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नोएडा जिला प्रशासन ने स्कूलों के लिए एक अजीबो-गरीब सर्कुलर जारी किया है. इस सर्कुलर में कहा गया है कि स्कूल जिला प्रशासन को आपराधिक प्रवृत्ति वाले छात्रों की गोपनीय सूची भेजें.
जिला प्रशासन के इस सर्कुलर से स्कूल और अभिभावक दोनों ही हैरान हैं. स्कूलों के मुताबिक आपराधिक प्रवृत्ति के छात्रों को पहचानने का मैकनिज्म ना तो स्कूलों के पास है और ना ही स्कूल ऐसा कोई मैकनिज्म विकसित करना चाहते हैं.
JBM ग्लोबल स्कूल की प्रिसिंपल डॉ उपमा अरोड़ा के मुताबिक जिला प्रशासन ये खुद बताए कि आपराधिक प्रवृत्ति के बच्चों को स्कूल कैसे पहचानें. क्योंकि स्कूलों का काम बच्चों को रिफॉर्म करना है. अगर बच्चे गलत दिशा में जा रहे हैं, तब भी स्कूल अपने बच्चों को आपराधिक प्रवृत्ति के छात्र का दर्जा देकर उसका भविष्य नहीं बिगाड़ सकता.
डॉ उपमा के मुताबिक हम स्कूलों में बच्चों को काउसलिंग देने के साथ-साथ वैल्यू एडिशन सेशन, स्प्रिचुअल सेशन, एंगर मैनेजमेंट जैसे सेशन देते रहते हैं. ताकि अगर बच्चे किसी भी तरह के तनाव या अवसाद में हैं, उन्हें मदद मिले. स्कूलों की कोशिश होती है कि बच्चों में आपराधिक प्रवृत्ति पैदा ही ना हो.
ऐसे में इस सर्कुलर के जरिए किसी बच्चे को आपराधिक करार देना, बिल्कुल उचित नहीं है. एक नामी स्कूल ने नाम न छापने की शर्त पर आजतक से कहा कि उन्हें जिला प्रशासन का सर्कुलर मिला है. लेकिन वो इस सर्कुलर को लेकर असमंजस में हैं. स्कूल के मुताबिक ये समझना मुश्किल है कि आपराधिक प्रवृत्ति की श्रेणी में किन बच्चों को रखा जाए. आमतौर पर स्कूलों में शिक्षक अपने हर छात्र की गतिविधी पर नजर रखते हैं.
ऐसे छात्र जिनके बर्ताव दूसरों से अलग होता है या खराब होता है, उनकी जानकारी माता-पिता को दी जाती है, ताकि छात्र की असल समस्या तक पहुंचा जा सके. कई बार छात्रों के बीच आपस में लड़ाई-झगड़े होते हैं, जिन्हें छात्र आपस में ही सुलझाते हैं.
कुछ छात्र अधिक उत्तेजित हो जाते हैं. ऐसे छात्रों को स्कूल के दायरे में ही बेहतर काउसलिंग दी जाती है. लेकिन क्या ऐसी हरकतें करने वाले छात्रों को आपराधिक प्रवृत्ति के छात्रों की श्रेणी में रखा जाना चाहिए? बिल्कुल नहीं. स्कूलों का काम छात्रों की समस्या का समाधान करते हुए उनके व्यक्तित्व का विकास करना है. ना कि उन्हें आपराधिक प्रवृत्ति का छात्र करार देकर सूचीबद्ध कर देना.
इस सर्कुलर के बारे में जब आजतक ने अभिभावक संघ से बातचीत की तो वो भी सकते में नजर आए. अभिभावकों ने ऐसे सर्कुलर को गैरजरूरी बताते हुए सीधा जिला प्रशासन से ही सवाल पूछ डाला. अभिभावकों ने पूछा कि जिला प्रशासन बताए कि आपराधिक प्रवृत्ति के मानक क्या है? क्या स्कूली बच्चों में बढ़ रहे आपराधिक प्रवृत्ति को पहचानने का कोई तरीका जिला प्रशासन के पास है और अगर किसी बच्चे में ऐसी प्रवृत्ति है, तब भी क्या उसे नामजद अपराधी की तरह आपराधिक प्रवृत्ति के छात्र का दर्जा देना सही होगा.
गोपनीय सूची के बावजूद क्या बच्चे के भविष्य पर इस सूची का असर नहीं पड़ेगा. स्कूल के हजारों बच्चों के बीच से कुछ बच्चों को आपराधिक प्रवृत्ति के छात्र मानकर सूचीबद्ध करने से क्या छात्रों की मानसिक स्थिति पर गलत असर नहीं पड़ेगा.
मनोवैज्ञानिक डॉ पूजा शिवम जेटली की मानें तो बदलते समय के साथ बच्चों के अंदर आपराधिक प्रवृत्ति बढ़ रही है, लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीं है कि बच्चों को चिन्हित किया जाए और उन्हें आपराधिक दर्जा दिया जाए.
डॉ जेटली ने कहा कि इस सर्कुलर को सही तरीके से इटंरप्रेट करने की जरूरत है. माता-पिता समेत स्कूलों को चाहिए कि वो अपने बच्चों की गतिविधियों पर नजर रखें और अगर बच्चा का बर्ताव नकारात्मक और आक्रामक नजर आए, तो ऐसे बच्चों पर खास ध्यान दिया जाए.
ऐसे छात्र संवेदनशील होते हैं. लिहाजा इन्हें अलग-थलग करने की बजाय इन्हें सामान्य छात्र के रूप में ही सकारात्म दिशा दिखाने की जरूरत है. ऐसे मामले में स्कूल के काउंसलर के अलावा प्रोफेशनल काउंसलर की मदद ली जा सकती है.