बजट सत्र 2025 का आगाज हो चुका है. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू अपने अंगरक्षकों, जिन्हें प्रेसिडेंट बॉडीगार्ड (PBG) कहा जाता है और घुड़सवार दस्ते के साथ राष्ट्रपति बग्घी पर सवार होकर संसद भवन पहुंची. खास मौकों पर देश के राष्ट्रपति 6 घोड़ों से चलने वाली बग्घी की सवारी करते दिखाई देते हैं. इससे पहले गणतंत्र दिवस 2025 के मौके पर भी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू इसी बग्घी पर सवार होकर कर्तव्य पथ (पहले राजपथ) पर पहुंची थीं. यह खास बग्घी पाकिस्तान में होती, लेकिन एक टॉस के बाद आज यह भारत की शान बढ़ा रही है. आइए जानते हैं इस खास बग्घी का दिलचस्प इतिहास.
लग्जरी कार को छोड़कर, भारतीय राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने गणतंत्र दिवस की परेड और आज बजट सत्र के लिए राष्ट्रपति भवन से संसद तक ऐतिहासिक बग्घी की सवारी की.
राष्ट्रपति के अंगरक्षक और बग्घी के साथ चलने वाले घोड़ों की कुल संख्या 55 होती है. दो घोड़े कमांडिंग ऑफिसर के चार्जर होते हैं. खास यूनिफॉर्म और मजबूत कद काठी वाले राष्ट्रपति के अंगरक्षक शानदार घोड़ों के साथ दिखते हैं.
यह बग्घी कहां से आई? इसका इतिहास भी दिलचस्प है. इस बग्घी पर सोने की परत चढ़ी है, घोड़े से खींची जाने वाली यह बग्घी मूल रूप से ब्रिटिश काल के दौरान भारत के वायसराय की थी.
स्वतंत्रता के बाद जब भारत-पाकिस्तान का विभाजन हुआ तो दोनों ही देश यह फैंसी बग्घी चाहते थे. इस झगड़े को सुलझाने के लिए तब कोई उच्च शक्ति नहीं थी.
ऐसे में बग्घी के विवाद को सुलझाने के लिए एक अनोखा रास्ता निकाला गया. जिस तरह आजकल क्रिकेट मैच से पहले बैटिंग और फील्डिंग के लिए कप्तान टॉस करते हैं, उसी तरह एक सिक्का उछाला गया.
भारत के तत्कालीन लेफ्टिनेंट कर्नल ठाकुर गोविंद सिंह और पाकिस्तानी सेना के साहबजादा याकूब खान ने बग्घी के स्वामित्व की जिम्मेदारी एक सिक्के पर छोड़ दी. भारत ने टॉस जीता और बग्घी भारत की हो गई. तभी से देश के राष्ट्रपति ऐतिहासिक मौकों पर इस फैंसी बग्घी की सवारी कर रहे हैं.
हालांकि 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या के बाद, कुछ दशकों तक किसी भी राष्ट्रपति द्वारा बग्घी का अक्सर इस्तेमाल नहीं किया गया. जैसे-जैसे राष्ट्रपति की सुरक्षा कड़ी होती गई, बग्घी का इस्तेमाल कम होता गया और राष्ट्रपति भवन में औपचारिकताओं तक सीमित हो गया. उन्होंने कभी-कभार इसका इस्तेमाल किया.
साल 2014 में प्रणब मुखर्जी ने इस बग्घी का फिर से उचित तरीके से इस्तेमाल किया. उनके बाद भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इस परंपरा को जारी रखा. अब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया है.
इससे पहले, राष्ट्रपति द्वारा सोने की परत चढ़ी बग्घी का इस्तेमाल न केवल औपचारिक उद्देश्यों के लिए किया जाता था, बल्कि अपने 320 एकड़ के आवासीय क्षेत्र में घूमने के लिए भी किया जाता था.