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US विदेश मंत्री पोम्पियो ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को बताया दुष्ट, कही ये बात

पोम्पियो ने कहा कि यह चॉइस अमेरिका के लिए नहीं है बल्कि आजादी और अत्याचार के बीच है. वर्चुअल बैठक में पोम्पियो ने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना पर दुष्ट होने का आरोप लगाया.

अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो (फाइल फोटो-AP) अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो (फाइल फोटो-AP)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 21 जून 2020,
  • अपडेटेड 10:48 AM IST

  • पोम्पियो को ग्लोबल टाइम्स ने दिया जवाब
  • कहा- यह लक्ष्य हासिल नहीं कर पाएगा US

अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने एक वर्चुअल समिट में चीन पर हमला बोला है. वर्चुअल 2020 कोपेनहेगन डेमोक्रेसी समिट में शुक्रवार को पोम्पियो ने कहा कि यूरोपीय देशों को तय करना है कि वे बीजिंग को चुनते हैं या वॉशिंगटन को. पोम्पियो ने कहा कि यह चॉइस अमेरिका के लिए नहीं है बल्कि आजादी और अत्याचार के बीच है. वर्चुअल बैठक में पोम्पियो ने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना पर "दुष्ट" होने का आरोप लगाया.

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चीन के सरकारी समाचार पत्र ग्लोबल टाइम्स ने पोम्पियो के बयान पर अपना विचार रखा है. ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है, चीन और यूरोप के बीच मूल्यों और राजनीतिक प्रणालियों पर मतभेद हैं, लेकिन क्या पोम्पियो चीन को जिस रूप में दिखा रहे हैं, वह ऐसा है? उनके आरोप तथ्यों से मेल नहीं खाते. यूरोपीय लोगों में चीन को लेकर कुछ पूर्वाग्रह हैं. इसका मतलब क्या ये है कि वे चीन के साथ नहीं मिल सकते हैं? दुनिया कितनी खतरनाक हो जाएगी अगर देश केवल उन्हीं देशों के साथ संबंध रखें जिनसे उनके सिद्धांत मिलते हों.

ग्लोबल टाइम्स ने लिखा, कोपेनहेगन में पोम्पियो के भाषण का मकसद यूरोपीय देशों के साथ एक चर्चा नहीं था, बल्कि अपने यूरोपीय सहयोगियों को समझा कर उन्हें वॉशिंगटन की तरफ खींचने की मांग करना था. इसमें कोई संदेह नहीं है कि यूरोपीय देश चीन की तुलना में अमेरिका के करीब हैं, लेकिन अब सवाल यह है कि वॉशिंगटन यूरोप को पक्ष चुनने के लिए क्यों कह रहा है और यूरोपीय हितों को दूर फेंकने के लिए क्यों तैयार है. अमेरिका आज यूरोप से बहुत कुछ पूछ रहा है. हालांकि वॉशिंगटन को ऐसा लक्ष्य मिलना मुश्किल होगा.

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वॉशिंगटन को अंततः यह पता चल जाएगा कि वह चीन को अलग करने के लिए कड़ी मेहनत करता है, लेकिन वह वास्तव में कई मामलों में खुद को और अलग कर लेगा. ग्लोबल टाइम्स ने कहा, अमेरिका दुनिया के साथ जबरदस्ती कर रहा है, दुनिया से अनुरोध कर रहा है, ठीक वैसे ही जैसे ताइवान के अधिकारियों और ऑस्ट्रेलिया के साथ किया. अमेरिका शक्तिशाली है लेकिन वह इसमें विफल हो जाएगा क्योंकि वह दूसरे देशों से अपने हित की बात कर रहा है.

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