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साहित्य आजतक: मदन कश्यप ने बताया क्या है कवि और कविता का राष्ट्रधर्म?

मदन कश्यप ने कहा कि कविता उसकी आवाज है जिसे कोई नहीं देखता, जो किसी का वोट बैंक नहीं है, उसके वोट से सरकार नहीं बदलती है, उसको न सरकारें देखती हैं और न ही प्रतिपक्ष देखता है.

कवि मदन कश्यप (फोटो- आजतक) कवि मदन कश्यप (फोटो- आजतक)
अनुग्रह मिश्र
  • नई दिल्ली,
  • 16 नवंबर 2018,
  • अपडेटेड 2:14 PM IST

'साहित्य आजतक' के हल्ला बोल चौपाल मंच पर हिंदी कविता को समर्पित सत्र ‘कविता के बहाने’ आयोजित हुआ. इस सत्र में समकालीन काव्य जगत की तीन शख्सियत मदन कश्यप, अरुण देव और तेजेंदर सिंह लूथरा ने अपनी कविताएं पढ़ीं. साथ ही हिन्दी साहित्य को लेकर दर्शकों के साथ अपने विचार साझा किए.

कवि मदन कश्यप से पूछा गया कि क्या आज के कवि और कविताएं आसपास के माहौल को लेकर जागरुक हैं? इस पर उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद की अवधारणा अलग-अलग है और यह शब्द पश्चिम से आया है. उन्होंने कहा कि हर कवि देशभक्त होता और देश एक विचारधारा से, नस्ल से, धर्म से, जाति से ,भाषा से नियंत्रित-संचालित नहीं होता. विविधता और बहुलता की राष्ट्रवाद की खूबसूरती है.

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कवि ने कहा कि हम उस राष्ट्र के मानते हैं जहां रहने वाले सभी वर्गों के लोग, सभी धर्मों के लोग, सभी भाषाओं के लोगों को बराबर अपने विचार रखने का अधिकार दिया जाए और उसमें जो भी कमजोर पड़ रहा है उससे पक्ष में आवाज उठाना कविता का कर्तव्य है. उन्होंने कहा कि कविता समाज के आखिरी आदमी की आवाज है जो सबसे कमजोर है.

मदन कश्यप ने कहा कि कविता उसकी आवाज है जिसे कोई नहीं देखता, जो किसी का वोट बैंक नहीं है, उसके वोट से सरकार नहीं बदलती है, उसको न सरकारें देखती हैं और न ही प्रतिपक्ष देखता है. उन्होंने कहा कि जिसकी समाज में कहीं कोई पहचान नहीं है और वो नगण्य है, उसी व्यक्ति की संवेदना को सामने लाना ही कवि और कविता का काम है. कवि को आखिरी आदमी के दुख में हिस्सेदारी चाहिए.

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