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भले ही 99 पर अटकी BJP, पर मोदी जानते हैं कैसे जीते जाते हैं चुनाव

22 साल के सत्ता विरोधी माहौल को ध्वस्त करना बीजेपी के लिए आसान नहीं था फिर भी अगर नरेंद्र मोदी ने गुजरात में ये करके दिखाया तो ये बीजेपी की बड़ी जीत है. कांटे की टक्कर ऐसी थी कि कई सीटों पर जीत-हार कुछ सौ और कुछ हज़ार वोट से ही तय हुई.

नरेंद्र मोदी नरेंद्र मोदी
रोहित
  • गांधीनगर,
  • 19 दिसंबर 2017,
  • अपडेटेड 7:28 AM IST

गुजरात में बीजेपी की सीटें घटी हैं. लेकिन वोट शेयर 2012 के मुकाबले करीब सवा फीसदी बढ़ा है. इसी के सहारे बीजेपी कांग्रेस के उस आक्रामक कैंपेन की काट कर सकी. जिस कैंपेन को राहुल गांधी ने पैनापन दिया और पहली बार ये दिखा कि बीजेपी गुजरात में बड़ी मुश्किल में है.

22 साल के सत्ता विरोधी माहौल को ध्वस्त करना बीजेपी के लिए आसान नहीं था फिर भी अगर नरेंद्र मोदी ने गुजरात में ये करके दिखाया तो ये बीजेपी की बड़ी जीत है. कांटे की टक्कर ऐसी थी कि कई सीटों पर जीत-हार कुछ सौ और कुछ हज़ार वोट से ही तय हुई. कैसे बीजेपी ने कांग्रेस के आक्रामक कैंपेन से बने माहौल के सामने नई रणनीति अपनाई. कैसे अपने कोर वोट बेस में कम से कम नुकसान होने दिया. कैसे कांग्रेस के गढ़ में सेंध लगाकर नुकसान को पूरा किया. इसका विश्लेषण ज़रूरी है.

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सीटें भले ही पिछली बार से कम हो, बीजेपी का कोर वोट शेयर बना रहा. यही वजह है जिससे बीजेपी ने गुजरात में सत्ता का सिक्सर लगा दिया. भले ही कितनी नाराज़गी रही हो. गुजरात में बीजेपी की चुनावी जीत के ये बड़े फैक्टर रहे.

- शहरी और कस्बाई इलाकों में बीजेपी का कब्ज़ा बना रहा.

- शहरी इलाकों की 55 सीटों में बीजेपी ने 43 सीटें जीती.

- अहमदाबाद, वडोदरा जैसे गढ़ को बीजेपी ने बनाए रखा.

- कच्छ और सौराष्ट्र को छोड़कर बाकी गुजरात में वर्चस्व रहा.

- कांग्रेस के पुराने गढ़ आदिवासी इलाकों में BJP ने सेंध लगा दी.

- पाटीदार वोट खोए, लेकिन काफी हद तक ओबीसी वोटर जुड़े.

- जीएसटी के खिलाफ आंदोलन के गढ़ सूरत में भी कामयाब रहे.

बीजेपी की सबसे बड़ी चुनौती गुजरात के उस जातिगत समीकरण को तोड़ना था, जिसे कांग्रेस ने अपनी स्मार्ट चुनावी रणनीति के तहत चुनावों से करीब एक महीने पहले ही बनाया था. इसमें पाटीदार नेता हार्दिक पटेल, ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर और दलित नेता जिग्नेश मेवाणी की तिकड़ी खास रही.

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बीजेपी के खिलाफ जाति समीकरण साधने में कांग्रेस काफी हद तक कामयाब रही, क्योंकि पाटीदारों के वोट में कांग्रेस ने सेंध लगाई. अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाणी से भी कांग्रेस को फायदा हुआ. भले ही उतना फायदा नहीं हुआ कि वो बीजेपी को पीछे छोड़ पाते. लेकिन असल में बीजेपी ने कांग्रेस के गढ़ में सेंध लगाने और शहरी इलाकों में कब्ज़ा बनाए रखकर गुजरात का गढ़ बरकरार रखा.

गुजरात में बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीटों का फासला 20 से भी कम रहा. ये गुजरात के रोमांचक चुनावी मैच को बताता है कि एक-एक सीट पर ऐसा कड़ा मुकाबला रहा कि आखिरी वक्त तक कैंडिडेट आगे पीछे होते रहे.

गुजरात में 17 सीटें ऐसी रहीं, जहां हार जीत का अंतर 2000 वोट से भी कम रहा है.

2000 वोट से कम अंतर से बीजेपी ने 8 सीटें जीतीं तो 9 कांग्रेस ने जीतीं.

गुजरात में 8 सीटें ऐसी रहीं, जहां हार जीत का अंतर 1000 वोट से भी कम रहा है.

1000 वोट से कम अंतर से बीजेपी ने 2 और कांग्रेस ने 6 सीटें जीती हैं.

आदिवासी बहुल कपराडा सीट पर कांग्रेस सिर्फ 170 वोट से जीती.

गोधरा की सीट को बीजेपी ने सिर्फ 258 वोट से जीता.

मानसा सीट को कांग्रेस ने बीजेपी से सिर्फ 524 वोट से जीता.

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ये कांटे की टक्कर ही गुजरात की चुनावी कहानी है, जिसकी जीत का उत्साह आज खुद प्रधानमंत्री के चेहरे और भाषण से दिख रहा था. इसलिए वो आज बार बार गुजरात में बीजेपी की तीन दशक से लगातार जीत की बात याद दिला रहे थे.

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