कोरोना वैक्सीन बनाने वाली कंपनी भारत बायोटेक ने देश में कोवैक्सीन और कोविशील्ड के असर पर हाल में आए स्टडी को खारिज किया है. कंपनी का कहना है कि भारत बायोटेक की कोवैक्सीन और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की कोविशील्ड के असर को जांचने वाली स्टडी में कई खामियां हैं.
दरअसल, एक हालिया स्टडी में कोवैक्सीन को कोविशील्ड के मुकाबले कम असरदार बताया गया है. भारत बायोटेक ने इस अध्ययन को अवैज्ञानिक और पूर्वाग्रहों पर आधारित बताकर खारिज कर दिया है. कंपनी ने यह भी घोषणा की है कि वह जुलाई में कोवैक्सीन के तीसरे चरण के क्लीनिकल ट्रायल के डेटा को सार्वजनिक करेगी.
भारत बायोटेक ने जारी बयान में कहा, 'भारत में बने टीकों के असर को लेकर हाल ही में आई स्टडी में कई खामियां हैं. जर्नल में कोवैक्सीन के मुकाबले कोविशील्ड को ज्यादा असरदार बताया गया है.' वैक्सीन बनाने वाली कंपनी ने यह भी कहा कि अखिल भारतीय अध्ययन में वैक्सीन की दोनों खुराक लेने वाले स्वास्थ्यकर्मियों की प्रतिक्रियाओं को लिया गया है. जर्नल में प्रकाशित स्टडी में आंकड़ों और वैज्ञानिकता का अभाव है. यह पहले से 'तय परिकल्पना' पर आधारित है.
भारत बायोटेक ने कहा कि जुलाई में तीसरे चरण ट्रायल्स के फाइनल आंकड़ों को सार्वजनिक कर दिया जाएगा. कंपनी के मुताबिक तीसरे चरण के ट्रायल का डेटा सबसे पहले सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (CDSCO) में जमा किया जाएगा. इसके बाद इसे पीयर रिव्यूड जर्नल्स में प्रकाशित किया जाएगा. फिर जुलाई के दौरान इसे सार्वजनिक कर दिया जाएगा. कोवैक्सीन को जनवरी में ही इमर्जेंसी इस्तेमाल की इजाजत दे दी गई थी लेकिन उस वक्त अभी उसके तीसरे चरण के ट्रायल चल ही रहे थे.
द मिंट की रिपोर्ट के मुताबिक कंपनी ने आगे कहा, "एक बार तीसरे चरण के अध्ययन के अंतिम विश्लेषण से डेटा उपलब्ध होने के बाद भारत बायोटेक COVAXIN के लाइसेंस के लिए आवेदन करेगी." भारत बायोटेक की बिजनेस हेड राचेस एला ने ट्वीट किया कि कैसे गैर पीयर रीव्यू्ड काम को माना जाएगा? सिलसिलेवार ट्वीट में राचेस एला ने कहा कि हैरानी हो रही है कि मीडिया और शोधकर्ता कैसे एक गैर पीयर रीव्यूड स्टडी पर निष्कर्ष निकाल रहे हैं.
हाल ही में, एक अखिल भारतीय अध्ययन ने दावा किया था कि कोविशील्ड वैक्सीन कोवैक्सिन की तुलना में अधिक एंटीबॉडी बना रही है. स्टडी में कहा गया कि कोविशील्ड के मुकाबले कोवैक्सीन कम असरदार है. हालांकि अभी यह स्टडी पब्लिश नहीं है. इस स्टडी में 13 राज्यों के 22 शहरों से 515 स्वास्थ्यकर्मियों को शामिल किया गया है.
पुणे की कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया कोविशील्ड वैक्सीन बनाती है जो ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका पर आधारित है. कोवैक्सीन पूरी तरह से स्वदेशी है जिसे ICMR और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (NIV) के साथ मिलकर हैदराबाद की भारत बायोटेक कंपनी बनाती है.
कोवैक्सीन एक इनएक्टिव टीका है जिसमें मृत वायरस होता है. तीसरे चरण के ट्रायल्स के प्रारंभिक आंकड़ों से पता चलता है कि कोवैक्सिन 81% प्रभावी है. वहीं कोविशील्ड वायरल वेक्टर प्लेटफॉर्म पर आधारित है और इसे चिंपैंजी के एक सामान्य कोल्ड वायरस के कमजोर वर्जन से बनाया गया है. कोविशील्ड की दो खुराक 12 सप्ताह के अंतराल पर दी जाती है. यह 70% से अधिक बताया गया है.
स्टडी के दौरान प्रतिभागियों के ब्लड सैम्पल लेकर जांच की गई. इसमें पाया गया कि कोविशील्ड लेने वालों में एंटी स्पाइक एंटीबॉडी से संबंधित सीरोपॉजिटिविटी रेट कोवैक्सिन लेने वालों की तुलना में काफी अधिक था. हालांकि अभी यह स्टडी प्रकाशित नहीं है. ऐसे में अभी क्लीनिकल प्रैक्टिस में इसका इस्तेमाल नहीं हो सकता. हालांकि शोधकर्ताओं का कहना है कि दोनों ही वैक्सीन ने अच्छी प्रतिरक्षा विकसित की है.
अध्ययन के प्रमुख लेखक अवधेश कुमार सिंह ने एक ट्वीट में कहा, दोनों ही वैक्सीन ने दो खुराक के बाद अच्छी इम्युनिटी विकसित की है. हालांकि कोविशील्ड लेने वालों में एंटी स्पाइक एंटीबॉडी से संबंधित सीरोपॉजिटिविटी रेट कोवैक्सिन लेने वालों की तुलना में काफी अधिक था. अवधेश कुमार सिंह एंडोक्रिनोलॉजिस्ट है और कोलकाता के जीडी अस्पताल और डायबेटिक इंस्टीट्यूट में कार्यरत हैं.
अवधेश सिंह का दावा है कि इस स्टडी में 515 स्वास्थ्यकर्मी शामिल किए गए. इनमें 79.03 फीसदी सीरोपॉजिटिविटी रेट दर्ज की गई थी. कोविशील्ड के लिए एंटीबॉडी टाइटर 115 AU/ml (ऑर्बिटरी यूनिट प्रति मिलीलीटर) और कोवैक्सिन के लिए 51 AU/ml था. सेरोपोसिटिविटी एक व्यक्ति में एंटीबॉडी बनने की प्रक्रिया को कहा जाता है, जबकि AU का इस्तेमाल एंटीबॉडी मापने के लिए किया जाता है.