
तमिलनाडु की मौजूदा राजनीति में सबसे बड़ा नाम मुथूवेल करुणानिधि का उभर कर सामने आता है. एम. करुणानिधि ऐसे द्रविड़ राजनीतिज्ञ हैं जिनका पूरे देश में सम्मान से नाम लिया जाता है. वह पांच बार (1969–71, 1971–76, 1989–91, 1996–2001 और 2006–2011) तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रह चुके हैं.
परिवार परिचय
करुणानिधि का जन्म 3 जून 1924 को तिरुवरूर के तिरुकुवालाई में दक्षिणामूर्ति नाम की जगह पर हुआ था. उनके पिता का नाम मुथूवेल और माता का नाम अंजुगम है. वह ईसाई वेलार समुदाय से हैं और उनके पूर्वज तिरुवरूर के रहने वाले थे. उन्होंने तीन बार विवाह किया है. तीन पत्नियों में से पद्मावती का निधन हो चुका है और दयालु और रजती जीवित हैं. उनके 4 बेटे और 2 बेटियां हैं. बेटों के नाम एमके मुथू, जिन्हें पद्मावती ने जन्म दिया था. एमके अलागिरी, एमके स्टालिन, एमके तमिलरासू और बेटी सेल्वी दयालु अम्मल की संतानें हैं. दूसरी बेटी कनिमोझी तीसरी पत्नी रजति से हैं.
राजनीतिक जीवन
राजनीतिक दल द्रविड़ मुन्नेत्र कज़गम (डीएमके) के संस्थापक सी. एन. अन्नादुरई की मौत के बाद से इसके नेता हैं. उन्होंने अपने 60 साल से अधिक के राजनीतिक जीवन में अपनी भागीदारी
वाले हर चुनाव में अपनी सीट जीतने का रिकॉर्ड बनाया है. 2004 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने तमिलनाडु और पुदुचेरी में डीएमके के नेतृत्व वाली डीपीए (यूपीए और वामपंथी दल) का नेतृत्व
किया और लोकसभा की सभी 40 सीटों को जीत लिया. इसके बाद 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने डीएमके द्वारा जीती गई सीटों की संख्या को 16 से बढ़ाकर 18 कर दिया और
तमिलनाडु और पुदुचेरी में यूपीए का नेतृत्व कर बहुत छोटे गठबंधन के बावजूद 28 सीटों पर विजय प्राप्त की.
रुचि और सामाजिक दृष्टि
करुणानिधि तमिल सिनेमा जगत के एक नाटककार और पटकथा लेखक भी हैं. उनके समर्थक उन्हें कलाईनार (कला का विद्वान) और मुथामिझ कविनार कहकर बुलाते हैं. करुणानिधि का कहना है कि वे प्रतिदिन
योगाभ्यास करते हैं, जिससे उन्हें ऊर्जा और सफलता मिलती है. करुणानिधि अपने जीते जी अपना मकान दान कर चुके हैं. उनकी इच्छानुसार उनकी मौत के बाद इसे गरीबों के लिए एक
अस्पताल में बदल दिया जाएगा. वे मांसाहार से शाकाहार की ओर आए थे.
राजनीतिक संघर्ष
महज 14 साल की उम्र में करुणानिधि ने हिंदी भाषा विरोधी आंदोलनों के जरिए राजनीति में प्रवेश किया. इसके बाद उन्होंने द्रविड़ राजनीति का एक छात्र संगठन भी बनाया. 1957 में
करुणानिधि पहली बार तमिलनाडु विधानसभा के विधायक बने और बाद में 1967 में वे सत्ता में आए और उन्हें लोक निर्माण मंत्री बनाया गया. साल 1969 में अन्ना दुराई के निधन के बाद वे
राज्य के मुख्यमंत्री बने. 5 बार मुख्यमंत्री और 12 बार विधानसभा सदस्य रहने के साथ-साथ वे राज्य में अब समाप्त हो चुकी विधान परिषद के भी सदस्य रह चुके हैं.
बहुआयामी और लोकप्रिय व्यक्तित्व
अपने कार्यकाल में करुणानिधि ने पुलों और सड़कों के निर्माण कार्य में गहरी दिलचस्पी दिखाई. उन्होंने अपने शासनकाल में बहुत से लोकप्रिय कार्यक्रम भी शुरू किए. एक सफल राजनेता,
मुख्यमंत्री, फिल्म लेखक, साहित्यकार होने के साथ ही करुणानिधि एक पत्रकार, प्रकाशक और कार्टूनिस्ट भी रहे हैं.
तमिल भाषा की सेवा
साल 1970 में पेरिस (फ्रांस) में हुए तृतीय विश्व तमिल सम्मेलन में उन्होंने उद्घाटन समारोह में एक विशेष भाषण दिया था. साल 1987 में कुआलालम्पुर (मलेशिया) में हुए छठे विश्व तमिल
कॉन्फ्रेंस में भी उन्होंने उद्घाटन भाषण दिया था. 2010 में हुई विश्व क्लासिकल तमिल कॉन्फ्रेंस का अधिकृत थीम सांग एम. करुणानिधि ने ही लिखा था, जिसकी धुन एआर रहमान ने तैयार
की थी.
