
ब्रिटेन में 650 सीटों वाली संसद में कंजरवेटिव पार्टी ने बहुमत के लिए आवश्यक 326 सीटों का आंकड़ा पार कर लिया है. कंजरवेटिव पार्टी को बहुमत मिलने से ब्रिटेन यूरोपीयन यूनियन (EU) से बाहर निकलने यानी ब्रेग्जिट की राह पर बढ़ता दिख रहा है. एग्जिट पोल्स में लेबर पार्टी की करारी हार की भविष्यवाणी की गई है. कंजरवेटिव पार्टी को 368 और लेबर पार्टी को 191 सीटों के मिलने का अनुमान है.
बहरहाल, यूरोपीय संघ से बाहर निकलकर देश के भविष्य को लेकर होने वाली कार्रवाई का निर्धारण इसी चुनाव के माध्यम से होगा. प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ब्रेक्जिट समर्थक हैं और वह ब्रिटेन को यूरोपीय यूनियन से अलग करना चाहते हैं. ब्रिटेन अब यूरोपीय संघ से अलग होना चाहता है. इस मुद्दे पर ब्रिटेन की संसद और जनता दो हिस्सों में बंट गई है. यूरोपीय संसद भी ब्रेक्जिट के मामले में फैसला लेने में असमर्थ रही है. लिहाजा यह समझना जरूरी है कि ब्रेक्जिट आखिर है क्या और इस मामले में क्या उथल-पुथल रही है.
क्या है ब्रेक्जिट?
ब्रेक्जिट यानी ब्रिटेन+एक्जिट. ब्रेक्जिट का सीधा सा अर्थ है ब्रिटेन का यूरोपियन यूनियन से बाहर जाना. पूरी दुनिया में इस बात को लेकर असमंजस है कि ब्रिटेन अब EU में रहेगा या नहीं. बोरिस जॉनसन की पार्टी को मिल रहे रुझानों से जाहिर हो रहा है कि वह ब्रिटेन को यूरोपियन यूनियन से अलग कर देंगे.
क्यों उठी ब्रेक्जिट की मांग
बता दें कि इसकी शुरुआत 2008 में हुई जब ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आ गई थी. देश में महंगाई बढ़ गई थी, बेरोजगारी बढ़ गई थी, जिसका समाधान निकालने और अर्थव्यवस्था को ठीक करने के प्रयास चल रहे थे. इसी बीच यूनाइटेड किंगडम इंडिपेंडेंस पार्टी (यूकेआईपी) ने 2015 में हो रहे चुनावों के दौरान यह मुद्दा उठाया कि यूरोपीय यूनियन ब्रिटेन की आर्थिक मंदी को कम करने के लिए कुछ नहीं कर रहा है. उनका कहना था कि इसकी वजह से ही ब्रिटेन की स्थिति लगातार खराब हो रही है.
उस दौरान आर्थिक मंदी को कारण मानते हुए वजह बताई गई कि ब्रिटेन को हर साल यूरोपियन यूनियन के बजट के लिए 9 अरब डॉलर देने होते हैं. इसकी वजह से ब्रिटेन में बिना रोक-टोक के लोग बसते हैं. फ्री वीजा पॉलिसी से ब्रिटेन को भारी नुकसान हो रहा है.
ब्रेक्जिट का विरोध भी हुआ
वहीं, इससे उलट ब्रिटेन के कई लोग यूरोपीय यूनियन से हो रहे फायदों के बारे में जानते हैं और ब्रेक्जिट के फैसले को गलत बताते हैं. ब्रेक्जिट का विरोध करने वाले लोगों की दलील है कि इससे दूसरे यूरोपिय देशों से कारोबार पर बुरा असर होगा. ब्रिटेन का सिंगल मार्केट सिस्टम खत्म हो जाएगा और ब्रिटेन की जीडीपी को भारी नुकसान होगा.
डेविड कैमरन के बाद बने दोनों पीएम टेरेसा मे और बोरिस जॉनसन ने ब्रेक्जिट को अपना मुद्दा बनाया और इसे लागू करने की शर्त पर प्रधानमंत्री का पदभर संभाला. लेकिन इनमें से टेरेसा मे ब्रेक्जिट पर बहुमत हासिल नहीं कर पाईं और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा.
2016 में ब्रिटेन में जनमत संग्रह हुआ था, जिसमें बहुमत ब्रिटेन का यूरोपीय यूनियन से अलग होने के पक्ष में था. ब्रेक्जिट पर जनमत संग्रह के रुझान के बाद तत्कालीन कैमरन सरकार को इस्तीफा देना पड़ा था. तब कंजरवेटिव पार्टी की टेरेसा मे की अगुवाई में सरकार बनी. लेकिन ब्रेक्जिट के लिए वह आवश्यक समर्थन नहीं जुटा सकीं और अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. इसके बाद बोरिस जॉनसन प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी.
अपनी शर्तों पर उठाएंगे कदम
बहरहाल, अगर आखिरी नतीजे भी एग्जिट पोल की तरह आएं तो प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन अपनी शर्तों पर यूरोपीय संघ से अलग होंगे. ब्रिटेन की गृह मंत्री प्रीति पटेल कह चुकी हैं कि नई सरकार ब्रेक्जिट लागू करने के लिए तेजी से कदम उठाएगी. उनके अनुसार क्रिसमस से पहले ही संसद में बिल पेश कर दिया जाएगा.