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Israel-Hamas War: फिलिस्तीन के आतंकी संगठन हमास की ओर से किए गए हमलों के बाद इजरायल ने जंग शुरू कर दी है. इस कारण पहले से ही खराब इजरायल और अरब देशों के रिश्ते और खराब हो गए हैं.
इजरायल और फिलिस्तीन के इस संघर्ष ने पश्चिम एशिया और मध्य पूर्व में तनाव बढ़ गया है. फिलिस्तीन के साथ संघर्ष की वजह से पहले भी इजरायल को अरब देशों के साथ युद्ध लड़ना पड़ा है. और अब जब एक बार फिर नई जंग शुरू हो गई है तो ऐसे में अरब देशों के साथ टकराव और बढ़ गया है.
ऐसे समय में जब इजरायल और फिलिस्तीन को लेकर दुनिया दो खेमों में बंट गई है. पूरी दुनिया की नजरें अरब वर्ल्ड पर हैं. दो देशों की इस जंग कोअरब के देश किस तरह देखते हैं. इस पर नजर डालने की जरूरत है.
1. मिस्रः ऐतिहासिक रूप से मिस्र, इजरायल के बड़े विरोधियों में से एक था. साल 1979 में हुए कैम्प डेविस समझौते पर हस्ताक्षर के बाद दोनों के बीच संबंध सामान्य हो गए. मिस्र, इजरायल को मान्यता भी देता है और राजनयिक संबंध भी बनाए रखता है. इसके साथ ही लगातार फिलिस्तीनियों के अधिकारों की वकालत भी करता है. मिस्र ने पहले भी इजरायल-हमास संघर्ष में मीडिएटर की भूमिका निभाई है. मिस्र के नागरिक फिलिस्तीन के मुद्दे के प्रति सहानुभूति रखते हैं.
2. जॉर्डनः ये उन दो अरब देशों में से एक है, जिसने इजरायल के साथ शांति समझौता किया है. 1994 में दोनों के बीच शांति समझौता हुआ था. इसके बावजूद, फिलिस्तीनी शरणार्थियों की आबादी के कारण जॉर्डन के नागरिकों की भावनाएं काफी हद तक फिलिस्तीनी समर्थक बनी हुई हैं. जॉर्डन की सरकार एक ओर इजरायल के साथ संबंध भी बनाए रखती है और दूसरी ओर फिलिस्तीनी इलाकों में इजरायली कामों की निंदा भी करती है.
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3. लेबनानः इजरायल और लेबनान के बीच संबंध तनावपूर्ण बने हुए हैं. इसका अहम कारण लेबनान में ईरान समर्थित शिया आतंकी संगठन हिजबुल्लाह की मौजूदगी है. हिजबुल्लाह इजरायल के खिलाफ कई युद्ध लड़ चुका है और खुलकर फिलिस्तीन का समर्थन करता है. लेबनानी सरकार भी फिलिस्तीनी समर्थक है और उसके इजरायल के साथ राजनयिक संबंध भी नहीं हैं. हमास के साथ ताजा संघर्ष में भी हिजबुल्लाह ने इजरायल पर कई रॉकेट दागे हैं. लेबनान और इजरायल की तकनीकी रूप से युद्ध की स्थिति में हैं. इजरायल की सीमा से लगे देश के दक्षिण में हिजबुल्लाह का गढ़ है. 2006 में दोनों देशों के बीच एक युद्ध छिड़ गया था. इस युद्ध में लेबनान में 11सौ और इजरायल में 200 से ज्यादा लोग मारे गए थे.
4. सीरियाः इजरायल और सीरिया भी दशकों से एक-दूसरे के विरोधी रहे हैं. दोनों के बीच गोलान हाइट्स को लेकर विवाद बना रहता है. सीरिया हमेशा फिलिस्तीन के मुद्दे का समर्थन करता है. उसने दशकों से फिलिस्तीनियों को रिफ्यूजी कैम्प में सहारा दिया है. सीरिया अपनी नीतियों और बयानबाजी में इजरायल विरोधी बना हुआ है. सात अक्टूबर के हमले से इजरायल के साथ भी ये मोर्चा खुल सकता है.
5. सऊदी अरबः इजरायल और सऊदी अरब के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं रहे हैं और वो फिलिस्तीनी मुद्दे का कट्टर समर्थक रहा है. हाल ही में इजरायल और सऊदी अरब के संबंधों में नरमी के संकेत दिखे थे, लेकिन ताजा संघर्ष ने इन्हें फिर से जटिल बना दिया. सऊदी अरब का आधिकारिक रुख टू-स्टेट सॉल्यूशन और फिलिस्तीनी लोगों के अधिकारों के समर्थन में बना हुआ है.
