डायरेक्टर आर बाल्कि की इंडस्ट्री में पहचान एक्सपेरिमेंटल डायरेक्टर के रूप में रही है. घूमर से पहले आर बाल्की की फिल्म चुप रिलीज हुई थी. फिल्म में सलमान दुलकर, सनी देओल और पूजा भट्ट अहम किरदार में थे. कहानी फिल्मी क्रिटिक के ऊपर बनाई गई थी. क्रिटिक के मानको पर खरी उतरने वाली फिल्म बॉक्स ऑफिस पर उतनी सक्सेसफुल नहीं रही. अब इसका वर्ल्ड टीवी प्रीमियर हुआ. जिसके मौके पर आर बाल्की ने हमसे बातचीत की है.
हम टीवी के पावर को पहचानते हैं
आर बाल्की वर्ल्ड टीवी प्रीमियर के फायदे पर बात करते हुए बताते हैं, टीवी में प्रीमियर का फिल्मों को हमेशा से फायदा मिला है. देखिए भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा अपनी मनोरंजन के लिए टीवी पर ही निर्भर रहता है. हमारी आबादी जितनी है, उतने लोग थिएटर तो पहुंच ही नहीं पाते हैं. थिएटर जब फुल होते हैं, तब भी पर्सेंटेज बहुत ही लीमिटेड हैं. वहीं टेलीविजन की पहुंच बहुत ज्यादा है, हम टीवी के पावर को बखूबी जानते हैं. ऐसे में आपकी पहुंच घर-घर तक चली जाती है. मुझे यकीन है, फिल्म देखने के बाद लोग इसे इंजॉय करेंगे. ये ऐसी फिल्म है, जिसमें शाहरुख, सलमान जैसे सुपरस्टार नहीं हैं, कभी-कभी जब घर में हम ऐसी फिल्मों को डिस्कवर करते हैं, तो दर्शकों को भी हैरानी होती है कि उन्होंने एक अच्छी फिल्म मिस कर दी.
कुछ क्रिटिक्स ने इसे अपना हथियार बना लिया है
फिल्म चुप के बारे में बाल्कि बताते हैं, जब मैं फिल्म की कहानी लिख रहा था, तो मेरे लिए यह प्योर रोमांटिक फिल्म था. एक दर्द से भरे आदमी के रोमांस की कहानी है. गुरूदत्त भी अपनी निजी जिंदगी में कुछ ऐसे ही इंसान थे. जब एक आर्टिस्ट को क्रिटिसाइज किया जाता है, तो दो चीजें होने की संभावनाएं होती हैं. असर तो दोनों ही परस्थितियों में होता है, लेकिन कुछ लोग इसे बहुत पर्सनल ले लेते हैं, और बहुत गहराई में चले जाते हैं और कई बार खुद को नुकसान भी पहुंचाते हैं. वहीं कुछ लोग इन क्रिटिसिज्म को अपना हथियार बनाकर काम को और बेहतर बनाने की कोशिश में लग जाते हैं. कुछ ऐसे भी होते हैं, जो क्रिटिसिज्म को सुनकर गुस्सा हो जाते हैं. जब कोई आर्टिस्ट अपनी जिंदगी से प्रेरित होकर लोगों के बीच अपनी कला को शोकेस करता है और उसे सराहना नहीं मिलती है, तो फिर उसे ऐसा लगता है, मानों उनकी पूरी जिंदगी को क्रिटिसाइज किया जा रहा है. हमेशा कहा जाता है आर्टिस्ट सेंसिटिव हो जाते हैं लेकिन वो ये नहीं देखते कि लोग अपनी जजमेंट सुनाने में इतने मगन हो जाते हैं कि हमें समझ नहीं होती है कि किस कदर हम उनकी लाइफ को क्रिटिसाइज कर रहे हैं उसका असर किसी को पता नहीं होता है. चुप भी कुछ इस तरह की कहानी है.
चीनी कम में रिव्यूवर बहुत क्रूअल हो गए थे
चुप कहीं न कहीं क्रिटिक्स पर कटाक्ष माना जाता है. निजी जिंदगी में कभी किसी के रिव्यूज ने आपको हर्ट किया है. जवाब में बाल्कि कहते हैं, मैं आज भी उतना ही सेंसेटिव और आघाती किस्म का आर्टिस्ट हूं. मुझे याद है, मेरी पहली फिल्म चीनी कम का जब रिव्यू आया था, तो उसे देखकर मुझे बहुत दुख हुआ था. बहुत ही कठोर रिव्यू था. उस वक्त मुझे गुस्सा भी आया था और बुरा भी लगा था. तब ही एक बात जेहन में आई थी कि रिव्यूवर के लिए तो आपने एक प्लेटफॉर्म दे दिया है, पर हम जैसे डायरेक्टर्स व एक्टर्स के पास कोई प्लेटफॉर्म क्यों नहीं है, जहां हम उनके रिव्यू की बात कर सकें. ये बहुत ही अनफेयर है. फिल्म अच्छी होती है या बुरी बेशक, लेकिन रिव्यूज पर्सनल हो जाते हैं, तो फिर उसकी सत्यता पर सवाल उठने लाजमी है. चीनी कम अच्छी फिल्म थी, लोगों को पसंद भी आई थी, लेकिन एक रिव्यू बहुत ही पर्सनल और हार्श था. आज भले बैलेंस हो गया हूं लेकिन मैं उस वक्त आघाती था. हो सकता है कि रिव्यूज की वजह से मैं एक गुस्सैल और निराश इंसान बन जाता. मेरे अंदर कुछ अलग करने की चाह नहीं बचती.
