
योगी आदित्यनाथ सरकार बनने के बाद सहारनपुर इलाका जातीय हिंसा की आग में झुलसा है. इसके बाद यहां के तीन गांवों के 180 दलित परिवारों ने बौद्ध धर्म अपनाया है. मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए स्थानीय प्रशासन फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है. भीम आर्मी के संस्थापक को पुलिस तलाश रही है. इसके बावजूद संगठन ने सोशल मीडिया पर ऑडियो संदेश जारी किया है जिसमें समर्थकों से 21 मई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर जुटने की अपील की गई है. इस घटनाक्रम के मद्देनजर आजतक की टीम ने रूपड़ी, कपूरपुर और ईघरी गांवों का दौरा किया. यहीं के परिवारों ने धर्म परिवर्तन का ऐलान किया है.
'लड़कर लेंगे हक'
कपूरपुर गांव के दलितों में हालिया वाकयों को लेकर गुस्सा साफ देखा जा सकता है. ऐसी ही एक दलित महिला पुष्पा कहती हैं, 'शबीरपुर में जिन महिलाओं के साथ गलत हुआ, वो भी हमारी बहू-बेटियां थीं. जब हमें हमारा हक नहीं मिल रहा तो हम क्या करें?' पुष्पा और उसके साथी गांववाले इस बात से इनकार करते हैं कि उनपर धर्म परिवर्तन के लिए किसी तरह का दबाव था. पुष्पा की तरह कपूरपुर की मैना बर्मन का भी कहना है कि उन्होंने कबीरपुर गांव में 5 मई को दलित महिलाओं के साथ हुई ज्यादती के विरोध में धर्म बदला है. जब मैना से पूछा गया कि धर्म बदलने से उन्हें हक कैसे हासिल होगा तो उनका जवाब था कि वो लड़कर अपना हक लेंगे. दोनों ही महिलाओं ने धर्म परिवर्तन के पीछे भीम आर्मी का हाथ होने से भी इनकार किया.
पहचान ही नहीं, नाम भी बदला
इलाके के दलितों ने ना सिर्फ हिंदू धर्म छोड़ा है बल्कि अपना सरनेम तक बदल लिया है. कपूरपुर में 23 साल के मनोज बाल काटने का काम करते हैं. वो भी धर्म परिवर्तन करने वाले लोगों में शामिल हैं. उनका कहना था, 'हमने मर्जी से धर्म परिवर्तन किया है. हमारे कई भाइयों के घर जलाए गए और गुंडागर्दी की गई. पुलिस प्रशासन ने कोई कार्रवाई नहीं की.' मनोज की तर्ज पर गांव के बाकी युवा भी दलितों पर हो रहे अत्याचारों से आहत हैं. इनमें से ज्यादातर युवा भीम आर्मी के समर्थक हैं. ईघरी, रूपड़ी और कपूरपुर के दलित युवाओं की मानें तो पुलिस उन्हें मीटिंग की इजाजत नहीं देती और उन्हें जबरन गांव छोड़ने पर मजबूर किया जा रहा है.
गांवों में भगवान बुद्ध की गूंज
रुपड़ी गांव में बने रविदास मंदिर पर भीम आर्मी के बैनर और पोस्टर लगे देखे जा सकते हैं. यहां के लोग मंदिरों में अब भगवान बुद्ध की जय-जयकार कर रहे हैं. गांव के ज्यादातर दलित खुलकर भीम आर्मी का समर्थन करते हैं. यहां धर्म परिवर्तन करने वाले लोगों में शामिल रूपा ने कहा, 'हम से किसी ने नहीं कहा. हमने खुद अपना धर्म बदला है. क्योंकि हमारे बहन-भाइयों पर अत्याचार हो रहे हैं.' इसी गांव के रोशन के मुताबिक, 'जब हमारे बच्चों पर जुल्म हो रहा है तो हम क्या करेंगे? हिंदू धर्म में हमें कहीं बैठने की जगह नहीं मिलती, हम पर अत्याचार होता है. इससे आहत होकर हमने बौद्ध धर्म अपनाया है.
दलितों का शिकवा
इन तीनों गांवों के दलितों का आरोप है कि हिंसा के शिकार दलितों को उचित मुआवजा नहीं दिया जा रहा है. दलित युवकों पर बेहद गंभीर आरोप लगाए गए हैं. स्थानीय दलितों का मानना है कि दलित नौजवानों को झूठे केसों में फंसाया जा रहा है. हालांकि स्थानीय पुलिस प्रशासन इस बात से इनकार कर रहा है. इतना ही नहीं, दलितों के खिलाफ हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों की शिनाख्त होने के बावजूद उनपर कोई कार्रवाई नहीं हुई है.
पुलिस का रुख
मामले की संजीदगी को भांपते हुए सहारनपुर के डीआईजी जेके शाही ने धर्म परिवर्तन पर लोकल इंटेलिजेंस यूनिट से रिपोर्ट तलब की है. हालांकि वो कैमरे पर कुछ भी कहने के लिए तैयार नहीं हुए. पुलिस अधिकारियों का दावा है कि उन्होंने जरूरत से ज्यादा संयम दिखाया है. किसी निर्दोष शख्स को डरने की जरूरत नहीं है लेकिन हिंसा के दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा. इलाके के एएसएसपी से जब भीम आर्मी के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, 'इस संगठन का अब तक कोई रिकॉर्ड नहीं है. इसलिए इसके बारे में औपचारिक तौर पर कुछ कहना सही नहीं होगा. सारी हिंसा को एक अराजक शख्स ने लीड किया. इस आरोपी ने ना सिर्फ भीड़ को तोड़फोड़ के लिए उकसाया बल्कि माहौल बिगाड़ने की भी कोशिश की.