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बिहार: श्याम रजक RJD में हुए शामिल, DMY समीकरण से सुरक्षित की अपनी सीट

बिहार के बदले हुए सियासी समीकरण में नेता भी अपनी सीट सेफ करने में जुट गए हैं. ऐसे में नीतीश कुमार का साथ कभी न छोड़ने की कसम खाने वाले श्याम रजक ने आरजेडी का दामन थाम लिया है. ऐसे में माना जा रहा है कि श्याम रजक दलित-मुस्लिम-यादव DMY समीकरण के सहारे अपनी फुलवारी शरीफ सीट को सेफ कर लिया है.

श्याम रजक को आरजेडी की सदस्यता दिलाते तेजस्वी यादव श्याम रजक को आरजेडी की सदस्यता दिलाते तेजस्वी यादव
कुबूल अहमद
  • नई दिल्ली,
  • 17 अगस्त 2020,
  • अपडेटेड 4:27 PM IST

  • श्याम रजक ने आरजेडी की सदस्यता ग्रहण की
  • श्याम रजक का दलित-मुस्लिम-यादव समीकरण

बिहार विधानसभा चुनाव का भले ही औपचारिक ऐलान न हुआ है, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपने-अपने चुनाव अभियान की शुरुआत कर दी है. बिहार के बदले हुए सियासी समीकरण में नेता भी अपनी सीट सेफ करने में जुट गए हैं. ऐसे में नीतीश कुमार का साथ कभी न छोड़ने की कसम खाने वाले श्याम रजक ने आरजेडी का दामन थाम लिया है. ऐसे में माना जा रहा है कि श्याम रजक दलित-मुस्लिम-यादव ( DMY) समीकरण के सहारे अपनी फुलवारी शरीफ सीट को सेफ किया है.

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दरअसल, सूबे के बदले हुए सियासी माहौल के चलते श्याम रजक को इस बार बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में अपनी सीट फुलवारी शरीफ खो देने का डर सता रहा था. इसीलिए जातीय गोलबंदी के समीकरण को देखते हुए उन्होंने जेडीयू छोड़ आरजेडी का दामन थाम लिया है. आरजेडी में रहते हुए श्याम रजक इस सीट से चार बार विधायक रहे हैं और दो बार जेडीयू से चुने गए थे.

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पटना के पुराने सचिवालय से बमुश्किल सात किमी की दूरी पर श्याम रजक का विधानसभा क्षेत्र फुलवारी शरीफ है. यह ऐसी सुरक्षित सीट है, जहां दलित ही नहीं मुस्लिम और यादव मतदाता काफी निर्णयक भूमिका में है. यहां पर महादलित खासकर रजक समाज निर्णायक वोटर है. जेडीयू के बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने में श्याम रजक को अपनी परंपरागत सीट गवांने का खतरा सता रहा था, क्योंकि बीजेपी के साथ गठबंधन होने के चलते मुस्लिम और यादव उन्हें इस बार वोट नहीं करता. हालांकि, वो दलित+मुस्लिम वोटबैंक की राजनीति करते रहे हैं. इसीलिए उन्होंने आरजेडी में शामिल होकर दलित-मुस्लिम के साथ-साथ यादव मतों को भी साधने का प्लान बनाया है.

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मुस्लिमों के बीच अच्छी पकड़ है

पटना की फुलवारी शरीफ में बिहार का मुस्लिम संगठन इमारत-ए-शरिया का दफ्तर हैं. खानकाह-ए-मुजिबिया भी है, जहां के सर्वेसर्वा मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना वली रहमानी हैं. इस वजह से यहां बिहार के बड़े-बड़े मुस्लिम नेताओं और धर्म गुरुओं का आना जाना लगा रहता है. फुलवारी शरीफ सीट पर लंबे समय से विधायक होने के चलते श्याम रजक का इन नेताओं के साथ अच्छे रिश्ते हैं. माना जाता है कि इन्हीं रिश्तों की बदौलत श्याम रजक मुस्लिम बाहुल्य इलाके में अच्छा खासा वोट पाते रहे हैं. सीएए और एनआरसी को लेकर फुलवारी शरीफ में भी शाहीनबाग की तरह आंदोलन हुए थे. ऐसे में मुस्लिम मतदाता के छिटकने का खतरा बना हुआ था.

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बता दें कि फुलवारी शरीफ सीट पर करीब 25 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं. ऐसे ही करीब 27 फीसदी दलित मतदाता हैं जबकि 15 फीसदी यहां यादव मतदाता भी हैं. सुरक्षित सीट होने के चलते सभी पार्टियां दलित प्रत्याशी उतारी हैं, जिसके चलते यहां दलित वोट बटने वाले स्थिति बनी रहती है. इस लिहाज गैर मुस्लिम और गैर दलित वोटर की भूमिका काफी अहम हो जाती है. ऐसे में श्याम रजक ने आरजेडी में जाकर यादव और मुस्लिम मतों पर तो एकाधिकार स्थापित कर ही लिया है और साथ ही दलित समुदाय में अपनी बिरादरी के मतों के दम पर अपनी सीट सेफ करने की कवायद की है.

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राष्ट्रीय स्तर पर दलितों को एकजुट करने के लिए भी श्याम रजक ने एक अलग संगठन बनाया है. श्याम रजक अखिल भारतीय धोबी महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. जेडीयू में रहते हुए श्याम रजक गुजरात के जिग्नेश मेवाणी के साथ मुलाकात कर अपने इस एजेंडे के विस्तार पर काम करने की कोशिश में जुटे हैं. श्याम रजक यूपी, एमपी और राजस्थान के दलित नेताओं से भी नजदीकी बढ़ाने की कोशिश में जुटे रहे हैं. माना जाता है कि जीतन राम मांझी की तरह ही श्याम रजक भी महादलितों को लेकर एक अलग किस्म की राजनीति एजेंडा सेट करने की कवायद में है.

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