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Vikas Dubey: एफआईआर से पहले लिखी जा चुकी थी कानपुर के बिकरू शूटआउट की कहानी

महज 38 मिनट में एफआईआर लिखने से लेकर पुलिस टीम को तैयार करना, वो भी अलग-अलग थानों की फोर्स और फिर मौके पर भी पहुंच जाना. ये बड़ा मुश्किल लगता है. तो फिर ये सब हुआ कैसे? ये सवाल उठना लाजिमी है.

कुख्यात विकास दुबे के खात्मे की कहानी पहले ही लिखी जा चुकी थी (फाइल फोटो) कुख्यात विकास दुबे के खात्मे की कहानी पहले ही लिखी जा चुकी थी (फाइल फोटो)
aajtak.in/परवेज़ सागर
  • नई दिल्ली,
  • 23 जुलाई 2020,
  • अपडेटेड 4:41 PM IST

  • विकास दुबे गैंग ने बिकरू गांव में पुलिस टीम पर किया था हमला
  • हमले में सीओ मिश्रा समेत शहीद हो गए थे आठ पुलिसकर्मी

कानपुर में कुख्यात विकास दुबे और उसके साथियों के खिलाफ FIR लिखे जाने से लेकर बिकरू शूटआउट तक की कहानी महज 38 मिनट की है. मगर 38 मिनट में एफआईआर लिखने से लेकर पुलिस टीम को तैयार करना, वो भी अलग-अलग थानों की फोर्स और फिर मौके पर भी पहुंच जाना. ये बड़ा मुश्किल लगता है. तो फिर ये हुआ कैसे? क्यों एफआईआर पर रात 11 बज कर 52 मिनट का वक्त लिखा हुआ है? दरअसल, बिकरू शूटआउट की असली कहानी ना तो 11 बज कर 52 मिनट पर शुरू होती है और ना ही कानपुर या चौबेपुर से. बल्कि इस कहानी का आगाज़ होता है यूपी की राजधानी लखनऊ से.

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इसस पहले कि हम 38 मिनट का राज़ खोलें, उससे पहले इस मामले की एफआईआर के बारे में जान लीजिए. एफआईआर राहुल तिवारी की शिकायत पर लिखी गई है. एफआईआर के मुताबिक एक जुलाई यानी बुधवार को दोपहर करीब साढ़े 12 बजे राहुल तिवारी के ससुर की ज़मीन को हड़पने के लिए विकास दुबे और उसके साथियों ने उसके साथ मारपीट की. उसे जान से मारने की कोशिश की. राहुल तिवारी ने इस घटना के बारे में आजतक से भी बात की थी.

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इस घटना के एक दिन बाद यानी दो जुलाई की रात राहुल तिवारी की तहरीर पर एफआईआर दर्ज की गई. एफआईआर में बाकायदा विकास दुबे, सुनील कुमार, बाल गोविंद, शिवम दुबे और अमर दुबे को नामजद किया गया था. इन पाचों के खिलाफ आईपीसी की धारा 307 यानी हत्या की कोशिश समेत कई धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया. फिर उसी रात यानी 2-3 जुलाई की रात इसी एफआईआर की बिनाह पर कानपुर जनपद की पुलिस विकास दुबे के घर दबिश डालने गई. जिसमें 8 पुलिसवालों की मौत हो गई.

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ये तो रही एफआईआर की कहानी. अब इसे एफआईआर के पीछे की कहानी आपको बताते हैं. सूत्रों के मुताबिक मुकदमा अपराध संख्या 191 पहले से लिखी गई, विकास दुबे की अंत की पटकथा का एक हिस्सा है. इस पूरी साज़िश में कई लोग शामिल हैं. जिनमें बड़े नेता, आला पुलिस अफसर और खुद विकास दुबे के कुछ खास गुर्गे शामिल हैं. इन्हीं में से एक है जय वाजपेयी. कहते हैं कि विकास दुबे का सारा हिसाब किताब यानी फाइनेंस वही संभालता था.