रिव्यूज आपके अंदर जहर भी भर देते हैं
बाल्कि आगे कहते हैं, जब लोग क्रिटिसाइज करते हैं, तो मुझे बहुत दुख होता है. मैं क्रिटिसिज्म नहीं सुनना चाहता हूं. सब लोग कहते हैं, मुझे समीक्षा पसंद है. मैं नहीं मानता कि क्रिटिसिज्म आपको बेहतर इंसान बनाता है, उल्टा लोगों के अंदर द्वेष ज्यादा भरता जाता है. अगर मैं आपके काम के बारे में आपको बताने लगूं, तो पहला रिएक्शन यही होगा कि मैं रूड हो रहा हूं, क्रूअल हूं. आप मुझे गुस्सा ही दिलाएंगे और मेरे जेहन में यही इंप्रेशन बनेगी कि आप मुझे पसंद नहीं करते हैं. मुझे गुस्सा ही आएगा. मैं यहां नहीं कह रहा कि फिल्म सबको पसंद आनी चाहिए, लेकिन आप अपने रिव्यूज में थोड़ी सेंसिटिविटी ला सकते हैं. एक आदमी ने दो साल की मेहनत कर एक फिल्म बनाई है, आप बीस मिनट में आकर उसके बारे में कुछ लिख देते हैं और कहते हैं, मैं सही हूं. आप लिखते वक्त सुझाव दे सकते थे, लेकिन फैसला सुना देना कहां का न्याय है. आप उसके बारे में बातचीत नहीं करते हैं, बस फैसला सुना देते हैं कि वो निगेटिव है या पॉजिटिव. आप अपनी बात को ऐसे रखें कि सामने वाला उस क्रिटिसिज्म को स्पोर्टिंग तरीके से ले सके. ऐसा न करें कि वो हताश ही हो जाए. आपके काम से किसी के करियर की दशा-दिशा तय होती है, तो इस चीज को बहुत ही सेंसिटिव तरीके से लिया जाए, तो बेहतर. आपके इस काम से पब्लिक भी इंफ्लूएंस होती है, तो इसका ध्यान रखा जाए.
मसाला फिल्मों को रिव्यूज की नहीं जरूरत
अब तो कई बड़े स्टार्स व डायरेक्टर्स इंटरव्यूज में कह चुके हैं कि अब उनके लिए क्रिटिक्स के रिव्यूज मायने नहीं रखते हैं. आपकी राय, जवाब में बाल्कि कहते हैं, नहीं... ये बात बहुत गलत है. रिव्यूज बहुत जरूरी हैं. क्योंकि स्टार्स को उनके रवैये से ठेस पहुंचती है, इसलिए वो ऐसा कह देते हैं. हां, अगर शाहरुख या सलमान खान की फिल्म है, तो सबको पता है कि यहां क्रिटिक्स का काम नहीं होता है. उस वक्त वो थिएटर रिव्यू करने भी नहीं जाते, बस सीटियां बजाने जाते हैं. कुछ फिल्मों को क्रिटिक के रिव्यू की जरूरत नहीं होती है. अब रजनीकांत की फिल्मों को क्या ही रिव्यू करेंगे. हालांकि बॉलीवुड की 90 प्रतिशत फिल्में इस मसाला कैटिगरी में नहीं आती हैं.
चुप के दौरान लोगों ने कहा था, 'ये क्या बना रहे हो'
अपने फिल्मों के जॉनर पर बाल्कि कहते हैं, मेरी फिल्म से मैंने कभी मैसेज देने की कोशिश नहीं की है. मैं बस फिल्मों के जरिए लोगों को एंटरटेन करना चाहता हूं. हां, अगर बीच में कोई मेसेज आता है, तो यह सोने पर सुहागा वाली बात है. हां, जब भी कोई आइडिया वाली फिल्म आती है, तो क्रिटिक की उसपर पैनी नजर होती है. मुझे याद है, जब मैंने चुप बनाने के बाद कुछ क्रिटिक्स को यह फिल्म दिखाई थी, तो उनका ये कहना था कि क्यों बना रहे हो ऐसी फिल्म, कौन मानता है क्रिटिक्स को, ये बहुत ही छोटी सी दुनिया है..पब्लिक कनेक्ट नहीं करेगी... वहीं कुछ लोग का कहना था कि अरे नहीं क्रिटिक ऐसे नहीं होते हैं. तुम मनगंढ़त बातें कर रहे हो.
देखो, जब भी हम पॉलिटिकल सिस्टम को लेकर फिल्म बनाते हैं, तो लोग वाहवाही करने लगते हैं, वहीं जब कुछ ऐसी फिल्म बना दें, जो उनसे रिलेट करती हों, तो फिर उनके भौंहे तन जाती हैं. बस एक क्रिटिक है, जिसकी बात मुझे अच्छी लगी, उसने कहा कि मैं तुम्हारी फिल्म देखकर इसे रिव्यू नहीं कर पाऊंगा. दरअसल जब भी मैं फिल्म देखता हूं, तो खुद को जस्टिफाई करने लग जाता हूं. मैं बार-बार सोचता हूं कि यार मैं तो ऐसा नहीं हूं... इनफैक्ट कोई क्रिटिक ऐसा नहीं होता है... हम वहां जस्टिफाई करने में लग जाते हैं. मुझे उसका ओपिनियन अच्छा लगा था, क्योंकि वो ऑनेस्ट था.