6. संयुक्त अरब अमीरातः यूएई ने 2020 में अब्राहम समझौते के जरिए इजरायल के साथ संबंध सामान्य कर लिए थे. यूएई के इजरायल के साथ आर्थिक संबंध भी मजबूत है, जबकि फिलिस्तीनी मुद्दे पर भी चिंता व्यक्त करता रहा है. यूएई भी टू-स्टेट सॉल्यूशन का समर्थन करता है.
7. बहरीनः यूएई की तरह ही 2020 में बहरीन ने भी इजरायल के साथ अपने संबंध सामान्य कर लिए थे. हालांकि, बहरीन सरकार इजरायल के साथ अपने संबंध बनाए रखने के साथ-साथ फिलिस्तीनी अधिकारों के समर्थन को भी बनाए रखता है.
8. कतरः ये अक्सर दोहरी भूमिका में रहता है. एक ओर तो ये इजरायल के साथ भी संबंध बनाए रखता है, तो दूसरी ओर ये गाजा पट्टी को आर्थिक मदद पहुंचाकर हमास का समर्थन भी करता है. कतर अक्सर झगड़ों में मध्यस्थ की भूमिका निभाता है.
9. ईरानः इजरायल के विरोध में ईरान और हमास के साझा हित हैं. ईरान पर अक्सर हमास का समर्थन करने के आरोप लगते रहे हैं. साथ ही ईरान पर हमास की मिलिट्री विंग इज्ज अद-दीन अल-कसम ब्रिगेड को फंडिंग देने का आरोप भी लगता रहा है. हालांकि, इसके बावजूद ईरान और हमास में कभी-कभी तनाव हो जाता है. उसकी वजह ये है कि ईरान शिया बहुल राष्ट्र है जबकि हमास सुन्नी संगठन है. तनावों के बावजूद इजरायल का विरोध ईरान और हमास इन्हें करीब ला देता है.
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इजरायल के खिलाफ अरब वर्ल्ड की बायकॉट स्ट्रैटेजी
1946 में अरब लीग ने मिस्र की राजधानी काहिरा में एक स्थाई बहिष्कार समिति का गठन किया. यहूदियों के बहिष्कार का यह प्रस्ताव 1948 में इजरायल की स्थापना के बाद भी जारी रहा. इसका मकसद फिलिस्तीन में यहूदी इंडस्ट्री को कमजोर करना और क्षेत्र में यहूदियों के इमिग्रेशन को रोकना था. संयुक्त राष्ट्र के 'टू स्टेट सॉल्यूशन' के प्रस्ताव के बाद यह बायकॉट स्ट्रैटेजी ज्यादा तेज हुई. लेकिन इसका नतीजा मनमाफिक साबित नहीं हुआ.
अरब देशों को जब यह लगा कि इजरायल के बहिष्कार की यह नीति उतनी कारगर साबित नहीं हो रही है, जितना उन्हें अंदाजा था. इसके बाद दूसरे बायकॉट की स्ट्रैटेजी लाई गई. इसके तहत गैर इजरायली कंपनियों को इजरायल के साथ कारोबार करने से रोका गया. था. जो कंपनियां इसका पालन नहीं कर रही थीं, उन्हें अरब वर्ल्ड बड़ी फुर्ती से ब्लैकलिस्ट करने लगा. अरब लीग के बायकॉट का इजरायल की अर्थव्यवस्था और विकास पर नकारात्मक असर पड़ा. लेकिन साथ में अरब देशों की आर्थिक कल्याणकारी नीतियां भी प्रभावित हुई.
अरब मुल्कों ने आगे चलकर इजरायल के खिलाफ परमानेंट बायकॉट समिति का गठन भी किया, जिसका नतीजा यह निकला कि इजरायल और अरब मुल्कों के बीच युद्ध शुरू हो गया. अरब मुल्कों ने लगातार इजरायल के बहिष्कार की नीति को अपनाए रखा. अरब लीग ने इजरायल के साथ डाक, टेलीफोन और रेडियो कम्युनिकेशन बंद कर दिया और समुद्र, जमीन और वायु तीनों माध्यमों से इजरायल को ब्लॉक करके रखा.