जय वाजपेयी की यूपी पुलिस के कई आला अफसरों से अच्छी खासी दोस्ती है. दोस्ती के कुछ सबूत तस्वीरों में भी क़ैद हैं. इन तस्वीरों में से एक तस्वीर में जय वाजपेयी एनकाउंटर से पहले तक एसटीएफ में डीआईजी रहे अनंत देव के साथ भी देखा जा सकता है. अनंत देव कानपुर के एसएसपी भी रह चुके हैं. ये वही अनंत देव हैं, जिन्हें विकास दुबे और उसके गुर्गों के साथ नज़दीकी के चलते बिकरू कांड के बाद एसटीएफ से हटा कर पीएसी में भेज दिया गया है.

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सूत्रों के मुताबिक विकास दुबे की तमाम अवैध और बेनामी संपत्ति के अलावा जुर्म की दुनिया से कमाई गई काली दौलत का हिसाब किताब जय वाजपेयी ही रख रहा था. रकम बड़ी थी. इधर, विकास दुबे के बढ़ते जुर्म के निशान अब कुछ पुलिसवालों और नेताओं को खटकने लगे थे. लिहाज़ा अब सभी मौके की ताक में थे और ये मौका मिला एक जुलाई को राहुल तिवारी की शक्ल में. कहते हैं एक जुलाई को जिस रोज़ विकास दुबे और उसके गुर्गों ने राहुल तिवारी की पिटाई की, उसी के बाद विकास दुबे के खात्मे की कहानी लिखी जा चुकी थी.

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इस कहानी का ताना-बाना लखनऊ में बुना गया. इसके बाद दो जुलाई की देर शाम लखनऊ से एक आला पुलिस अफसर का फोन कानपुर आया. विकास दुबे को निपटाने की पूरी तैयारी हो चुकी थी. देर शाम को ही ऑपरेशन में शामिल पुलिसवालों को सूचना दे दी गई थी. उन्हें तैयार रहने को कहा गया था. फिर इस दबिश को कानूनी जामा पहनाने के लिए दो जुलाई की रात 11 बजकर 52 मिनट पर एएफआईआर लिखी गई. लेकिन तीन थानों की पुलिस इस एफआईआर के लिखे जाने से काफी पहले ही मिशन पर निकल चुकी थी.

शायद पुलिस उस रात अपने इस मिशन में कामयाब भी हो जाती. मगर पुलिस से एक चूक हो गई. एफआईआर नंबर 191 जिस पुलिस अफसर ने लिखी, वही पुलिस अफसर पुलिस का गद्दार निकला. विनय तिवारी ने वक्त से बहुत पहले ही विकास दुबे को उसके अंजाम की ख़बर दे दी थी. इसीलिए विकास दुबे को तैयारी का मौका मिल गया. जबकि विनय तिवारी को छोड़ मिशन में शामिल बाकी पुलिसवाले इस बात से अंजान थे.

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नतीजा ये हुआ कि पुलिस टीम जब बिकरू गांव पहुंची तो पहली गोली पुलिस की तरफ से नहीं बल्कि विकास दुबे गैंग की तरफ से चली. शातिर विकास दुबे ने पुलिस टीम से ज़्यादा तैयारी कर रखी थी. उसने भारी मात्रा में असलाह बारूद जमा किया था. विकास दुबे ने पुलिस टीम को घेर कर हमला करने की तैयारी कर रखी थी. जिसका नतीजा ये हुआ कि उस रात आठ पुलिसवालों की जान चली गई. इस शूटआउट के बाद विकास दुबे भाग निकला.

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इस दौरान पुलिस उसे तलाशती रही. वो यूपी का मोस्ट वॉन्टेड अपराधी बन गया. पहले उस पर ढाई लाख का इनाम रखा गया, जिसे बाद में बढ़ा कर पांच लाख कर दिया गया. कई राज्यों में उसे तलाश किया जा रहा था. तभी उसके फरीदाबाद में होने के सुबूत मिले. लेकिन वहां से भी वो भाग निकला. इसके बाद नाटकीय ढंग से उसने उज्जैन के महाकाल मंदिर परिसर में गिरफ्तारी दी. मगर उज्जैन से कानपुर लाते वक्त वो यूपी एसटीएफ की गोलियों का शिकार हो गया.

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