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पुरुष से पुरुष और स्त्री से स्त्री की शादी को कानूनी मान्यता दी जाए या नहीं? इस पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है. केंद्र सरकार इसके विरोध में है. इसके लिए केंद्र के अपने तर्क हैं. वहीं, याचिकाकर्ताओं ने इसे 'मौलिक अधिकारों' से जोड़ा है.
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए. तो वहीं याचिकाकर्ताओं की तरफ से सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने दलीलें रखीं.
समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता दिए जाने की मांग पर बुधवार को भी सुनवाई हुई. इन याचिकाओं में से एक में 1954 के स्पेशल मैरिज एक्ट में बदलाव करने की मांग भी की गई है.
केंद्र सरकार ने इन याचिकाओं का विरोध करते हुए इन्हें खारिज करने की मांग की. साथ ही ये भी दलील दी कि समलैंगिक विवाह को अनुमति देने या न देने पर फैसला करने का अधिकार संसद का है, न कि अदालत का. हालांकि, चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने केंद्र की इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि 'हम यहां के इंचार्ज हैं, हम तय करेंगे कि किस पर सुनवाई करनी है और किस पर नहीं.'
इस दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने कहा, जो अधिकार हेट्रोसेक्सुअल (विपरित लिंग) के हैं, वही होमोसेक्सुअल (समलैंगिक) के भी हैं. इनकी शादी स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत रजिस्टर्ड होनी चाहिए. उन्होंने ये भी कहा कि हम स्पेशल मैरिज एक्ट को रद्द करने की मांग नहीं कर रहे हैं, लेकिन इसमें बदलाव की जरूरत है.
इस पर कोर्ट ने कहा कि आप चाहते हैं कि शादी को मौलिक अधिकार घोषित किया जाए और उसे स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत रजिस्टर्ड किया जाए. आगे अदालत ने कहा कि वो पर्सनल लॉ के दायरे में जाए बिना देखेगी कि क्या स्पेशल मैरिज एक्ट के जरिए समलैंगिकों को अधिकार दिए जा सकते हैं.
ऐसे में जानते हैं कि ये स्पेशल मैरिज एक्ट क्या है? इसमें क्या बदलाव करने की मांग की गई है? साथ ही ये भी जानेंगे कि पर्सनल लॉ क्या होते हैं?
क्या है स्पेशल मैरिज एक्ट?
- दो अलग-अलग धर्मों और अलग-अलग जातियों के लोग शादी कर सकें, इसके लिए 1954 में स्पेशल मैरिज एक्ट बनाया गया था.
- इस कानून के जरिए भारत के हर नागरिक को ये संवैधानिक अधिकार दिया गया है कि वो जिस धर्म या जाति में चाहे, वहां शादी कर सकते हैं. इसके लिए लड़के की उम्र 21 साल और लड़की की उम्र 18 साल से ज्यादा होनी चाहिए.
- भारत में शादी के बाद उसका रजिस्ट्रेशन भी करवाना होता है. अलग-अलग धर्मों के अपने पर्सनल लॉ हैं, जो सिर्फ उन धर्मों को मानने वालों पर लागू होते हैं. लेकिन स्पेशल मैरिज एक्ट सभी पर लागू होता है. इसके तहत शादी करवाने के लिए धर्म बदलने की जरूरत नहीं होती.
इस कानून में क्या बदलने की मांग की गई है?
1. कानूनी उम्र बदली जाए
- सुप्रीम कोर्ट में बहस के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट रोहतगी ने कहा कि स्पेशल मैरिज एक्ट में शादी की कानूनी उम्र में बदलाव किया जाए. यहां पुरुष की पुरुष से शादी होती है तो उम्र 21 साल और स्त्री की स्त्री से शादी होती है तो 18 साल उम्र तय की जा सकती है.
2. महिला-पुरुष की जगह व्यक्ति लिखा जाए
- याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील ने ये भी मांग की है कि स्पेशल मैरिज एक्ट में 'पुरुष और महिला की शादी' की बात कही गई है. इसमें 'पुरुष' और 'महिला' की जगह 'व्यक्ति' लिखा जाना चाहिए. स्पेशल मैरिज एक्ट को 'जेंडर न्यूट्रल' बनाया जाए.
पर्सनल लॉ की बात कहां से आई?
- केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अगर कोर्ट समलैंगिक विवाह को मान्यता देती है तो इसके अलग-अलग पर्सनल लॉ पर अलग-अलग तरह से प्रभाव पड़ेंगे. उन्होंने स्पेशल मैरिज एक्ट का उदाहरण देते हुए बताया कि इसमें 'महिला' और 'पुरुष' जैसे शब्द भी हैं.
- इस पर कोर्ट ने कहा, हम पर्सनल लॉ की तरफ नहीं जा रहे हैं. हम सबकुछ नहीं सुन सकते. इस पर मेहता ने कहा कि ये मुद्दे को 'शार्ट सर्किट' करने जैसा होगा. जिस पर जवाब देते हुए चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, 'हम एक बीच का रास्ता अपना रहे हैं. हमें कुछ तय करने के लिए सबकुछ तय करने की जरूरत नहीं है.'
पर्सनल लॉ का मतलब क्या?
- भारत में शादी और तलाक से जुड़े मामले पर्सनल लॉ के तहत आते हैं. हिंदुओं के लिए हिंदू मैरिज एक्ट है. ये कानून हिंदुओं के अलावा सिख, जैन और बौद्ध धर्म के लोगों पर भी लागू होते हैं.
- हिंदू मैरिज एक्ट में भी एक पुरुष और एक महिला के बीच शादी की ही बात है. इसमें शादी के लिए पुरुष की कानूनी उम्र 21 साल और महिला के लिए 18 साल तय है.
- इसी तरह ईसाइयों के लिए क्रिश्चियन मैरिज एक्ट 1872 है. कैथोलिक चर्च के कानून के मुताबिक, शादी के लिए लड़के की उम्र 16 और लड़की की उम्र 14 साल होनी चाहिए. हालांकि, भारतीय कानून में शादी की कानूनी उम्र लड़कों के लिए 21 और लड़की के लिए 18 साल होने की वजह से वो भी यहां यही सही मानती है.
- इस्लाम में शादी और तलाक से जुड़े मामले मुस्लिम पर्सनल लॉ के अंतर्गत आते हैं. देश में शादी की कानूनी उम्र लड़कों के लिए 21 साल और लड़कियों के लिए 18 साल है. लेकिन इस्लामी कानून में लड़के और लड़की अगर प्यूबर्टी में पहुंच जाते हैं तो उन्हें शादी करने की इजाजत है.
- जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने समलैंगिक विवाह को मान्यता देने की मांग वाली याचिकाओं का विरोध किया है. जमीयत का कहना है कि इस्लाम की शुरुआत से ही समलैंगिकता पर प्रतिबंधित रही है.