बवाल बढ़ाने वाला बयान
सेतुसमुद्रम विवाद के जवाब में करूणानिधि ने हिन्दुओं के आराध्य भगवान श्रीराम के वजूद पर ही सवाल उठा दिए थे. उन्होंने कहा था, 'लोग कहते हैं कि 17 लाख साल पहले कोई शख्स था,
जिसका नाम राम था. कौन हैं वो राम ? वो किस इंजीनियरिंग कॉलेज से ग्रेजुएट थे ? क्या इस बात का कोई सबूत है ?' उनके इस सवाल और बयान पर खासा बवाल हुआ था.
लिट्टे का समर्थन
राजीव गांधी की हत्या की जांच करने वाले जस्टिस जैन कमीशन की अंतरिम रिपोर्ट में करुणानिधि पर लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (एलटीटीई) को बढ़ावा देने का आरोप लगाया गया
था. अंतरिम रिपोर्ट में इस बात की सिफारिश की थी कि राजीव गांधी के हत्यारों को बढ़ावा देने के लिए तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री एम.करुणानिधि और डीएमके पार्टी को जिम्मेदार
माना जाए.
गिरफ्तारी भी हुई
साल 2001 में करुणानिधि , पूर्व मुख्य सचिव के. ए. नाम्बिआर और अन्य कई लोगों के एक समूह को चेन्नई में फ्लाईओवर बनाने में भष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया.
वंशवाद को बढ़ावा
करुणानिधि के विरोधियों, उनकी पार्टी के कुछ सदस्यों और अन्य राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने करुणानिधि पर वंशवाद को बढ़ावा देने और नेहरू-गांधी परिवार की तरह एक राजनीतिक वंश का आरंभ
करने का आरोप भी लगाए थे. हालांकि गलत काम करने का दोषी पाए जाने पर उन्होंने अपने अन्य दो बेटों एमके मुथु और एमके अलागिरी को पार्टी से भी निकाला था. इसी तरह दयानिधि
मारन को भी केंद्रीय मंत्री के पद से हटा दिया था.
विरोध के स्वर
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, करुणानिधि ने अपने बेटे एमके स्टालिन और परिवार के अन्य सदस्यों के लिए वाइको को एक खतरा मानते हुए दरकिनार किया था. उनके विरोध में डीएमके
को छोड़कर जाने वाले वाइको की आवाज सबसे अधिक बुलंद रही.
अखबार भी निकाला
अपने सहयोगियों के लिए उन्होंने 'मुरासोली' नाम के एक समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू किया था. यह आज भी चल रहा है. वह अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को नाम से संबोधित करके रोज चिट्ठी लिखते हैं. वह 50 सालों से ये चिट्ठियां लिखते आ रहे हैं. इसके अलावा उन्होंने कुडियारसु के संपादक के रूप में काम किया है और मुत्तारम पत्रिका को अपना काफी समय दिया है. वे स्टेट गवर्नमेंट्स न्यूज रील, अरासु स्टूडियो और तमिल और अंग्रेजी में प्रकाशित होने वाली सरकारी पत्रिका तमिल अरासु के भी संस्थापक हैं.
किताबें जो काफी मशहूर हुई
करुणानिधि द्वारा लिखित पुस्तकों में रोमपुरी पांडियन, तेनपांडि सिंगम, वेल्लीकिलमई, नेंजुकू नीदि, इनियावई इरुपद, संग तमिल, कुरालोवियम, पोन्नर शंकर, तिरुक्कुरल उरई आदि शामिल हैं.
गद्य और पद्य में लिखी उनकी पुस्तकों की संख्या एक सौ से भी अधिक हैं.
कई बड़े नाटकों के रचनाकार
20 साल की उम्र में करुणानिधि ने ज्यूपिटर पिक्चर्स के लिए पटकथा लेखक के रूप में कार्य शुरू किया. उन्होंने मनिमागुडम, ओरे रदम, पालानीअप्पन, तुक्कु मेडइ, कागिदप्पू, नाने एरिवाली,
वेल्लिक्किलमई, उद्यासूरियन और सिलप्पदिकारम नाटक लिखे.
पहली फिल्म से ही लोकप्रिय हुए
अपनी पहली ही फिल्म राजकुमारी से करुणानिधि ने लोकप्रियता हासिल की. उनकी लिखी गई 75 पटकथाओं में राजकुमारी, अबिमन्यु, मंदिरी कुमारी, मरुद नाट्टू इलवरसी, मनामगन, देवकी,
पराशक्ति, पनम, तिरुम्बिपार आदि शामिल हैं.
नए कलाकार बनाए
उन्होंने तमिल सिनेमा को शिवाजी गणेशन और एस.एस. राजेंद्रन जैसे कलाकार दिए. उनके लेखन में द्रविड़ आंदोलन की विचारधारा का पुट रहता था.
दो बार डॉक्टरेट
कई पुरस्कार और सम्मान उनके नाम हैं. इसके अलावा दो बार डॉक्टरेट की मानद उपाधि से भी नवाजे गए.