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Corona virus: जानें- किसी वैक्सीन के 95% सफल होने का क्या है मतलब

aajtak.in
  • 24 नवंबर 2020,
  • अपडेटेड 7:53 PM IST
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कोरोना वैक्सीन (coron virus vaccine) की रेस में सबसे आगे चल रहे फ्रंट-रनर कैंडिडेट्स उम्मीद से कहीं बेहतर काम कर रहे हैं. Pfizer और BioNTech ने तो इसी सप्ताह अपने वैक्सीन के 95 प्रतिशत प्रभावशाली होने का दावा भी कर दिया है. वहीं, रूस की Sputnik और अमेरिका की Moderna का एफिकेसी रेट 90 से 94.5 प्रतिशत तक बताया जा रहा है.

Photo: Reuters

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मायो क्लीनिकल के वैक्सीन डेवलपर डॉ. ग्रेगरी पॉलैंड इन्हें एक बड़ा गेम चेंजर मान रहे हैं. वो कहते हैं कि हम तो सिर्फ 50 से 70 प्रतिशत सफलता की उम्मीद कर रहे थे. वहीं, फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) ने ऐसी वैक्सीन को ही इमरजेंसी अप्रूवल देने की बात कही है जिसका एफिकेसी रेट (प्रभावी दर) कम से कम 50% हो.

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हाल ही में आपने ऐसी वैक्सीन के बारे में सुना होगा जो कुछ ही लोगों को दी गई हैं, लेकिन 100 में 95 लोगों की जान बचाने का दावा करती हैं. लेकिन इस तरह के दावे हकीकत से काफी दूर हैं. पूरी दुनिया में वैक्सीन कैसे काम करती है, ये कई बातों पर निर्भर करता है और हमारे पास इनका अभी तक कोई जवाब नहीं है. जैसे क्या वैक्सीनेट हुए इंसान को एसिम्पटोमैटिक इंफेक्शन हो सकता है या फिर कितने लोगों को टीका लगाया जाएगा.

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लगभग 100 साल पहले वैज्ञानिकों ने वैक्सीन ट्रायल के नियम बनाए थे. इस प्रक्रिया के तहत, ट्रायल में कुछ वॉलंटियर्स को असल में वैक्सीन दी जाती है, जबकि कुछ को प्लेसिबो यानी आर्टिफिशियल टीका दिया जाता है. इसके बाद शोधकर्ता देखते हैं कि किस समूह में कितने लोग बीमार हुए.

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मिसाल के तौर पर फाइजर ने 48,661 लोगों को परीक्षण में शामिल किया था जिनमें से 170 लोगों में कोविड-19 के लक्षण मिले. यहां 170 वॉलंटियर्स में से सिर्फ 8 को असली वैक्सीन दी गई थी, जबकि 162 को प्लेसिबो (मरीज को बिना बताए दिए जाने वाला आर्टिफिशियल टीका) दिया गया था. फाइजर के शोधकर्ताओं ने दोनों ही ग्रुप के ऐसे लोगों को छांटा जो बीमार पड़ गए थे.

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ये दोनों ही समूह काफी छोटे थे. हालांकि, जिन लोगों को असली वैक्सीन दी गई थी, उनकी तुलना में आर्टिफिशियल वैक्सीन पाने वाले लोग ज्यादा बीमार पड़े. इसी आधार पर, वैज्ञानिकों ने दोनों समूहों में वैक्सीन के असर को रेखांकित किया. दोनों समूहों के बीच जो अंतर दिखता है, उसे ही वैज्ञानिक एफिकेसी (प्रभावकारिता) कहते हैं. दोनों समूहों जिन्हें असली वैक्सीन दी गई और जिन्हें नकली वैक्सीन दी गई, अगर उनके बीच कोई फर्क नहीं होता तो वैक्सीन बेअसर मानी जाती है. अगर असली वैक्सीन दिए गए लोगों में से कोई भी बीमार नहीं पड़ता है तो वैक्सीन 100 फीसदी प्रभावी मानी जाती है.

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ऐसे में 95 प्रतिशत एफिकेसी रेट का मतलब यही है कि वैक्सीन काम कर रही है. हालाँकि, असल में ये दर कभी ये तय नहीं करती कि वैक्सीन लगने के बाद आपके बीमार पड़ने की संभावना कितनी है.

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जॉन्स होपकिंस ब्लूमबर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के एपिडेमियोलॉजिस्ट नोआर बार ज़ीव कहते हैं, 'प्रभावकारिता (एफिकेसी) और प्रभावशीलता (इफेक्टिवनेस) एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं, लेकिन ये बिल्कुल अलग चीजें हैं. एफिकेसी सिर्फ पैमाना है, जो क्लीनिकल ट्रायल के दौरान बनाया जाता है. जबकि इफेक्टिवनेस का मतलब है कि पूरी दुनिया में वैक्सीन कैसा काम कर रही है.'

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