजेंसियों से मिलने वाली रिपोर्ट के आधार पर एआईएमआईएम सीटों के लिए स्थानीय घोषणा पत्र और जिताऊ उम्मीदवार के नाम पर मुहर लगाएगी.
सीमांचल पर फोकस
ओवीसी की नजर बिहार के सीमांचल इलाके की विधानसभा सीटों पर हैं. सीमांचल में 24 सीटें आती हैं, जिनमें कम से कम 18 सीटों पर एआईएमआईए ने चुनाव लड़ने की रणनीति बनाई है. इनमें से कई सीटों पर मुसलमानों की आबादी 40 फीसदी से ज्यादा है. पिछले पांच सालों में ओवैसी ने सीमांचल में अच्छा खासा जनाधार बनाया है, जिसका नतीजा 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान किशनगंज सीट पर दिखा था. यहां ओवैसी की पार्टी को 2 लाख 95 हजार 29 वोट आए जो कुल वोट का 26.78 प्रतिशत था. इसी के बाद किशनगंज विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में एआईएमआईएम प्रत्याशी कमरुल होदा की शानदार जीत के साथ बिहार में खाता खोलने में कामयाब रही थी.
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बता दें कि ओवैसी की पार्टी ने 2015 में पहली बार बिहार विधानसभा चुनाव में छह उम्मीदवार उतार थे और सभी हार गए थे, लेकिन करीब 96 हजार वोट हासिल करने में कामयाब रही थी. कोचा धामन सीट पर एआईएमआईए 38 हजार से ज्यादा वोट हासिल कर दूसरे नंबर रही थी. इसीलिए अब ओवैसी की ज्यादा उम्मीदें इसी सीमांचल इलाके की विधानसभा सीटों से हैं.