मगरमच्छों के पूर्वज हैं डायनासोर. ये कभी साथ-साथ रहा करते थे. ये बात है करीब 6.60 करोड़ साल पहले की. ये जुरासिक काल था. धरती पर डायनासोर का साम्राज्य था लेकिन एक दिन अंतरिक्ष से आए एक एस्टेरॉयड ने धरती के सारे डायनासोर मारे डाले. पर मगरमच्छ बच गए...कैसे? इस बात की रिसर्च करके वैज्ञानिकों ने बड़ी हैरतअंगेज वजह निकाली है. आइए जानते हैं कि आखिर एस्टेरॉयड के इस भयावह हमले में मगरमच्छ कैसे बचे? (फोटोःगेटी)
ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने पता लगाया है कि जब एस्टेरॉयड ने पूरी धरती पर हमला किया था. तब डायनासोर की प्रजाति खत्म हो गई थी. जबकि, मगरमच्छ डायनासोर के ही वंशज हैं. ये बच गए. कई सालों से इस बारे में रिसर्च चल रही थी. अब जाकर ये पता चला कि मगरमच्छ अपने शरीर की बहुमुखी और कुशल बनावट की वजह से बचे थे. (फोटोःगेटी)
मगरमच्छ कई महीनों तक पानी की गहराइयों में घोर अंधेरे में बिना खाए पिए रह सकते हैं. मगरमच्छ के शरीर की बनावट ऐसी है कि ये कई बार भयावह चोट और घाव को भी बर्दाश्त कर लेते हैं. ये घाव जब तक ठीक नहीं हो जाता, चुपचाप एक जगह पड़े रहते हैं. मगरमच्छ अपने शरीर के तापमान को नियंत्रित कर सकते हैं, जबकि डायनासोर ऐसा नहीं कर सकते थे. (फोटोःगेटी)
मगरमच्छ तापमान नियंत्रण करने की क्षमता का फायदा खूब उठाते थे. जब मेक्सिको की खाड़ी में एक शहर के बराबर एस्टेरॉयड गिरा तो उसने धरती से कई पेड़-पौधे, जीव-जंतुओं को खत्म कर दिया. जबकि, मगरमच्छ बच गए. ये सूरज की रोशनी से गर्मी और पानी के अंदर खाना लेकर जीते रहे. हालांकि, इन्हें ज्यादा खाना खाने की जरूरत नहीं होती. एक बार खाना खाने के बाद ये कई दिनों तक जीवित रह सकते हैं. (फोटोःगेटी)
उस घटना के बाद से मगरमच्छों में ज्यादा बदलाव नहीं आया है. आज के मगरमच्छ लगभग उसी तरह के हैं, जैसे कि वो जुरासिक काल में दिखाई देते थे. ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता डॉ. मैक्स स्टॉकडेल कहते हैं कि मगरमच्छ के शरीर की बनावट, उनकी जीवटता और आलस ये तीनों ही उनके बचे रहने की सबसे बड़ी वजह है. कई बार ये इतने आलसी होते हैं कि इन्हें आसपास के वातावरण में हो रही घटनाओं से फर्क ही नहीं पड़ता. (फोटोःगेटी)
डॉ. मैक्स ने बताया कि मगरमच्छ पानी के अंदर एक घंटे तक अपनी सांस रोक सकते हैं. ये जमीन पर तेजी से भाग भी सकते हैं. खास तौर पर जब ये खतरे में हों या इन्हें गुस्सा आ रहा हो. मगरमच्छों की फिलहाल धरती पर 25 प्रजातियां मौजूद हैं. हालांकि, जुरासिक समय के बहुत से पक्षियों और छिपकलियों की प्रजातियां आज भी जीवित हैं. ये भी मगरमच्छों की तरह सर्वाइव कर गई थीं. (फोटोःगेटी)
डॉ. मैक्स स्टॉकडेल और उनके साथियों ने अपनी रिसर्च में पाया कि मगरमच्छों में स्टॉप-स्टार्ट पैटर्न होता है. यानी ये पर्यावरणीय बदलाव के साथ अपने को सुरक्षित रखने का बटन स्टार्ट कर देते हैं. जैसे ही परिस्थिति अनुकूल होती है ये उसे स्टॉप कर देते हैं. साइंस जर्नल नेचर कम्यूनिकेशन बायोलॉजी में इस प्रक्रिया को पंक्चर्ड इक्वीलीब्रियम कहते हैं. (फोटोःगेटी)
मगरमच्छों ने दो बार आइस एज भी देखा है. जब पूरी धरती पर बर्फ ही बर्फ थी. आमतौर पर सर्वाइवल के लिए जब मगरमच्छ आपस में लड़ते हैं तो वो एकदूसरे का पैर काटते हैं. घायल मगरमच्छ चुपचाप पानी की गहराइयों में जाकर शांत बैठ जाता है. जब वह ठीक हो जाता है तब वापस आता है. मगरमच्छ को अंधेरे से कोई दिक्कत नहीं होती, जबकि डायनासोर को थी. (फोटोःगेटी)